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Tuesday, October 20, 2015

परमात्म नीति - (68) - महानलोग प्रगतिशील होते हें -

कल आपने पढ़ा -

"महानलोगों की द्रष्टि मात्र अपने लक्ष्य पर होती है"
अब आगे पढ़िए 
परमात्म नीति - (68)

by- परमात्म प्रकाश भारिल्ल


महानलोग प्रगतिशील होते हें  -

इसी आलेख से -

- यदि वे समय के साथ न बदलें तो उनकी महानता तो कम नहीं होगी पर वे इतिहास के महान हो जायेंगे, वर्तमान के नहीं रहेंगे.






महानलोग प्रगतिशील होते हें. वे समय के साथ होने वाले विकास को खुले दिल से स्वीकार करते हें, उसके प्रति प्रतिरोध का भाव नहीं रखते हें. 
यदि वे विकास को स्वीकार नहीं करेंगे तो समय से पीछे छूट जायेंगे, तब वे प्रासंगिक नहीं रहेंगे.
वे तार्किक होते हें और विकास के वे पहलू जो कि तर्क की कसौटी पर खरे उतरते हें उन्हें सहज ही स्वीकृत होते हें, आखिर उनमें हिचक कैसी?
समय के साथ सबकुछ बदलता है, तकनीक, जीवनशैली, शिक्षा, आवश्यक्ताएं आदि. 
महान लोग समय के साथ कदम मिलाकर चलते हें, अमूमन वे समय से आगे बने रहने का प्रयास करते हें. 
यदि वे समय के साथ न बदलें तो उनकी महानता तो कम नहीं होगी पर वे इतिहास के महान हो जायेंगे, वर्तमान के नहीं रहेंगे.



आगे पढ़िए -


"
महानलोग उदार तो होते हें पर अपव्ययी नहीं"

कल 


 

----------------
उक्त सूक्तियां मात्र सूचिपत्र हें, प्रत्येक वाक्य पर विस्तृत विवेचन अपेक्षित है, यथासमय, यथासंभव करने का प्रयास करूंगा.

- घोषणा 


यहाँ वर्णित ये विचार मेरे अपने मौलिक विचार हें जो कि मेरे जीवन के अनुभवों पर आधारित हें.
मैं इस बात का दावा तो कर नहीं सकता हूँ कि ये विचार अब तक किसी और को आये ही नहीं होंगे या किसी ने इन्हें व्यक्त ही नहीं किया होगा, क्योंकि जीवन तो सभी जीते हें और सभी को इसी प्रकार के अनुभव भी होते ही हें, तथापि मेरे इन विचारों का श्रोत मेरा स्वयं का अनुभव ही है.

यह क्रम जारी रहेगा. 

 



- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

Monday, October 19, 2015

परमात्म नीति - (67) - महानलोगों की द्रष्टि मात्र अपने लक्ष्य पर होती है

इसी आलेख से -

- महानलोग लक्ष्यकेन्द्रित होते हें, उनकी द्रष्टि हमेशा अपने लक्ष्य पर होती है, वे कहीं अटकते नहीं, वे कहीं भटकते नहीं. 

- सामान्यलोग अपने "उपलक्ष्यों" में ही इतने उलझे रहते हें कि न तो उन्हें अपने "लक्ष्य" के बारे में सोचने का अवकाश ही होता है और न ही उसकी प्राप्ति के लिए कुछभी करने की.
- लक्ष्य की साधना के लिए आवश्यक है कि जीवन बना रहे और निर्विघ्न चलता भी रहे ---------------- इस सबके लिए प्रतिदिन हमें लोग अत्यंत आवश्यक क्रियाएं सम्पन्न करने की आवश्यक्ता होती है उन्हें "उपलक्ष्य" कहते हें.-

- 
महानलोग अपने जीवन सबसे महत्वपूर्ण पर्याप्त समय मात्र जीवन के लक्ष्य निर्धारित करने में व्यतीत करते हें. 
वे अनेक संभावनाओं पर विचार करते हें, उनके गुण-दोषों का विचार करते हें, उन्हें प्राप्त करने की अपनी क्षमताओं का आकलन करते हें, योजना बनाते हें, साधन जुटाते हें, सहयोगी एकत्र करते हें और फिर जुट जाते हें. 

