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Wednesday, September 23, 2015

यह जीवन रहता है तो उत्तम है पर यदि म्रत्यु आती है तो आये, एक दिन तो आनी ही थी : मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (4)

मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (4)

यह जीवन रहता है तो उत्तम है पर यदि म्रत्यु आती है तो आये, एक दिन तो आनी ही थी
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल 


इसी आलेख से -

- "----वह पल कभी भी आ सकता है और कब आ धमके यह कोई नहीं जानता. बस इसीलिये मैं सदा से ही इसके लिए तैयार ही था."

- "-----जब मौत कभी भी आसकती  है तो कहीं ऐसा न हो बिना तैयारी के ही चल देना पड़े."

- "--ज्ञाताद्रष्टा बने रहकर सबकुछ सहजरूप से स्वीकार करना ही योग्य है."

- "----आखिर किसका विकल्प करूं?
जो छूट रहा है उसका या जिसका नवीन संयोग होने वाला है उसका?"

- "----लोग तो व्यर्थ ही अज्ञात के भय से भयभीत होते रहते हें, पर मैं सोचता हूँ कि अज्ञात का भय ही क्यों, अज्ञात की प्रसन्नता भी तो हो सकती है न? जिज्ञासा भी तो हो सकती है न!"

- "--------क्यों नहीं मैं आगत का स्वागत करूं."

- "-----------संयोग तो क्षणिक ही होते हें और क्षणिक ही रहेंगे. यदि मुझे स्थायित्व चाहिए तो मुझे ही अपने आपको संयोगों से असम्प्रक्त्य (disconnect) करना होगा."

- "-----जब अनुकूल संयोग होते हें तब भी सुख-चैन कहाँ? तब मैं इस दुश्चिंता में उलझा रहाता हूँ कि कहीं ये संयोग बिखर न जाए.
सच तो यह है कि ये संयोग मुझे सुखी-दुखी करते ही नहीं.
मेरा सुख-दुःख स्वयं मेरी अपनी व्रत्ति पर ही निर्भर है "

- "----एक अवस्था है जो बदलती हुई भी सदा एक सामान ही रहती है, सिद्धदशा, अबतो मुझे उसी का पुरुषार्थ करना होगा."

- "------स्वयं किये अशुभकर्मों की परवाह मात्र म्रत्यु समीप देखकर ही क्यों ?---------"

- "कुछ संयोग भले ही म्रत्यु के साथ मुझसे छूट जायेंगे पर मेरे अपने ये संस्कार तो मेरे साथ ही रहेंगे, और मैं स्वयं तो हूँ ही हाजराहुजूर भगवान आत्मा."

- "अब मेरा लक्ष्य तो पंचमगति (मोक्ष) है और मैं लगातार उस दिशा में आगे बढ़रहा हूँ. रास्ते में सूखा हो, बंजर हो या वसंत हो, हरियाली हो, मुझे उससे क्या प्रयोजन ?"






तो आखिर आज आ ही गई यह मौत!

मुझे मालूम तो था ही कि एक न एक दिन तो यह आनी ही है.

मुझे तो यह भी अहसास था कि वह दिन, वह पल कभी भी आ सकता है, और कब आ धमके यह कोई नहीं जानता. बस इसीलिये मैं सदा से ही इसके लिए तैयार ही था.


मैं तैयार तो था पर लालायित नहीं.


तैयार तो इसलिए था कि मौत आनी तो है ही और जब कभी भी आसकती  है तो कहीं ऐसा न हो बिना तैयारी के ही चल देना पड़े.


और लालायित तो मैं जीवन के प्रति भी न रहा तो फिर मौत की लालसा कैसी? जब सबकुछ अपने नियमित क्रम में स्वमेव ही होता है, चाहने से कुछ मिलता नहीं, रोकने से रुकता नहीं और टालने से टलता नहीं तो किसकी लालसा करूं? ज्ञाताद्रष्टा बने रहकर सबकुछ सहजरूप से स्वीकार करना ही योग्य है.


आज मुझे परेशान करने वाला कोई विकल्प भी मेरे चित्त में नहीं है.


आखिर किसका विकल्प करूं?

जो छूट रहा है उसका या जिसका नवीन संयोग होने वाला है उसका?

जो छूट रहा है उसके विकल्प का तो प्रयोजन ही क्या है? मैं न तो उसका कर्ता हूँ और न ही भोक्ता, उसका तो मैं ज्ञाता भी नहीं बन पाउँगा, तब इस सबसे तो मेरा क्या नाता और क्या प्रयोजन रहा.

अब जहां मैं जारहा हूँ वह तो मुझे ज्ञात ही नहीं, तब विकल्प किसका करूं, ध्यान किसका करूं, उसके भी विकल्प का क्या प्रयोजन हो सकता है.


मेरा सौभाग्य कि मुझे इस जीवन में सज्जन और अनुकूल सहयात्री मिले, यदि ऐसा न भी होता तो क्या? सभी तो सामान नहीं होते हें न ? 
इस जीवन में भी मैंने कितनी यात्राएं कीं, कितने और कैसे-कैसे  लोग मिले, अत्यंत सज्जन और अनुकूल भी तथा दुर्जन भी. 
क्या फर्क पडा?
यात्रा का थोड़ा सा ही वक्त तो काटना था, सो कट गया. बादमें तो न अनुकूल याद रहे और न प्रतिकूल.
आखिर कोई कितनों को याद रख सकता है? मिलते तो अनेकों हें.
अब इस भववन में भ्रमते हुए अनादि से कितने रिश्ते बने और टूटे, आज मैं किसे पहिचानता हूँ? कल ये सब भी विस्मृत हो जायेंगे. ये मेरे लिए अनजान हो जायेंगे और मैं इनके लिए. 
अब किससे क्या मोह रखूँ ?

