नि:स्सारता-
रह धरा पर इस धरा का , ताप सहा जाता नहीं .
जल धार ललचाती मुझे,पर अधिक रहा जाता नहीं.
सब जगह ही छितरी हुईं , मजबूरियां - मजबूरियां.
क्या कहूं ,किससे कहूं , सब कुछ कहा जाता नहीं .
व्यर्थ यह दिन रात की , यह जीवन की दौड़ है.
तुम ही कहो जाऊं कहाँ ,मैं कुछ भी कहीं पाता नहीं .
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