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Monday, October 5, 2015

कविता - इसे गुप्त कहते हें - अगली सुबह हर जुबां पर इक यही जुमला मिलेगा

jaipur,  monday, oct 5, 2015, 2.56 pm

इसे गुप्त कहते हें -
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 


















तुमने कहा था कि किसी से न कहना 
उसने किसी से नहीं कहा 
अंधे ने मूता 
किसी ने नहीं देखा 

ऐसे ही भ्रमों में जीती है दुनिया 

लोग अपने आपको देते हें धोखा 

तुम नहीं रोक सके स्वयं को 

तो वह कैसे रुक जाएगा 
उसका भी तो कोई निकटतम होगा 
वह उसे बतलायेगा 
उसमें अपना भरोसा जतलायेगा 
"तुम किसी से न कहना "यह सीख देता जाएगा 

यह क्रम बड़ी तेजी से चलेगा 

अगली सुबह हर जुबां पर इक यही जुमला मिलेगा 


Sunday, October 4, 2015

मेरी कल्पना -
एक मुमुक्षु का आदर्श अंतिम सन्देश -
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी कविता का एक पद -

"अब हम चले निजलोक में 

संसार में अब ना भ्रमेंगे


तुम हमें अब भूल जाओ


मोक्ष में अब हम मिलेंगे "


अनादि से तो चल रहा है
संसार का ये सिलसिला 
जन्म, जीवन, म्रत्यु मिलकर
बन पड़ा यह क़ाफ़िला

बिछुड़ गए कई बार मिलकर 
फ़िरसे मिले, फिरसे जुदा
ये सिलसिले चलते रहे
तुम कहो हमको क्या मिला

सुध आई हमको आत्मा की 
स्वरूप का निर्णय हुआ
मैं एक हूँ परिपूर्ण निज में 
कोई मेरा कब हुआ 

यह जानकर, निर्धार कर 
निज रूप में स्थित हुआ
कोई आऐ, कोई जाऐ
अबतक यही सब कुछ हुआ

ओ लोक के सब लोग सुनलो
अब भूल जाओ सब गिले 
आधि व्याधि उपाधि तजकर
इस देह से अब हम चले

अब हम चले निजलोक में 
संसार में अब ना भ्रमेंगे
तुम हमें अब भूल जाओ
मोक्ष में अब हम मिलेंगे 

मुक्ति को अब कूच मेरा
स्वरूप में अावास होगा 
लोकाग्र में होकर अवस्थित 
सिद्धों से सहवास होगा

Thursday, June 11, 2015

"काम जो होना अरे, वह कामतो होकर रहेगा"

"काम जो होना अरे, वह कामतो होकर रहेगा"
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल

वक़्त ने सिखला दिया, इतना कब पढे थे हम 
ये लोग तो फिर जुड़े,  अकेले ही  चले थे हम 
उठकर चले, चलकर गिरे, रोजकी ये बात है
जानता कोई नहीं,कहाँ कब-कब गिरे थे हम 

ये लोग जो अब साथ हैं, जो  आज  मेरे  हैं 
कैसे जुटे हैं, तुम क्या जानो, कैसे बटोरे हैं
जोड़ता था  एक को  तो , दो  बिछडते  थे 
अब  एकको मैं छोड़ता हूँ , चार मिलते हैं 

सीखकर ना  कोई आता , अरे  माँ की कोख से 
ना ज़िन्दगीभर सीखपाता,जो भूलकरने से डरे
भूलकर जो  भूल का डर, चलपडा वह वढ गया
जो भूल से डरता रहे , वह क्रत्य कुछ कैसे करे 

गल्तियां  हमसे  न  हों , कितने  डरे थे  हम 
अबतक न कोई कर सका, क्रत्य बे करेंगे हम
यह संकल्प ही तो बस प्रथम , भूल  मेरी थी 
भूल कर-कर हम ये सीखे,ना भूलसे डरेंगे हम 

