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Monday, July 20, 2015

देश की राजगद्दी कोई बच्चों का खेल नहीं है क़ि कोई भी चलता फिरता उस पर जा बिराजे , यदि डर लगता है क़ि हमसे गलती हो सकती है तो क्या जरूरी है क़ि आप वहां बिराजें , अन्य लोग हें जो यह काम आपसे बेहतर कर सकते हें , गलती रहित ढंग से कर सकते हें

जो देश के भाग्य विधाता हें ,क्या यह उनका कर्तव्य नहीं है क़ि वे इस बात का ख्याल भी रखें क़ि क्या उनका कर्तव्य है ,क्या प्रतिबंधित है , क्या गलती है और क्या दंडनीय अपराध है ?
किसी ९९% दक्ष व्यक्ति को कार चलाने की भी इजाजत नहीं दी जा सकती है तो सरकार चलाने की इजाजत कैसे दी जा सकती है ?
यदि एक ९९% दक्ष व्यक्तिवाहन चलाएगा तो निश्चित ही वह कुछ लोगों की जान के लिए खतरा पैदा करेगा , और इसी प्रकार यदि कोई कम संवेदनशील व्यक्ति सरकार चलाएगा तो पूरा देश खतरे में पड़ जाएगा .
क्या कोई ९९ % दक्ष डाक्टर से अपने ह्रदय का आपरेशन करबायेगा ? नहीं न ? उसके लिए १०० % दक्ष डाक्टर चाहिये तो फिर जिसे स्वयं गलती होने का डर सताता हो उसके भरोसे देश कैसे छोड़ा जा सकता है ?
क्या सही है और क्या गलत यह तो स्पष्ट रूप से परिभाषित होना ही चाहिए और एक शासक के लिए भूल अपराध है , उसे दण्ड मिलना ही चाहिए .
देश की राजगद्दी कोई बच्चों का खेल नहीं है क़ि कोई भी चलता फिरता उस पर जा बिराजे , यदि डर लगता है क़ि हमसे गलती हो सकती है तो क्या जरूरी है क़ि आप वहां बिराजें , अन्य लोग हें जो यह काम आपसे बेहतर कर सकते हें , गलती रहित ढंग से कर सकते हें , आप उन्हें काम करने दें और अपने आप को भूल करने और दण्ड के भागी बनने से बचाए रखें .
यदि आपको डर लगता है क़ि यदि गलती से ही छोटी सी भी भूल हो गई तो लोकपाल दण्ड देगा तो हमें भी डर लगता है क़ि यदि हमारा नेता भूल करेगा तो देश बर्बाद हो जाएगा .
हमें नहीं चाहिए ऐसा भाग्य विधाता जो सम्पूर्ण न हो .

Tuesday, September 3, 2013

इसके लिए करना क्या है ? बस जो पैसा व्यर्थ पेट्रोल में जला रहे हें बस उसी पैसे से infrastructure विकसित कर लीजिये।

मोइली जी ! ये हिन्दुस्तानी बाँकुरे जो heavy traffic jam से और , पेट्रोल की इतनी मंहगी कीमत से नहीं रुके वे तुम्हारे पेट्रोल कर्फ्यू से कैसे रुक जायेंगे ?
अरे ! आप दिन में सिर्फ २ घंटे ही पेट्रोल पम्प खुले रखिये तब भी देख लीजिये कि उतना ही पेट्रोल बिक गाता जितना २४ घंटे में बिकता है। 

अब यूं तो मैं राजनैतिक व्यक्ति नहीं हूँ और न ही मैं राजनीति समझता हूँ और इसी लिए इस बिषय पर कुछ लिखता बोलता नहीं हूँ , हालांकि विचार तो बहुत आते हें। 
मैं यही सोचकर चुप रह जाता हूँ की जो मुझे दिखता है और समझ में आता है वह तो सबको समझ आता ही होगा न ?
फिर भी नहीं करते हें तो जरूर कोई मजबूरी होगी या मेरे सोच में ही कोई गलती होगी , पर जब अज ऐसी - ऐसी बातें चल रही हें तो मैं भी क्यों चुप रहूँ , अपने पेट की मरोड़ को क्यों नहीं शांत करलूं -

- मैं देखता हूँ कि बम्बई हो या दिल्ली या कोई और metropolitan city , सब जगह इतना  traffic jam रहता है की लोग १ घंटे का सफ़र २से २.३० घंटे में तय करते हें।  जाहिर है कि उस पूरी अवधि में कार का ac और इंजिन तो चालू रहता ही है , सो भैये दो से ढाई गुना पेट्रोल जलता है , यदि यही बचाया जा सके तो सारा संकट ही हल हो जाए। 

इसके लिए करना क्या है ? बस जो पैसा व्यर्थ पेट्रोल में जला रहे हें बस उसी पैसे से infrastructure विकसित कर लीजिये। 