- 
द्रढ़ता पूर्वक निर्णय कर लेने के बाद वे अपने उपयोग के भ्रमाते नहीं हें. कभी अटकते नहीं, कहीं भटकते नहीं.
कमसे कम समय में अपने जीवन की अत्यावश्यक व अपरिहार्य आवश्यक्ताओं की पूर्ति करके अपना अधिकतम समय अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हें. एक साधक का सा जीवन जीते हें.
ऐसे लोगों का जीवन सार्थक व उपलब्धिपूर्ण होता है.

परमात्म नीति - (67)

by- परमात्म प्रकाश भारिल्ल


महानलोगों की द्रष्टि मात्र अपने लक्ष्य पर होती है  -








महानलोग लक्ष्यकेन्द्रित होते हें, उनकी द्रष्टि हमेशा अपने लक्ष्य पर होती है, वे कहीं अटकते नहीं, वे कहीं भटकते नहीं.


सामान्य लोग अपने लिए कोई लक्ष्य ही निर्धारित नहीं कर पाते हें. 
या तो इस ओर उनका ध्यान जाता ही नहीं, या जाता भी है तो वे कोई निर्णय ही नहीं कर पाते हें. 

सामान्यत: सामान्यलोग अपने "उपलक्ष्यों" में ही इतने उलझे रहते हें कि न तो उन्हें अपने "लक्ष्य" के बारे में सोचने का अवकाश ही होता है और न ही उसकी प्राप्ति के लिए कुछभी करने की.

हमें अपने इस जीवन में जो उपलब्ध करना है उसे अपने इस जीवन का "लक्ष्य" कहा जा सकता है. 
लक्ष्य की साधना के लिए आवश्यक है कि जीवन बना रहे और निर्विघ्न चलता भी रहे ताकि अपने लक्ष्य की सिद्धी के लिए पर्याप्त ऊर्जा मिल सके, समय रहे और मष्तिष्क भी भारहीन बना रहे. इस सबके लिए प्रतिदिन हमें लोग अत्यंत आवश्यक क्रियाएं सम्पन्न करने की आवश्यक्ता होती है उन्हें "उपलक्ष्य" कहते हें.

जगत के अधिकतम लोग मात्र "उपलक्ष्यों" के लिए ही जीते हें और मर जाते हें.
उपलक्ष्यों के लिए जीवन "पशु जीवन" के सामान ही है क्योंकि पशु तो मात्र उपलक्ष्यों में ही उलझे रहते हें, बस किसी तरह आज पेट भर जाए और दिन सुरक्षित बने रहकर कट जाए; या अधिक से अधिक सन्तति उत्पन्न करना, उनका लक्ष्य इतना ही रहता है.
यदि सूत्र रूप में कहा जाए तो- "अहार, निद्रा, भय और मैथुन"
इनके अलावा उनके सामने जीवन का कोई लक्ष्य होता ही नहीं है. 




सामान्य लोग यूं ही विचारहीन रहकर ही जीवन प्रारम्भ कर देते हें और विचारहीनता की अवस्था में ही जीवन व्यतीत भी करते हें. 
शांति से बैठकर विचार करने को वे वक्त की बरबादी मानते हें.
उक्त के विपरीत महानलोग अपने जीवन सबसे महत्वपूर्ण पर्याप्त समय मात्र जीवन के लक्ष्य निर्धारित करने में व्यतीत करते हें. 
वे अनेक संभावनाओं पर विचार करते हें, उनके गुण-दोषों का विचार करते हें, उन्हें प्राप्त करने की अपनी क्षमताओं का आकलन करते हें, योजना बनाते हें, साधन जुटाते हें, सहयोगी एकत्र करते हें और फिर जुट जाते हें. 

एक बार उक्त प्रक्रिया से गुजर जाने और द्रढ़ता पूर्वक निर्णय कर लेने के बाद वे अपने उपयोग के भ्रमाते नहीं हें. कभी अटकते नहीं, कहीं भटकते नहीं.

कमसे कम समय में अपने जीवन की अत्यावश्यक व अपरिहार्य आवश्यक्ताओं की पूर्ति करके अपना अधिकतम समय अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हें. एक साधक का सा जीवन जीते हें.

ऐसे लोगों का जीवन सार्थक व उपलब्धिपूर्ण होता है.

