एकाकी
क्या कहूं, किससे कहूं
कुछभी कहा जाता नहीं
जो बाँट लेगा पीर को
ऐसा कोई पाता नहीं
मैंने क्या ढोया नहीं
इन मुफलिसों के कारवां को
अब मुकां के मोड़ पर
तब साथ क्यों साया नहीं
था तो मैं तबभी अकेला
मुझसा तभीभी कौन था
चाहता था दौर पूरा
पर एक मिल पाया नहीं
बस एक हूँ मैं ही अकेला
इस उलझनों के दौर में
थामने को हाथ मेरा
अब कोई क्यों आता नहीं
कुछभी कहा जाता नहीं
जो बाँट लेगा पीर को
ऐसा कोई पाता नहीं
मैंने क्या ढोया नहीं
इन मुफलिसों के कारवां को
अब मुकां के मोड़ पर
तब साथ क्यों साया नहीं
था तो मैं तबभी अकेला
मुझसा तभीभी कौन था
चाहता था दौर पूरा
पर एक मिल पाया नहीं
बस एक हूँ मैं ही अकेला
इस उलझनों के दौर में
थामने को हाथ मेरा
अब कोई क्यों आता नहीं
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