चौड़ी सड़कें , over bridge , sub way , आदि का निर्माण कीजिये। 
ऐसे public transport system का विकास कीजिये जो सुविधाजनक और सम्मानजनक भी हो , किसी कार बाले को उसमें चड़ने में शर्म न आये , आराम और गौरव महसूस हो बस , अपने आप सड़क की भीड़ कम हो जायेगी। 

अरे सिर्फ पेट्रोल ही नहीं बर्बाद होता है , देश के कितने productive human working hours  बर्बाद होते हें , क्या यह criminal wastage नहीं है ?
आदमी वमुश्किल दिन में १०-१२ घंटे सक्रिय रहता है उसमें से चार घंटे यह ट्रैफिक नष्ट करदे टी, इसका मतलब समझते हें १/३ ( एक तिहाई ) जिन्दगी। 

और भी बहुत मसले हें पर अभी इतना ही। 

Friday, June 8, 2012

जिनके सर पर मात्र घर चलाने की जबाबदारी हो , जब वे भी बिकने पर मजबूर हो जाते हें तब उनके क्या कहने जिनके पास बड़ी - बड़ी पार्टियां हें चलाने को .

बस एक बागबां काफी है , कितने ही चमन सजाने को 

जिनके सर पर मात्र घर चलाने की जबाबदारी हो , जब वे भी बिकने पर मजबूर हो जाते हें तब उनके क्या कहने जिनके पास बड़ी - बड़ी पार्टियां हें चलाने को .
घर के मालिक को चार को पालना है तो पार्टी के मालिक को ४ करोड़ को .
इसलिए मैं कहता हूँ क़ि ये पार्टियां किसी का भला नहीं कर सकतीं हें .
इनकी धार कुंद हो गई है .
इनकी प्राथमिकता देश नहीं रहा , पार्टियां हो गई हें .
इसलिए इन पार्टियों का चक्कर छोड़ो ?
यदि किसी को देश का कुछ भला करना है तो पार्टी मत बना लेना .
यदि पार्टी बना ली तो देश एक तरफ रह जाएगा , बस पार्टी ही सब कुछ हो जायेगी .
ये पार्टी बाले बीबी-बच्चों बालों से भी ज्यादा मजबूर होते हें बेचारे.
अब वेचारे अन्ना को ही ले लो !
अपने इर्दगिर्द सिर्फ दो-चार ही को तो इकट्ठा किया है फिर भी कितनी दुर्गत हो रही है ,
कभी कोई कुछ बोलता है , कोई कुछ टार्राता है .
अब अन्ना किस किस को तो चुप करें और किस-किस की सफाई दें ?
फिर वेचारों को बच्चे पालने का भी तो कोई अनुभव नहीं है .
यदि कोई तीन बच्चों को पाल ले तो देश चलाना सीख जाता है .
बिना बच्चों वाला तो स्वयं अपने आपको ही नहीं संभाल पाता है .
फिर भी कोई बात नहीं .
यह भी तो महत्वपूर्ण सबाल है क़ि "अन्ना नहीं तो कौन "

Thursday, June 7, 2012

कोई ऐसा चाहिए जो कांच के घर में न बैठा हो , अब रामदेवजी को ही लेलो , अचानक उनके स्वरों में अति विनम्रता अनुभव की जाने लगी है . क्यों ? कहीं इनकम टेक्स के नोटिस का कमाल तो नहीं ?

कोई ऐसा चाहिए जो कांच के घर में न बैठा हो ,
अब रामदेवजी को ही लेलो , 
अचानक उनके स्वरों में अति विनम्रता अनुभव की जाने लगी है .
क्यों ?
कहीं इनकम टेक्स के नोटिस का कमाल तो नहीं ?
इसीलिये कहता हूँ क़ि आप ही सोचिये ,
" अन्ना नहीं तो कौन ? "
जिनके बीबी बच्चे हें , उनका मुंह बंद कर देने के लिए तो वे ही काफी हें .
यदि वे न भी कर पायें तो उनके नाम पर दूसरे लोग करबा देंगे .
जिनके पास खोने को सत्ता है , चुप रहना उनकी मजबूरी है , आखिर सत्ता खोने का डर जो है , हमारे मनमोहनसिंगजी ?
जिनके पास धन है , उन्हें उसकी चिंता है और जिनके पास धंधा है उन्हें उसकी .
तब ऐसा ही कोई चाहिए जिसके पास न तो यह सब हो और न ही इस सबकी जिसे परवाह हो .
इसीलिये मैं कहता हूँ क़ि
" अन्ना नहीं तो कौन "

अपने सभी सवालों का जबाब पाने के लिए पढ़िए पूरा आलेख
पूरा आलेख पढने के लिए नीले लिंक पर क्लिक कीजिये -
http://parmatmprakashbharill.blogspot.in/2011/11/blog-post_2742.html?spref=fb

Friday, June 1, 2012

अरे ! इस विशाल जन समूह ने आपको अपना भाग्य विधाता बना लिया है , अपना भगवान बना लिया है , इससे अधिक किसी को और क्या चाहिए ?