काम जो होना अरे, वह कामतो होकर रहेगा
तू करे  या  मैं करूँ , या  और ही कोई करेगा 
किसने किया कैसे हुआ,लोकको चिन्ता नहीं 
चाहा जो होगया तो,लोक ये जय-जय कहेगा

Meruth - Tuesday, 9 th June, 1.55 am 

Thursday, February 6, 2014

सारी दुनिया बस इनमें सिमटी नजर आती है

क्या यही चलता रहेगा (कविता)
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

मैं पूरिओं से  उबकर , पराठों पर आता हूँ

उनसे थकता हूँ तब सूखी रोटियाँ खाता हूँ


हर हफ्ते बस यह़ी कथा दोहराई जाती है


सारी दुनिया बस इनमें सिमटी नजर आती है


Monday, February 3, 2014

इस जिन्दगी की पोथी का , एक पन्ना हर दिन पलट जाता है

क्या यही है जीवन ? (कविता)
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इस जिन्दगी की पोथी का , एक पन्ना हर दिन पलट जाता है

आधी से ज्यादा पलट डाली , पर नया कुछ नजर नहीं आता है


हरएक पन्ने पर एक सी ही इबारत लिखी है,ऊब गया हूँ पड़ते


कितना रूखा रहा होगा वो लेखक , जिसने ये कहानी लिखी है


Wednesday, November 20, 2013

सुख से रहता हूँ series का आठबा छंद -- इसीलिये बेफिक्र सदा मैं , सुख से रहता हूँ

सुख   से   रहता हूँ series का आठबा छंद -

मैं न किसी का ना कोई मेरा , बस अपने में रहता हूँ 

इसीलिये   बेफिक्र   सदा   मैं  ,  सुख   से   रहता हूँ

Tuesday, November 19, 2013

सुख से रहता हूँ series का सातबां छंद -इसीलिये बेफिक्र सदा मैं , सुख से रहता हूँ

सुख   से   रहता हूँ series का सातबां छंद -

कोई दुखी ना करता मुझको , मैं नहीं किसी को करता हूँ 

इसीलिये   बेफिक्र   सदा   मैं  ,  सुख   से   रहता हूँ

Monday, November 18, 2013

सुख से रहता हूँ series का छठा (6) छंद - इसीलिये बेफिक्र सदा मैं , सुख से रहता हूँ

सुख   से   रहता हूँ series का छठा छंद -

जग में सुख सब खोजा करते,जग दुखमय मैं कहता हूँ 

इसीलिये   बेफिक्र   सदा   मैं  ,  सुख   से   रहता हूँ

Sunday, November 17, 2013

सुख से रहता हूँ series का पाँचबां छंद ---इसीलिये बेफिक्र सदा मैं , सुख से रहता हूँ

सुख   से   रहता हूँ series का पाँचबां छंद -

नहीं किसी से बड़ा मानता , नहीं किसी से छोटा हूँ 

इसीलिये   बेफिक्र   सदा   मैं  ,  सुख   से   रहता हूँ

Thursday, November 14, 2013

सुख से रहता हूँ series का चौथा छंद - इसीलिये बेफिक्र सदा मैं , सुख से रहता हूँ

सुख   से   रहता हूँ series का चौथा छंद -

औरों का कर्ता बना कभी ना , नहीं किसी से डरता हूँ 

इसीलिये   बेफिक्र   सदा   मैं  ,  सुख   से   रहता हूँ

Wednesday, November 13, 2013

सुख से रहता हूँ series का तीसरा छंद - "इसीलिये बेफिक्र सदा मैं , सुख से रहता हूँ"