आगे पढ़िए -


"महानलोग प्रगतिशील होते हें "


कल 


 

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उक्त सूक्तियां मात्र सूचिपत्र हें, प्रत्येक वाक्य पर विस्तृत विवेचन अपेक्षित है, यथासमय, यथासंभव करने का प्रयास करूंगा.

- घोषणा 


यहाँ वर्णित ये विचार मेरे अपने मौलिक विचार हें जो कि मेरे जीवन के अनुभवों पर आधारित हें.
मैं इस बात का दावा तो कर नहीं सकता हूँ कि ये विचार अब तक किसी और को आये ही नहीं होंगे या किसी ने इन्हें व्यक्त ही नहीं किया होगा, क्योंकि जीवन तो सभी जीते हें और सभी को इसी प्रकार के अनुभव भी होते ही हें, तथापि मेरे इन विचारों का श्रोत मेरा स्वयं का अनुभव ही है.

यह क्रम जारी रहेगा. 

 



- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

Sunday, October 18, 2015

परमात्म नीति - (66) - महानलोग प्रयोजन की सिद्धी के लिए कार्य करते हें, दिखावे के लिए नहीं

कल आपने पढ़ा -

"महानलोग प्रयोजन की सिद्धी के लिए कार्य करते हें, दिखावे के लिए नहीं "
अब आगे पढ़िए 
परमात्म नीति - (66)

by- परमात्म प्रकाश भारिल्ल



महानलोग प्रयोजन की सिद्धी के लिए कार्य करते हें, दिखावे के लिए नहीं  -


इसी आलेख से -

-महानलोग स्वतन्त्रवृत्ति के प्राणी होते हें गुलाम वृत्ति के नहीं.

- सामान्यजन के विपरीत महानलोग अपने प्रयोजन की सिद्धि हेतु अपने प्रयत्नों में जुटे रहते हें, इस बात से वेखबर व वेपरवाह कि कोई उन्हें देख रहा है या नहीं.

- महानलोगों की निष्ठा अपने कर्तव्य के प्रति होती है, वे यह बात अच्छी तरह जानते भी हें कि यदि वे अपने कर्तव्यपालन में सफल रहे तो उनकी परवाह अन्य लोग करेंगे, उन्हें किसी की परवाह करने की क्या आवश्यक्ता है?

- सामान्य लोगों की निष्ठा घड़ी के प्रति होती है और महान लोगों की लक्ष्य के प्रति.

- जो मात्र प्रतिदान के लिए कार्य करते हें वे मजदूर होते हें और जो उत्पादकता (productivity) के लिए कार्य करते हें वे मालिक. 


- जो लोग स्वत:स्फूर्त (self inspired) प्रेरणा से कार्य करते हें वे मालिक बनते हें और जो दिखाबे के लिए कार्य करते हें वे गुलाम.

- जगत की उत्पादकता (productivity) क्षमता से कम होने की एक बड़ी बजह यही है कि अधिकतम लोग मात्र दिखावे में ही व्यस्त रहते हें और निष्ठावान (sincere) कार्यकर्ता विरले (rare) ही हें.





महानलोग स्वतन्त्रवृत्ति के प्राणी होते हें गुलाम वृत्ति के नहीं.

गुलामवृत्ति के लोग किसी को दिखाने के लिए, किसी के देखने पर काम करते हें, उनके काम पर कोई नजर रखने वाला चाहिए.

सामान्यजन के विपरीत महानलोग अपने प्रयोजन की सिद्धि हेतु अपने प्रयत्नों में जुटे रहते हें, इस बात से वेखबर व वेपरवाह कि कोई उन्हें देख रहा है या नहीं.
कदाचित यदि कोई उन्हें देख रहा है तो यह उनके लिए व्यवधान हो सकता है. 

गुलामव्रत्ति वाले सामान्यजन की नजर उसकी ओर होती है जिसकी आधीनता उसने स्वीकार की है, अपने कर्तव्य के प्रति वह उतना सजग नहीं होता है.

महानलोगों की निष्ठा अपने कर्तव्य के प्रति होती है, वे यह बात अच्छी तरह जानते भी हें कि यदि वे अपने कर्तव्यपालन में सफल रहे तो उनकी परवाह अन्य लोग करेंगे, उन्हें किसी की परवाह करने की क्या आवश्यक्ता है?