हमारे अपने जनप्रतिनिधियों को एक आह्वान -
आप हमारे सौभाग्य बनना चाहते हें या दुर्भाग्य यह निर्णय आपको करना है 
हमने अपने माता-पिता को चुना नहीं है पर आपको हमने चुना है , अपना सौभाग्य मानकर चुना है .
हमने अपना वर्तमान और भविष्य भी आपके सुपुर्द कर दिया है .
यदि हो सके तो इस विशाल जन समूह के विशवास का खून मत कीजिये .
ये , बो , हम सब आपके उसी स्नेह और संरक्षण के हकदार हें जो आपके अपने परिजनों को सहज ही प्राप्त है .
हमने तो आपको चुन लिया है अब " चुनिन्दा " बनना आपकी जबाबदारी है .
आप हमारी भूल न बनें , इसमें आपकी भी हार है .
हमारे सौभाग्य में आपका भी सौभाग्य है .
आपको और क्या पाना है ?
क्या पाना आपको शेष रह गया है ?
अरे ! इस विशाल जन समूह ने आपको अपना भाग्य विधाता बना लिया है , अपना भगवान बना लिया है , इससे अधिक किसी को और क्या चाहिए ?
अरे ! भगवान को भी किसी ने चुना नहीं है पर आपको चुना है .
आप नहीं ! पर वे लोग जो गलत तरीके अपनाकर सिर्फ दौलत बटोरने में ही व्यस्त रहते हें , क्या उन्होंने कभी विचार भी किया है क़ि यह सब किसके लिए ?
क्या अपने उन स(क)पूतों के लिए , जिन्हें आपने चुना नहीं हें , जिन्होंने आपको चुना नहीं है .
शायद कभी चुन भी न पायें , क्योंकि वे हम जैसे नादान थोड़े ही हें !
वे तो आपको बखूबी जानते हें , पहिचानते हें , आप जैसे हें वैसा ही पहिचानते हें .
आप उनके लिए भ्रष्ट होते (बनते) हें और वे आपको भ्रष्ट जानकर , मानकर अस्वीकार कर देते हें . उन्हें आपके प्रति सन्मान नहीं होता , आदर नहीं होता .
ज़रा कल्पना तो कीजिये यदि आप संत होते , आपका आचरण पवित्र होता , क्या तब भी ऐसा ही होता ?
क्या तब भी वे आपको अस्वीकार कर देते ?
तब क्या वे आपके चरणों में न लोट जाते ?
आप ही विचार करिये क़ि अपने इस आचरण से आखिर आपको मिला क्या ?
क्या आपने " अपनों " को ही नहीं खो दिया ?
" माया मिली न राम "
जो दौलत मिली वह तो भोग नहीं सकते क्योंकि पकडे जाने का भय है और आपके अपने और आपसे दूर हो गए .
आइये ना ! हमारे अपने बन जाइए ना !

Thursday, May 31, 2012

हमने अपने माता-पिता को चुना नहीं है पर आपको हमने चुना है , अपना सौभाग्य मानकर चुना है .


हमारे अपने जनप्रतिनिधियों  को एक आह्वान -
आप हमारे सौभाग्य बनना चाहते हें या दुर्भाग्य यह निर्णय आपको करना है 
हमने अपने माता-पिता को चुना नहीं है पर आपको हमने चुना है , अपना सौभाग्य  मानकर चुना है .
हमने अपना वर्तमान और भविष्य भी आपके सुपुर्द कर दिया है .
यदि हो सके तो इस विशाल जन समूह के विशवास का खून मत कीजिये .
ये , बो , हम सब आपके उसी स्नेह और संरक्षण के हकदार हें जो आपके अपने परिजनों को सहज ही प्राप्त है .
हमने तो आपको चुन लिया है अब " चुनिन्दा " बनना आपकी जबाबदारी है .
आप हमारी भूल न बनें , इसमें आपकी भी हार है .
हमारे सौभाग्य में आपका भी सौभाग्य है .
आपको और क्या पाना है ?
क्या पाना आपको शेष रह गया है ?
अरे ! इस विशाल जन समूह ने आपको अपना भाग्य विधाता बना लिया है , अपना भगवान बना लिया है , इससे अधिक किसी को और क्या चाहिए ?
अरे ! भगवान को भी किसी ने चुना नहीं है पर आपको चुना है .
आप नहीं ! पर वे लोग जो गलत तरीके अपनाकर सिर्फ दौलत बटोरने में ही व्यस्त रहते हें , क्या उन्होंने कभी विचार भी किया है क़ि यह सब किसके लिए ?
क्या अपने उन स(क)पूतों के लिए , जिन्हें आपने चुना नहीं हें , जिन्होंने आपको चुना नहीं है .
शायद कभी चुन भी न पायें , क्योंकि वे हम जैसे नादान थोड़े ही हें !
वे तो आपको बखूबी जानते हें , पहिचानते हें , आप जैसे हें वैसा ही पहिचानते हें .
आप उनके लिए भ्रष्ट होते (बनते) हें और वे आपको भ्रष्ट जानकर , मानकर अस्वीकार कर देते हें . उन्हें आपके प्रति सन्मान नहीं होता , आदर नहीं होता .
ज़रा कल्पना तो कीजिये यदि आप संत होते , आपका आचरण पवित्र होता , क्या तब भी ऐसा ही होता ?
क्या तब भी वे आपको अस्वीकार कर देते ?
तब क्या वे आपके चरणों में न लोट जाते ?
आप ही विचार करिये क़ि अपने इस आचरण से आखिर आपको मिला क्या ?
क्या आपने " अपनों " को ही नहीं खो दिया ?
" माया मिली न राम "
जो दौलत मिली वह तो भोग नहीं सकते क्योंकि पकडे जाने का भय है और आपके अपने और आपसे दूर हो गए .
आइये ना ! हमारे अपने बन जाइए ना !

