Monday, September 5, 2011

अरे मुक्ति का दूत कभी क्या,आँचल में पला करता है


तोड़ दो आज निष्ठाएं
निज से नाता जोड़ो
कुल,वंश, देश, भाषा, समाज व
मान,दंभ से भी मुख मोड़ो
लीक लकीरों से बंधकर संसार चला करता है
अरे मुक्ति का दूत कभी क्या
आँचल में पला करता है
अरे तत्व से अधिक आज यदि
धन- समाज अरु गोत्र -जात ही भाती
भगवान आत्मा की कीमत पर
बस यश कीरत ही ललचाती
यदि आज तू इन क्षणवर्ती
पर्यायों में गाफिल है
अरे मुक्ति पथिक नहीं तू
बस संसार के ही काबिल है

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