सामान्य लोगों की निष्ठा घड़ी के प्रति होती है और महान लोगों की लक्ष्य के प्रति.
सामान्यलोग घड़ी देखकर कार्य करते हें व वक्त होजाने पर रुक जाते हें चाहे प्रयोजन की सिद्धी हो या न हो. 
महानलोग घड़ी देखकर नहीं लक्ष्य को ध्यान में रखकर कार्य करते हें. 
बस इसीलिये सामान्यलोग सिर्फ वक्त काटते हें और महानलोग अपने प्रयोजन की सिद्धी में सफल होते हें.

इसी तरह सामान्यजन मात्र प्रतिदान के लिए कार्य करते हें, उनकी निगाह लक्ष्य (उत्पाद,product) पर नहीं मात्र अपने वेतन पर होती है.
महानलोग प्रतिदान की परवाह नहीं करते हें, वे उत्पादकता के लिए कार्य करते हें, वे यह तो जानते ही हें कि प्रतिदान तो मिलना ही है उसकी क्या परवाह करनी.

दिखाने के लिए काम करने वालों को सीमित प्राप्ति होती है व लक्ष्य के लिए कार्य करने वालों को असीमित.

जो मात्र प्रतिदान के लिए कार्य करते हें वे मजदूर होते हें और जो उत्पादकता (productivity) के लिए कार्य करते हें वे मालिक.

कहा भी है न कि -
"जगती वणिक वृत्ति है रखती, उसे चाहती जिससे चखती, काम नहीं परिणाम निरखती--------"


जगत की उत्पादकता (productivity) क्षमता से कम होने की एक बड़ी बजह यही है कि अधिकतम लोग मात्र दिखावे में ही व्यस्त रहते हें और निष्ठावान (sincere) कार्यकर्ता विरले (rare) ही हें. इस कारण हमें एक ही काम के लिए दो लोगों की आवश्यक्ता पड़ती है, एक काम करने वाला और दूसरा नजर रखने वाला. 

जो लोग स्वत:स्फूर्त (self inspired) प्रेरणा से कार्य करते हें वे 
स्वामीभाव वाले होते हें. वे मालिक बनते हें और जो दिखाबे के लिए कार्य करते हें वे गुलाम  वृत्ति वाले गुलाममार्गी होते हें 

प्रथम प्रकार के लोग भले ही किसी के लिए कार्य करते हों पर स्वामीव्रत्ति वाले होने से स्वामी के सामान ही सम्मान और व्यवहार पाते 
है.
दूसरे प्रकार के लोग किसी की नौकरी न भी करें (ऐसे लोगों को अपने
यहाँ रखेगा भी कौन ?) तब भी गुलाम वृत्ति वाला होने से गुलाम ही है.

यहाँ इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कौन नियोक्ता (employer) है और कौन कर्मचारी (employee). यह फर्क तो वृत्ति का है.








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"महानलोगों की द्रष्टि मात्र अपने लक्ष्य पर होती है "
कल 


 

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उक्त सूक्तियां मात्र सूचिपत्र हें, प्रत्येक वाक्य पर विस्तृत विवेचन अपेक्षित है, यथासमय, यथासंभव करने का प्रयास करूंगा.

- घोषणा 


यहाँ वर्णित ये विचार मेरे अपने मौलिक विचार हें जो कि मेरे जीवन के अनुभवों पर आधारित हें.
मैं इस बात का दावा तो कर नहीं सकता हूँ कि ये विचार अब तक किसी और को आये ही नहीं होंगे या किसी ने इन्हें व्यक्त ही नहीं किया होगा, क्योंकि जीवन तो सभी जीते हें और सभी को इसी प्रकार के अनुभव भी होते ही हें, तथापि मेरे इन विचारों का श्रोत मेरा स्वयं का अनुभव ही है.

यह क्रम जारी रहेगा. 

 



- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

Saturday, October 17, 2015

परमात्म नीति - (65) - महानलोग निष्ठावान (loyal & devoted) होते हें

कल आपने पढ़ा -

"
महानलोग प्रतिबद्ध (committed) होते हें"
अब आगे पढ़िए 
परमात्म नीति - (65)

by- परमात्म प्रकाश भारिल्ल


महानलोग निष्ठावान (loyal & devoted) होते हें -

इसी आलेख से -

- महानलोग अपने सहयोगियों, सिद्धांतों और कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान होते हें.
निष्ठा एक महान गुण है और उनकी यही निष्ठा उन्हें विशिष्ट व महान बनाती है. 