Tuesday, May 29, 2012

Tuesday, December 27, 2011

आखिर हमें एक लूला लंगडा लोकपाल मिल ही गया


ऐ मेरे वतन के लोगों ! बधाई ! 
आखिर हमें एक लूला लंगडा लोकपाल मिल ही गया .
इस लूले लंगड़ेपन का श्रेय सिर्फ सरकार को ही नहीं जाता , सम्पूर्ण विपक्ष भी इसके लिए समान रूप से जिम्मेदार है , अन्यथा यदि विपक्ष एक मजबूत लोकपाल चाहता तो वह संवैधानिक दर्जे के मामले की तरह ही इसको भी इस कमजोर रूप में पास नहीं होने देता .
अब एक बात जान लीजिये क़ि यदि मजबूत लोकपाल चाहिए तो इस संसद से तो मिलेगा नहीं , इस संसद से तो क्या किसी संसद से नहीं मिलेगा .
आज जो लोग सड़क पर खड़े मजबूत लोकपाल की मांग कर रहे हें यदि कल उन्हें ही संसद में बिठा दिया जाये तो उन्हें भी वह मजबूत लोकपाल डराने और चिन्तित करने लगेगा .
जालिम ये सफेदी चीज ही ऐसी है , सबको डर लगने लगता है क़ि इसकी सफेदी पर कोई दाग न लग जाए .
मन के मैलेपन का किसी को कोई डर नहीं , काला मन चलेगा बस ऊपर से सफ़ेद झक कुर्ता होना चाहिए , कुरते पर दाग नहीं चाहिए .
ठीक है संसद सर्वोपरि होनी चाहिए पर तब संसद ही क्यों नहीं लोकपाल बन जाती , एक जांच एजेंसी संसद के प्रति जबाबदेह हो और प्राप्त शिकायतों की जांच करे और निष्कर्षों पर संसद कार्यवाही करे --------------------------

Monday, December 26, 2011

देश की राजगद्दी कोई बच्चों का खेल नहीं है क़ि कोई भी चलता फिरता उस पर जा बिराजे , यदि डर लगता है क़ि हमसे गलती हो सकती है तो क्या जरूरी है क़ि आप वहां बिराजें , अन्य लोग हें जो यह काम आपसे बेहतर कर सकते हें , गलती रहित ढंग से कर सकते हें ,


जो देश के भाग्य विधाता हें ,क्या यह उनका कर्तव्य नहीं है क़ि वे इस बात का ख्याल भी रखें क़ि क्या उनका कर्तव्य है ,क्या प्रतिबंधित है , क्या गलती है और क्या दंडनीय अपराध है ?
किसी ९९% दक्ष व्यक्ति को कार चलाने की भी इजाजत नहीं दी जा सकती है तो सरकार चलाने की इजाजत कैसे दी जा सकती है ?
यदि एक ९९% दक्ष व्यक्तिवाहन चलाएगा तो निश्चित ही वह कुछ लोगों की जान के लिए खतरा पैदा करेगा , और इसी प्रकार यदि कोई  कम संवेदनशील व्यक्ति सरकार चलाएगा तो पूरा देश खतरे में पड़ जाएगा .
क्या कोई ९९ % दक्ष डाक्टर से अपने ह्रदय का आपरेशन करबायेगा ? नहीं न ? उसके लिए १०० % दक्ष डाक्टर चाहिये तो फिर जिसे स्वयं गलती होने का डर सताता हो उसके भरोसे देश कैसे छोड़ा जा सकता है ?
क्या सही है और क्या गलत यह तो स्पष्ट रूप से परिभाषित होना ही चाहिए और एक शासक के लिए भूल अपराध है , उसे दण्ड मिलना ही चाहिए .
देश की राजगद्दी कोई बच्चों का खेल नहीं है क़ि कोई भी चलता फिरता उस पर जा बिराजे , यदि डर लगता है क़ि हमसे गलती हो सकती है तो क्या जरूरी है क़ि आप वहां बिराजें , अन्य लोग हें जो यह काम आपसे बेहतर कर सकते हें , गलती रहित ढंग से कर सकते हें , आप उन्हें काम करने दें और अपने आप को भूल करने और दण्ड के भागी बनने से बचाए रखें .
यदि आपको डर लगता है क़ि यदि गलती से ही छोटी सी भी भूल हो गई तो लोकपाल दण्ड देगा तो हमें भी डर लगता है क़ि यदि हमारा नेता भूल करेगा तो देश बर्बाद हो जाएगा .
हमें नहीं चाहिए ऐसा भाग्य विधाता जो सम्पूर्ण न हो .