सुख   से   रहता हूँ series का तीसरा छंद -

परिणमन स्वतंत्र प्रत्येक द्रव्य का,यही मान के बैठा हूँ 

इसीलिये   बेफिक्र   सदा   मैं  ,  सुख   से   रहता हूँ

Tuesday, November 12, 2013

सुख से रहता हूँ series का दूसरा छंद - इसीलिये बेफिक्र सदा मैं , सुख से रहता हूँ

सुख से रहता हूँ series का दूसरा छंद -

होना है सो निश्चित है , यह सच स्वीकार के बैठा हूँ 

इसीलिये   बेफिक्र   सदा   मैं  ,  सुख   से   रहता हूँ

Monday, November 11, 2013

इसीलिये बेफिक्र सदा मैं , सुख से रहता हूँ

जितना बोलूँ,जिससे बोलूँ ,सब सच ही कहता हूँ 

इसीलिये  बेफिक्र  सदा  मैं  ,  सुख  से  रहता हूँ

Thursday, October 31, 2013

क्यों इक दिन भी अंधेरा हो ,क्यों ना हों प्रतिदिन दीपावलियाँ

जीवन के प्रतिदिन दीपावली हो  (कविता )
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

प्रतिदिन इक इक दीप जले , बन जाए इक दिन दीपावलियाँ 
बर्ष यदि अन्धकारमयी हो,इक दिन की व्यर्थ हें फुलझड़ियाँ 
आओ प्रतिदिन - प्रतिपल ही हम , खुशहाली के  दीप जलाएं 
क्यों इक दिन भी अंधेरा हो ,  हों ना क्यों प्रतिदिन दीपावलियाँ 

Wednesday, October 9, 2013

हमें तो है नहीं मालूम,किन निगाहों से तकते हें लोग

गुणों को ढकते हें लोग  (कविता)
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 
हमें तो है नहीं मालूम,किन निगाहों से तकते हें लोग 
कमियों  को  उभारें ये , हमारे गुणों को ढकते हें लोग 

बेखौफ़ यूं तीर ना छोड़ो ,तरकस किसी के खाली नहीं हें

बेखौफ़ यूं तीर ना छोड़ो ,तरकस किसी के खाली नहीं हें 
(कविता)
- परमात्म प्रकास भारिल्ल 

बेखौफ़ यूं तीर ना छोड़ो ,तरकस किसी के खाली नहीं हें 
तीरों के बदले फूल नहीं बरसेंगे ,  हर कोई माली नहीं है 
माली ! काँटों की चुभन खुद पचाकर ,सौरभ  लुटाता है 
पर ये जमाना सौरभ में खोकर, माली को भूल जाता है 

Monday, October 7, 2013

हमें धर्म से भी संसार ही चाहिए , हमें तो अमृत पीकर भी नशा ही चाहिए

कमाल हें हम !
हमें धर्म से भी संसार ही चाहिए 
हमें तो अमृत पीकर भी नशा ही चाहिए 
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

अरे ! हें न नशे की दुकानें , वहां जा न ? यदि नशा ही चाहिए तो। 

यदि संसार ही बढ़ाना है तो बिखरा तो पडा है , सराफ की दूकान में शराब क्या खोजता है ?

यदि तू संसार से उब गया हो , 
त्रस्त हुआ हो , 
अब तुझे कहीं और कोई आकर्षण न रहा हो , 
संसार में दुःख ही दुःख दिखाई देता हो , 
यदि तू अब सच्चे सुख की तलाश में हो , 
तो धर्म की शरण में आ !
तेरा कल्याण होगा 

Tuesday, September 10, 2013

जाने उन्हें कैसे , जिन्दगी सुहाना सफ़र लगता है

जाने उन्हें कैसे , जिन्दगी सुहाना सफ़र लगता है 
(कविता)

भरपूर उजालों में , अपने ही सायों से डर  लगता है 
जाने उन्हें कैसे , जिन्दगी सुहाना सफ़र लगता है 

Sunday, September 8, 2013

करने बैठे लोगों की गिनती , खुद को भूल जाते हें लोग

करने बैठे लोगों की गिनती , खुद को भूल जाते हें लोग
(कविता)
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

करने बैठे लोगों की गिनती , खुद को भूल जाते हें लोग 
इस तरह लोगों की भीड़ में ,  खुद को जुदा पाते हें लोग