- निष्ठा (loyalty & devotion) के बिना क्षमता एवं योग्यता किसी भी काम की नहीं, किसी के काम की नहीं. 


- निष्ठावान होना किसी अन्य गुण से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

- निष्ठा मात्र व्यक्ति के प्रति ही नहीं होती, यह अपने सिद्धांतों और कर्तव्यों के प्रति भी होती है.
अपने सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान व्यक्ति विश्वसनीय होता है और कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान व्यक्ति निर्भर रहने योग्य (dependable).

- ऐसा व्यक्ति जिसके कर्तृत्व के बारे में कुछ भी सुनिश्चित ही न हो किसी के भला किस काम का हो सकता है. वह तो स्वयं पर और इस धरती पर बोझ मात्र है.

- उक्त प्रकार के निष्ठाहीन चरित्र वाले व्यक्ति को कभी भी अपने श्रम, योग्यता (हुनुर) और कर्तृत्व का सम्पूर्ण प्रतिफल भी नहीं मिल पाता है क्योंकि उसके कार्य और गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किसी विश्वसनीय व्यक्ति की नियुक्ति करनी पड़ती है, जो कि उसके प्रतिफल (reward, remuneration) को बाँट ले जाता है.







सामान्यजन के विपरीत महानलोग अपने सहयोगियों, सिद्धांतों और कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान होते हें.
निष्ठा एक महान गुण है और उनकी यही निष्ठा उन्हें विशिष्ट व महान बनाती है. 

- अपने सहयोगियों के प्रति निष्ठावान होने से वे अत्यंत विश्वसनीय होते हें.
- अपने सिद्धान्तों के प्रति निष्ठावान होने से उनका व्यक्तित्व रेखांकित किया जा सकता है, कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति यह जान सकता है कि इस बिषय में उनकी राय क्या होगी.
- अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा उन्हें निर्भर रहने योग्य बनाती है. यदि उन्होंने कोई काम करना स्वीकार कर लिया है तो अब निश्चित ही वह कार्य अपने निर्धारित समय पर, सही प्रकार से सम्पन्न हो जाएगा, ऐसा विश्वास करके निश्चित हुआ जा सकता है.

निष्ठा (loyalty & devotion) के बिना क्षमता एवं योग्यता किसी भी काम की नहीं, किसी के काम की नहीं. 


यदि आपका कोई सहयोगी आपके प्रति निष्ठावान नहीं है तो उसकी प्रतिभा कभी आपके विरुद्ध भी उपयोग में लाई जा सकती है, क्योंकि आज वह आपके साथ है पर हो सकता है कल आपके विरोधी या प्रतिद्वंद्वी के साथ खड़ा होजाए.
यही बात आप पर भी लागू होती है, यदि आप किसी के प्रति निष्ठावान नहीं हें तो बाबजूद अपनी समस्त प्रतिभावों के आप उसके लिए उपयोगी नहीं रहते हें. 
उक्त सन्दर्भ में यदि विचार किया जाए तो हम पायेंगे कि निष्ठावान होना किसी अन्य गुण से ज्यादा महत्वपूर्ण है.

निष्ठा मात्र व्यक्ति के प्रति ही नहीं होती, यह अपने सिद्धांतों और कर्तव्यों के प्रति भी होती है.
अपने सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान व्यक्ति विश्वसनीय होता है और कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान व्यक्ति निर्भर रहने योग्य (dependable).

जो व्यक्ति अपने सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान नहीं है उसका चरित्र (व्यक्तित्व) सुनिश्चित नहीं हो सकता है, वह आज कुछ और है व कल कुछ और भी हो सकता है. ऐसी स्थिति में कोई कैसे निर्णय करे कि वह उसके काम का व्यक्ति है या नहीं, विश्वसनीय और निर्भर करने योग्य है या नहीं, क्योंकि वहतो आज कुछ और है और कल कुछ और.
इस प्रकार का व्यक्ति अपना महत्व खो देता है.