Sunday, December 25, 2011

जब कोई भी गलत नहीं रहेगा तो क़ानून का दुरूपयोग होगा कैसे ?


माना क़ि लोकपाल एक और थानेदार बन जाएगा जो लोगों को डराएगा या लोग जिससे डरेंगे , हो सकता है क़ि कालान्तर में वह लोकपाल भी आपको न डराने की कीमत बसूलने लगे ,पर क्या फर्क पड़ता है ,अब तक यह कीमत १२५ करोड़ लोग चुका रहे हें फिर कुछ लाख लोग और इसमें जुड़ जायेंगे .
जब ये कुछ लाख सक्षम लोग इस श्रेणी में आ जायेंगे तो मार्ग निकल आयेगा .
डराना तो हमें कुछ लाख लोगों को भी नहीं है , वे भी तो हमारे ही बंधु - बांधव हें , दरअसल गलत तो वे भी नहीं हें , गलत तो कुछ गिने चुने लोग हें और उन्हीं चुनिन्दा लोगों को देखकर इन कुछ लाख लोगों के पेट में भी मरोड़ उठती है क़ि  " वे कमा गए - हम रह गए " .
जब ये लोग उन लोगों को दण्ड पाता देखेंगे तो ये तो बने बनाए शरीफ हें ही , इन्हें शरीफ बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी .
सचमुच तो यदि दण्ड पाना निश्चित हो जाए तो वे कुछ गिने चुने लोग भी गलती नहीं करें , वे तो इस फार्मूले पर ही काम करते हें क़ि " रिश्वत पकड़ी जाये तो छूट जाएँ रिश्वत देकर "
यदि छूटना संभव ही न रहे तो वे भी ऐसा नहीं करेंगे .
जब कोई भी गलत नहीं रहेगा तो क़ानून का दुरूपयोग होगा कैसे ?

Friday, December 23, 2011

जिन्हें लोकपाल से डर लगता है वे थोड़े दिन डरकर जीना भी सीखलें , अब तक लोगों को डराया तो बहुत है ,अन्यथा सुधर जाएँ , आपको भी कौन रोकता है


आज राजनीति में सभी व सात्विक , इमानदार व्यक्ति के लिए स्थान ही नहीं बचा है , इस तरह के लोगों की अंतिम पीढी भी अब धीरे धीरे ख़त्म होने जा रही है .
माना क़ि लोकपाल विल के बाते में टीम अन्ना की मांगें ज्यादा कठोर हें पर यह कठोरता आज की आवश्यकता है , जब इस लोकपाल की कृपा से एक ब़ार फिर राजनीति का पर्याप्त शुद्धीकरण हो जाएगा तब फिर से संत ह्रदय लोगों के लिए राजनीति में जगह खाली होगी . 
जिन्हें लोकपाल से डर लगता है वे थोड़े दिन डरकर जीना भी सीखलें , अब तक लोगों को डराया तो बहुत है ,अन्यथा सुधर जाएँ , आपको भी कौन रोकता है .
यह तो सब समझ सकते हें क़ि डरना तो उन्हें भी होगा जो गलत नहीं हें ,पर इलाज क्या है ? 

Thursday, December 22, 2011

प्रसिद्द झूंठा और भ्रष्ट हवलदार जो कहे सो सच्चा और एक इमानदार नागरिक को अपनी बात कहने तक की इजाजत नहीं ------ लोकपाल के रूप में किसी को यह अधिकार देने की कोशिश की जा रही है क़ि कोई इनका भी हाथ पकड़ सके तो कैसे काँप रहे हें ये ?--


