इसे दुर्भाग्य नहीं तो क्या कहें ?
जीवन अभाव में पलता था , दिया तो तब भी जलता था
तेल बो पूरा पी लेता , बदले में धुंआ उगलता था
कितनी हमने देखी भोगी , अपने श्रोतों की बर्बादी
चुक जाता ईंधन,फुक जाती बाती,अंधेरा तब भी पलता था
-इसे बिडम्बना नहीं तो क्या कहें क़ि जो दिया सम्पन्न लोगों के घरों को रोशन करता है वही दीपक अभावग्रस्त घरों में (तेल की कमी के कारण ) तेल ज्यादा पीता है और धुंआ छोड़ता है ,
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