सर्वसामान्य लोग अपने कर्तव्य के प्रति ही गंभीर नहीं होते हें, उनके कार्य में कुछ न कुछ कमियाँ बनी ही रहती हें और इसलिए उन्हें अपने कर्तृत्व का उचित प्रतिसाद भी नहीं मिलता है. 
मानलीजिये उसने कोई पकवान बनाया और उसमें नमक थोड़ा कम डाला तो मेहनत तो पूरी हुई, सामग्री भी पूरी लगी पर दो कौंड़ी का नमक कम रह जाने से पकवान ही वेस्वाद रह गया. 
ज़रा कल्पना तो कीजिये कि नमक थोड़ा कम रहने की जगह थोड़ा अधिक डल जाता तो क्या होता? 
यदि नमक की जगह मिर्ची दुगुनी डल जाती तो क्या होता? 
तबतो कोई उसे खाना तो दूर चख भी न पाता. 
अब ऐसा व्यक्ति जिसके कर्तृत्व के बारे में कुछ भी सुनिश्चित ही न हो किसी के भला किस काम का हो सकता है. वह तो स्वयं पर और इस धरती पर बोझ मात्र है.
क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को अपना ड्राइवर बनाना पसंद करेंगे जिसके बारे में यह विश्वास ही न हो कि वह सही समय पर आपको सुरक्षित अपने सही गंतव्य तक पहुंचा देगा.

उक्त प्रकार के निष्ठाहीन चरित्र वाले व्यक्ति को कभी भी अपने श्रम, योग्यता (हुनुर) और कर्तृत्व का सम्पूर्ण प्रतिफल भी नहीं मिल पाता है क्योंकि उसके कार्य और गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किसी विश्वसनीय व्यक्ति की नियुक्ति करनी पड़ती है, जो कि उसके प्रतिफल (reward, remuneration) को बाँट ले जाता है.

इसप्रकार सबकुछ देकर भी उस निष्ठाविहीन व्यक्ति को कुछ भी नहीं मिलता है.

महान लोग अपने काम निष्ठा पूर्वक करते हें इसलिए वे सफल होते हें.

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"महानलोग प्रयोजन की सिद्धी के लिए कार्य करते हें, दिखावे के लिए नहीं "


कल 


 

----------------
उक्त सूक्तियां मात्र सूचिपत्र हें, प्रत्येक वाक्य पर विस्तृत विवेचन अपेक्षित है, यथासमय, यथासंभव करने का प्रयास करूंगा.

- घोषणा 


यहाँ वर्णित ये विचार मेरे अपने मौलिक विचार हें जो कि मेरे जीवन के अनुभवों पर आधारित हें.
मैं इस बात का दावा तो कर नहीं सकता हूँ कि ये विचार अब तक किसी और को आये ही नहीं होंगे या किसी ने इन्हें व्यक्त ही नहीं किया होगा, क्योंकि जीवन तो सभी जीते हें और सभी को इसी प्रकार के अनुभव भी होते ही हें, तथापि मेरे इन विचारों का श्रोत मेरा स्वयं का अनुभव ही है.

यह क्रम जारी रहेगा. 

 



- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

Friday, October 16, 2015

परमात्म नीति - (64) - वे प्रतिबद्ध (committed) होते हें

कल आपने पढ़ा -


"महानलोग अपनी गल्तियों से सीखते हें "

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परमात्म नीति - (64)

by- परमात्म प्रकाश भारिल्ल



महानलोग प्रतिबद्ध (committed) होते हें  -


इसी आलेख से -

- "प्रतिबद्धता (commitment) के साथ आपकी क्षमता और योग्यता सबकुछ है पर प्रतिबद्धता (commitment) के बिना वह कुछ भी नहीं, किसी काम की नहीं , किसी के काम की नहीं."







महानलोग यदि कोई जिम्मेदारी स्वीकार करते हें तो वे उसके प्रति प्रतिबद्ध होते हें. यदि उनसे सम्भव न हो तो वे कोई जिम्मेदारी स्वीकार ही नहीं करते हें.

प्रतिबद्धता (commitment) के साथ आपकी क्षमता और योग्यता सबकुछ है पर 
प्रतिबद्धता (commitment) के बिना वह कुछ भी नहीं, किसी काम की नहीं , किसी के काम की नहीं.
यदि आप प्रतिबद्ध हें तो लोग आप पर निर्भर (can depend upon you) रह सकते हें पर यदि आप प्रतिबद्ध नहीं है तो कोई कैसे आप पर निर्भर होकर बैठ सकता है?
यदि कोई आप पर निर्भर नहीं कर सकता है तो उसे दूसरी व्यवस्था करनी ही होगी जो विश्वसनीय हो और जिस पर निर्भर रहा जासके, तब आपकी कोई उपयोगिता नहीं रहेगी.