एक हवलदार जो क़ि भ्रष्टाचार का प्रतीक ही बन गया है , जिस दिन अपने ऑफिसरों के द्वारा निर्धारित टार्गेट की पूर्ती के लिए चालान बुक लेकर चौराहे पर खडा हो जाता है और बाबजूद आपके सही होने के आपका चालान काट देता है , अब आपकी कहीं कोई सुनवाई नहीं होती है और अनन्त अधिकारों से सज्जित पोरा का पूरा तंत्र उसके पीछे , उसके साथ खडा है , उसकी मदद के लिए .
यदि आप कोर्ट में भी जाते हें तो जज सिर्फ प्पोंचता है क़ि जुर्म स्वीकार है ? आपके न करने या सफाई देने की कोशिश करने पर आपके पेनल्टी हर ब़ार दुगनी करदी जाती है .
यानि क़ि प्रसिद्द झूंठा और भ्रष्ट हवलदार जो कहे सो सच्चा और एक इमानदार नागरिक को अपनी बात कहने तक की इजाजत नहीं .
अब तक इस आधार पर चल रहा है यह देश .
अब जब लोकपाल के रूप में किसी को यह अधिकार देने की कोशिश की जा रही है क़ि कोई इनका भी हाथ पकड़ सके तो कैसे काँप रहे हें ये ?

कितनी तकलीफ हो रही है हमारी अपनी इस संसद को .

एक common man के ऊपर कितने कठोर क़ानून लागू हें और रोज - रोज नए नए क़ानून आनन् फानन में संसद में पास हो जाते हें .
एक सामान्य नागरिक के ऊपर कितने थानेदार बैठे हें , कितने इन्स्पेटर बैठे हें , वह कदम कदम पर डराया , धमकाया और लूटा जाता है .
अब यदि एक शिकंजा उन लोगों के ऊपर कसने की मांग की जा रही जो पूरे प्रशासन तंत्र में कहीं न कहीं बैठे हें, उसके हिस्सा हें , तो कितनी तकलीफ हो रही है हमारी अपनी इस संसद को .

Saturday, November 5, 2011

अन्ना नहीं तो कौन ? आगे बढ़ने से पहिले ज़रा विचार कर लेना - यदि टीम अन्ना थककर ठहर गई या टूट गई तो ?

क्या हम चोर के बह्कावे में आकर पुलिस को ठुकरादें , तब हमें चोरों से कौन बचाएगा ? 
जब चोर हमें लूट रहा हो और बचाने को पुलिस वाला आजाये तब क्या हम तलासने को बैठेंगे क़ि कहीं यह पुलिस वाला रिश्वत तो नहीं खाता है या शराब तो नहीं पीता है या किस जाति का है या अपनी पत्नी से कैसा व्यवहार करता है ?
अन्ना नहीं तो कौन  ? आगे बढ़ने से पहिले ज़रा विचार कर लेना -
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 





यदि टीम अन्ना थककर ठहर गई या टूट गई तो  ?
क्या होगा देश का , हमारा और भ्रष्टाचार का ?
टीम अन्ना कैसी है , उसके सदस्य कैसे हें इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है यह सोचना क़ि यदि टीम अन्ना न रही तब क्या होगा ?
गुलामी के खिलाफ लड़ाई गांधी के नेतृत्व में लड़ी गई और आजादी तो मिल गई ,पर आज तक भ्रष्टाचार के खिलाफ कौन इतने प्रभावशाली ढंग से खडा हुआ है ?
क्या हमें भ्रष्टाचार से मुक्ति की जरूरत नहीं है ? यदि है तो हमारे पास इस काम के लिए दूसरा विकल्प क्या है ?
तब हम कैसे टीम अन्ना को छोड़ सकते हें ? वे जो हें जैसे हें .
क्या हम चोर के वह्कावे में आकर पुलिस को ठुकरादें , तब हमें चोरों से कौन बचाएगा ? 
जब चोर हमें लूट रहा हो और बचाने को पुलिस बाला आजाये तब क्या हम तलासने को बैठेंगे क़ि कहीं यह पुलिस वाला रिश्वत तो नहीं खाता है या शराब तो नहीं पीता है या किस जाति का है या अपनी पत्नी से कैसा व्यवहार करता है ?
यदि पुलिस भी गलत है तो चोर सही कैसे हो जाते हें ?
यदि दो में से एक चुनना ही मजबूरी है तो वेहतर विकल्प कौनसा है ? 

यदि टीम अन्ना का यह प्रयोग असफल हो गया तो क्या होगा ? फिर कौन , कब और कैसे यह साहस कर पायेगा ?
तब क्या हम इसी गंदगी के बीच रहने के लिए और शोषण सहने के लिए अभिशप्त नहीं रह जायेंगे ?

और फिर हमें करना ही क्या है ? बदले में हमसे कौन क्या मांग रहा है ? 
मात्र मौन समर्थन ही तो ?
हम चुप तो रह सकते हें न ?
किसी और के लिए नहीं , अपने लिए अपने हित के लिए .

जब से टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक प्रभावशाली और निर्णायक मुहिम छेड़ी है ,तबसे उन सभी के चरित्र हनन के अनेकों प्रयास (अभियान) भी प्रारम्भ हो गए हें .
हमें (भारत की जनता को) यह समझ लेना चाहिए क़ि ये अभियान किसी अन्ना या केजरीवाल या किरण वेदी के खिलाफ नहीं वल्कि हमारे हितों के खिलाफ हें .

" देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाना यह देश के हित में है , देश की जनता के हित में है , हमारे हित में है "
यदि आप उक्त कथन से सहमत हें तो इसके मायने विल्कुल साफ़ हें क़ि इस तरह के अभियान को कमजोर करने वाला कोई भी प्रयास हमारे हित के विरुद्ध है .

ऐसी किसी बुराई क़ि विरुद्ध कोई प्रभावशाली अभियान प्रारम्भ करना और उस पर कायम रहना , टिक पाना कोई साधारण काम नहीं है , इसके लिए दृढ संकल्प , असीम साहस , दूरदर्शिता ,धैर्य और निडरता की आवश्यकता है और यह सब कुछ रोज - रोज नहीं हो सकता है नहीं हुआ करता है , यह सदियों में एकाध ब़ार हो पाता है .

इस तरह के अभियानों से जिन निहित स्वार्थी तत्वों के हितों को चोट पहुँचती है स्वाभाविक ही है क़ि वे इन प्रयासों को आघात पहुंचाने के लिए चौतरफा प्रयास प्रारम्भ कर दें .
इन आन्दोलन कारियों का चरित्र हनन उनके इन्हीं प्रयासों की एक कड़ी है .

देश के एक सजग नागरिक होने के नाते हमारा कर्तव्य है क़ि हम किसी to the point thinking करें और जो कुछ चल रहा है उसका विश्लेषण करें .
निम्नलिखित कुछ विन्दु (points) विचारणीय हें -

- अन्ना और उनकी टीम कोई सन्यासी या भगवान नहीं हें क़ि हम उनसे अत्यंत आदर्श व्यवहार की उम्मीदें बांधलें , कोई छोटी बड़ी त्रुटी उनके व्हाव्हार में भी हो ही सकती है .
  और फिर किसी भी साधु - संत का भी अतीत तो दूषित हो ही s
 कब हम किसी सर्जन से अपने ह्रदय का आपरेशन करवाना चाहते हें तो मात्र इस बारे में सुनिश्चित करना चाहते हें क़ि वह एक अच्छा , दक्ष शल्य चिकित्सक है . हमें इस बात से कोई सारोकार नहीं होता है क़ि कहीं वह जुआ तो नहीं खेलता है या उसका किसी के साथ कोई चक्कर तो नहीं चल रहा है . तब यहाँ क्यों हम इस तरह की पंचायतों में पड़ें , न तो वे हमसे कोई चरित्र प्रमाण पत्र मांग रहे हें और न ही यह हमारी जिम्मेबारी है .

- टीम अन्ना के कुछ सदस्यों के विरुद्ध जो आरोप सामने आए हें उनसे तो स्वत: ही उन्हें चरित्र प्रमाणपत्र मिल रहा है ,क्योंकि -
    सर्व साधन सम्पन्न सरकार , अपनी सम्पूर्ण शक्ति झोंक कर भी ऐसा कोई गंभीर आरोप नहीं लगा सकी है जो क़ि इन सदस्यों को पतित साबित करता हो , इससे तो यह़ी साबित होता है इन लोगों के अपने जीवन में ऐसा कोई भी गंभीर अपराध नहीं किया है जो समाज या सरकार की द्रष्टि में अपराध या हें कार्य हो , यह तो इस सब के लिए चरित्र प्रमाण पत्र के समान है .

 - जिन लोगों ने एक सामान्य जन और सर्व साधारण नागरिक के रूप में इस काजल की कोठरी में अपना सारा जीवन ही व्यतीत कर लिया हो उनके जीवन में सयोग वश या परिस्थिति के अनुरूप 
(बिसम परिस्थिति में) यदि कोई हो भी गई हो तो यह कोई गंभीर बात नहीं हुआ करती क्योंकि वह उनके सामान्य चरित्र का अंग नहीं है .

- सभी लोगों में समय के साथ परिवर्तन आता है , यदि किसी व्यक्ति से कभी कोई अपराध बन भी पडा हो याजो अपराधी वृत्ति का ही रहा हो पर आज वह सम्पूर्णत: बदल भी सकता है , ऐसे कई उदाहरण हें ( वाल्मीकि जो पहिले लुटेरे थे फिर संत हो गए) ऐसे में हम उनके आज के व्यक्तित्व का विचार करें या पूर्व का .

- यदि किसी बड़े अभियान में कुछ ऐसे लोग भी जुड़ जाते हें ( चाहे किसी भी इरादे से सही ) जो गलत भी हों तो भी वह सम्पूर्ण अभियान गलत नहीं हो जाता है , हमें उस अभियान के गुण - दोष के बारे में अलग से विचार करना चाहिए और किसी व्यक्ति विशेष के बारे में अलग से , इस तरह के मामले में दो चीजों को जोड़कर देखना उचित नहीं है . 
आन्दोलनकारियों  के पास न तो कोई संविधान है और ना ही उसे लागू करबाने के लिए कोई सेना , पुलिस , अदालतें और प्रसाशनिक तंत्र , वे तो सड़क के साधारण लोग हें और जनता पर उनका मात्र भावात्मक नियंत्रण है ,वल पूर्वक नहीं , ऐसे में उसमें असामाजिक तत्वों और निहित स्वार्थी लोगों की घुसपैठ तो हो ही सकती है .