सामान्य लोग भी कुछ न कुछ तो करते ही हें, पर अपने कर्तृत्व और कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होते. जब चाहा तब कुछ कर लिया, नहीं किया तो नहीं किया, कुछ हो गया तो ठीक, नहीं हुआ तो ठीक, जैसा हो गया वही ठीक. 
ऐसे लोग और उनकी उपलब्धियां महान नहीं हो सकती हें क्योंकि कोई उनके ऊपर निर्भर नहीं रह सकता है. 
महान लोग जो जिम्मेदारी स्वीकार करते हें तो उसके प्रति प्रतिबद्ध होते हें, वे हर कीमत पर उसका निर्बाह करते हें, लोग उनके ऊपर निर्भर रहते हें, उनपर भरोसा करते हें इसलिए उन्हें अपने कर्तृत्व का प्रतिसाद मिलता है.

क्या आप खरीदारी करने के लिए ऐसी किसी दूकान पर जाना पसंद करेंगे जिसके बारे में भरोसा नहीं कि खुली भी हो या न भी खुली हो, यदि खुली भी हो तो इक्षित वस्तु उपलब्ध हो या न हो, यदि मिल भी जाए तो पता नहीं वह कितना दाम मांगने लगे ?
नहीं न ?


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"
महानलोग निष्ठावान (loyal & devoted) होते हें"

कल 


 

----------------
उक्त सूक्तियां मात्र सूचिपत्र हें, प्रत्येक वाक्य पर विस्तृत विवेचन अपेक्षित है, यथासमय, यथासंभव करने का प्रयास करूंगा.

- घोषणा 


यहाँ वर्णित ये विचार मेरे अपने मौलिक विचार हें जो कि मेरे जीवन के अनुभवों पर आधारित हें.
मैं इस बात का दावा तो कर नहीं सकता हूँ कि ये विचार अब तक किसी और को आये ही नहीं होंगे या किसी ने इन्हें व्यक्त ही नहीं किया होगा, क्योंकि जीवन तो सभी जीते हें और सभी को इसी प्रकार के अनुभव भी होते ही हें, तथापि मेरे इन विचारों का श्रोत मेरा स्वयं का अनुभव ही है.

यह क्रम जारी रहेगा. 

 



- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

Thursday, October 15, 2015

परमात्म नीति - (63) - महानलोग अपनी गल्तियों से सीखते हें (जो गल्तियाँ करते नहीं वे परमात्मा के सामान हें और जो गल्तियों से सीखते नहीं वे पशु के समान)

कल आपने पढ़ा -

"
महानलोग गल्तियाँ होने के भय से ठहर नहीं जाते हें"

अब आगे पढ़िए 
परमात्म नीति - (63)

by- परमात्म प्रकाश भारिल्ल

महानलोग अपनी गल्तियों से सीखते हें  -

इसी आलेख से -

- "वे लोग तो महानतम लोगों की श्रेणी में आते हें जो अन्यों की गल्तियों से ही सीख लेते हें."


- "पशु के विपरीत मनुष्य को यह सुविधा उपलब्ध है कि वह अन्यों के अनुभव से भी सीख सकता है. इसीलिए मनुष्यता महान है."

पशुओं को तो अपने अनुभव से ही सीखना पड़ता है, मात्र ठोकरें खाकर ही नहीं वल्कि जान की बाजी लगाकर.

- "जो गल्तियाँ करते नहीं वे परमात्मा के सामान हें और जो गल्तियों से सीखते नहीं वे पशु के समान."

- "आप कोई भी कदम उठाते हें आपको उसका लाभ मिलना ही चाहिए, या तो आप अपने लक्ष्य तक पहुंचें या यह सीखलें कि यह सच्चा मार्ग नहीं है."


- "सामान्य लोग समीक्षा को व्यर्थ की दिमागी कसरत और समय की बर्बादी मानते हें पर महान लोगों के लिए समीक्षा अन्य किसी भी अध्यवसाय (efforts) से अधिक महत्वपूर्ण हुआ करती है."


- "गल्ती करना गल्ती है, यह अपराध नहीं पर गल्ती दोहराना अपराध है गल्ती नहीं."







महानलोग गल्तियों से सीखते हें. 

कोई अपनी स्वयं की और कोई अन्यों की.
वे लोग तो महानतम लोगों की श्रेणी में आते हें जो अन्यों की गल्तियों से ही सीख लेते हें, इस प्रकार वे ठोकरें खाने से बच जाते हें.
पशु के विपरीत मनुष्य को यह सुविधा उपलब्ध है कि वह अन्यों के अनुभव से भी सीख सकता है. इसीलिए मनुष्यता महान है.
पशुओं को तो अपने अनुभव से ही सीखना पड़ता है, मात्र ठोकरें खाकर ही नहीं वल्कि जान की बाजी लगाकर.

जो गल्तियाँ करते नहीं वे परमात्मा के सामान हें और जो गल्तियों से सीखते नहीं वे पशु के समान.


आप कोई भी कदम उठाते हें आपको उसका लाभ मिलना ही चाहिए, या तो आप अपने लक्ष्य तक पहुंचें या यह सीखलें कि यह सच्चा मार्ग नहीं है.

यदि आप इतना भी सीख गए तो आपका श्रम निरर्थक नहीं गया.
महान लोग अपने श्रम को निरर्थक नहीं जाने देते.  

महान लोग गल्तियों से सीखकर गल्ती करके चुकाई गई कीमत बसूल कर लेते हें. 

इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने प्रत्येक कार्य की समीक्षा करें. सामान्य लोग समीक्षा को व्यर्थ की दिमागी कसरत और समय की बर्बादी मानते हें पर महान लोगों के लिए समीक्षा अन्य किसी भी अध्यवसाय (efforts) से अधिक महत्वपूर्ण हुआ करती है.

जो लोग गल्ती करने से डरकर कोई कदम ही नहीं उठाते वे सबसे बड़ी गल्ती करते हें.


गल्तियाँ तो होंगीं ही, यह तो असंभव ही है कि गल्तियाँ हों ही नहीं; तब तक, जब तक कि व्यक्ति अपने कार्य में सम्पूर्ण दक्ष और सर्वज्ञ ही न हो. 


सामन्य लोग गल्तियाँ दोहराते रहते हें, गल्तियों से सीखते नहीं. 

जो गल्तियों से सीखते नहीं वे जीवनभर ठोकरें खाते हें.

शिक्षा क्या है?

योग्य गुरु के संरक्षण में अपनी गल्तियाँ निकालना/सुधारना, ताकि हानि न हो और गल्तियाँ निकल जाएँ.
इस प्रकार हम गल्तियाँ करते करते ही गल्तियाँ नहीं करना सीख जाते हें.

जो लोग गुरु से नहीं सीखते हें उन्हें ठोकरें खाकर सीखना पड़ता है; और संभव है कि उन्हें फिर कभी गल्ती दोहराने का अवसर ही न मिले.


गल्ती करना गल्ती है, यह अपराध नहीं पर गल्ती दोहराना अपराध है गल्ती नहीं. इसी प्रकार गल्ती स्वीकार न करना भी बड़ा अपराध है क्योंकि तब भविष्य में गल्ती दोहराने की संभावना बनी ही रहती है.




आगे पढ़िए -


"महानलोग प्रतिबद्ध (commited) होते हें "


कल 


 

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उक्त सूक्तियां मात्र सूचिपत्र हें, प्रत्येक वाक्य पर विस्तृत विवेचन अपेक्षित है, यथासमय, यथासंभव करने का प्रयास करूंगा.

- घोषणा 


यहाँ वर्णित ये विचार मेरे अपने मौलिक विचार हें जो कि मेरे जीवन के अनुभवों पर आधारित हें.
मैं इस बात का दावा तो कर नहीं सकता हूँ कि ये विचार अब तक किसी और को आये ही नहीं होंगे या किसी ने इन्हें व्यक्त ही नहीं किया होगा, क्योंकि जीवन तो सभी जीते हें और सभी को इसी प्रकार के अनुभव भी होते ही हें, तथापि मेरे इन विचारों का श्रोत मेरा स्वयं का अनुभव ही है.

यह क्रम जारी रहेगा. 

 

- परमात्म प्रकाश भारिल्ल