- जिनके दामन दागी हें और वे स्वयं सुधरना भी नहीं चाहते हें तब वे औरों को भी कलंकित बतलाकर अपनी ही जमात का अंग बतलाना चाहते हें  ( भला तेरी कमीज मेरा कमीज से उजली कैसे हो सकती है )(और भला हम कलंकित साबित हो जाने से आप कैसे पवित्र हो जाते हें  ?)  वे औरों की उजली कमीज पर भी सूक्ष्मदर्शी से दाग ढूँढने का प्रयास कर रहे हें (स्वागत है , क्योंकि कबीरदास कह गए हें- "निंदक नियरे राखिये----------"), बे कहना चाहते हें क़ि हम सब चोर-चोर मौसेरे भाई हें .
ठीक है , हम कर ही क्या सकते हें ? यदि हम कर्मफूटों के भाग्य में चोर ही बदे हें तो उन्हीं से काम चलाना पडेगा पर तब भी बड़े और छोटे में से किसे चुनना है यह भी तो विचारणीय हो सकता है  , और फिर ये तो चुनाव में खड़े ही कहाँ हें , ये तो कह रहे हें क़ि क़ानून बनाइए ताकि आप स्वयं ही सुधर सकें ,हम तो सुधरे हुए आप से ही काम चलाने को तैयार हें .

मैं न तो राजनीति में हूँ और न ही किसी दल विशेष से सम्बंधित , आगे भी कोई इरादा नहीं है .



-परमात्म प्रकाश भारिल्ल 
6 TH NOV . 2011 , 10.30 AM 

Wednesday, November 2, 2011

जिन्हें जगत रुचता नहीं , क्यों राजनीति से प्यार ,, ये भी तो पथ भ्रष्ट हें , नहीं भ्रष्ट सिर्फ सरकार


उचित यह़ी है क़ि सब अपना अपना काम करें -

जिन्हें जगत रुचता नहीं , क्यों राजनीति से प्यार 
ये  भी  तो  पथ  भ्रष्ट हें , नहीं भ्रष्ट सिर्फ सरकार 
अपना घर ना जिनसे संभला,वे क्या देश संभालेंगे 
उन्होंने देश को  लूटा  है , अब  ये  देश  लुटा  देंगे 

राजनीति में बढ़ रही , अब सन्तन की भीड़

राजनीति में बढ़ रही , अब सन्तन की भीड़ 
सत्ता अब तो ना रही  , लीडर  की जागीर 
जटा कमंडल राज करेंगे , भली करें रघुवीर   
जाने कहाँ ले जा रही,हम लोगों की तकदीर 

Tuesday, November 1, 2011

बो तो बद था , बदी उसने नहीं छोडी ,, पर तुमसे नेक पुरुषों ने , नेकी को पछाड़ा है


पिछले दिनों जिस तरह क्रूरता का प्रदर्शन करते हुए एक तानाशाह की ह्त्या की गई - 
इक नई मिसाल कायम कर , उसे (क्रूरता को ) नई जिन्दगी दी गई .

ये जिस तरह से तुमने , उस बद (नीच) को मारा है 
बदी का  ले  सहारा  फिर , बदी  को  ही  संबारा  है 
रहे  धिक्कारते  उसको , उसी की राह पर चल कर 
फिर  इक  ब़ार  रे  तुमने  ,  बदतर  को  पुकारा  है 

बो  तो  बद  था  ,  बदी  उसने  नहीं  छोडी 
पर तुमसे नेक पुरुषों ने , नेकी को पछाड़ा है

Friday, September 23, 2011

ये सच है भ्रष्ट नेताओं के हाथों ,देश लुटा जाता है

ये सच है भ्रष्ट नेताओं के हाथों ,देश लुटा जाता है

चाहें जितना टैक्स चुकादें,विकास नहीं हो पाता है

पर सीधे ना इसकी छाया, आम जनों पर पड़ती है
जनता तो हर एक कदम के , चंदे-चिट्ठे से डरती है

Tuesday, September 20, 2011

नोट कौन पहुंचाता भरकर,अपने काम कराने को

भ्रष्टाचार : दोषी कौन ? (कौन-कौन)

वोट हमी देते हें इनको , ये सरकार बनाने को
नोट कौन पहुंचाता भरकर,अपने काम कराने को


भ्रष्टाचार : दोषी कौन ? (कौन-कौन)


ये सब अपने इर्द-गिर्द हें , दोषी भ्रष्टाचार के
हाथ लाल भी किये इन्होने,मुह भी काले सरकार के