जगत के लोग तो व्यर्थ ही अज्ञात के भय से ही भयभीत होते रहते हें, पर मैं सोचता हूँ कि अज्ञात का भय ही क्यों, अज्ञात की प्रसन्नता भी तो हो सकती है न? जिज्ञासा भी तो हो सकती है न!


क्या मैं अपने विगत जीवन के भावों और क्रियाकलापों के आधार पर इतना भी अनुमान नहीं कर सकता हूँ कि मेरा भविष्य तो उज्जवल ही है, तब क्यों नहीं मैं आगत का स्वागत करूं.?

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि वर्तमान में मेरे जीवन में अनुकूलताएँ हो या प्रतिकूलताएं, और इसी तरह भविष्य में (अगले जन्म में )भी मुझे अनुकूलताएँ मिलें या प्रतिकूलताएं; ये दोनों ही बातें मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं हें क्योंकि ये सब संयोग तो क्षणिक हें,प्रतिपल ही तो बदलते रहते हें. यदि कोई संयोग मुझे अनुकूल लगता है तो अभी मैं उसका उपभोग भी नहीं कर पाता हूँ और वह बदल जाता है. ठीक इसी तरह प्रतिकूल संयोग भी; अभी मैं उनसे निपटने की योजना ही बना रहा होता हूँ और वे स्वमेव ही बदल जाते हें.

उक्त के विपरीत यदि मैं शुभ संयोगों को जुटाने और और अशुभ संयोगों को मिटाने का प्रयास करता हूँ  तो समस्त प्रयास निष्फल ही होते हें, तब मेरे पास करने को रह ही क्या जाता है ?
क्या यह मेंढकों को तोलने जैसा कार्य नहीं है ?

संयोगों की यह क्षणिकता ही मेरी आज की ज्वलंत समस्या है.
दरअसल तो यह कथन भी सही नहीं है, संयोग तो क्षणिक ही होते हें और क्षणिक ही रहेंगे. यदि मुझे स्थायित्व चाहिए तो मुझे ही अपने आपको संयोगों से असम्प्रक्त्य (disconnect) करना होगा.

अब देखो न ! जब अनुकूल संयोग होते हें तब भी सुख-चैन कहाँ ? तब मैं इस दुश्चिंता में उलझा रहाता हूँ कि कहीं ये संयोग बिखर न जाएँ.
सच तो यह है कि ये संयोग मुझे सुखी-दुखी करते ही नहीं.
मेरा सुख-दुःख स्वयं मेरी अपनी व्रत्ति पर ही निर्भर है. यदि मैं सकारात्मक व्रत्ति वाला हूँ तो प्रतिकूल संयोगों में भी इस विचार से ही संतुष्टी पालेता हूँ कि ये दिन हमेशा थोड़े ही रहेंगे, कभी तो बदलेंगे. 

सच पूंछा जाए तो मेरी समस्या अनुकूल या प्रतिकूल संयोग हें ही नहीं, मेरी सबसे बड़ी समस्या तो संयोगों की अस्थिरता है, यदि संयोग ही शाश्वत होजाएं तो मैं एक बार पुरुषार्थपूर्वक इष्ट संयोग जुटालूं और फिर हमेशा के लिए सुखी होजाऊं .

संयोग स्थिर न हों तो न सही, एक अवस्था है जो बदलती हुई भी  सदा एक सामान ही रहती है, सिद्धदशा ! अबतो मुझे उसी का पुरुषार्थ करना होगा.

यदि कदाचित प्रसंगवश मेरे जीवन में मुझसे कुछ अशुभकार्य हो ही गये हें जिनसे निश्चित ही अशुभ कर्मों का बंध हुआ है, तो यह तो मैं तब भी जानता ही था कि इन भावों का फल क्या होगा, जब जानबूझकर ही मैंने यह सब किया है तो अब उनके फल से बचने की बेईमानी भरी निरर्थक चाहत भी क्यों हो?
फिर एक बात और !
स्वयं किये अशुभकर्मों की परवाह मात्र म्रत्यु समीप देखकर ही क्यों?
क्या अशुभकर्म इस जन्म में ही प्रतिफलित नहीं हो सकते हें?
हुए ही होंगे न? हालांकि मैं यह नहीं जान सकता हूँ कि वर्तमान में उदय में आया कर्म कब बंधा था? पर इससे क्या!

संसार की व्यवस्था भी तो देखिये! जिस प्रकार की आधि-व्याधियाँ आती हें उनको झेलने में सक्षम संहनन भी स्वत: ही मिल जाता है. यदि नरकों में भयंकर मारकाट है तो वहां उससे निपटने में सक्षम वैक्रियक शरीर भी विद्यमान है.

अब इस जीवन में भी मैंने क्या कम कष्ट सहे हें, पर मैं उन्हें वर्दाश्त तो करही गया न? उन कष्टों ने मेरे जीवन को क्या हानि पहुंचाई? मैं मर तो नहीं गया न! 
यदि मरभी जाता तो क्या बिगड़ जाता, जबतक यह संसार है तबतक यह जीवन-मरण तो चलता ही रहेगा. इससे बचने का एकमात्र उपाय तो अपने स्वरूप में स्थित होना ही है. इस जीवन में मैंने इस ओर कदम बढाये भी हें;
यदि कुछ और आगे बढ़ सका होता तो उत्तम होता पर यदि यह नहीं भी होसका तो क्या फर्क पड़ता है, अन्य कुछ संयोग भले ही म्रत्यु के साथ मुझसे छूट जायेंगे पर मेरे अपने ये संस्कार तो मेरे साथ ही रहेंगे, और मैं स्वयं तो हूँ ही हाजराहुजूर भगवान आत्मा.

अब मेरा लक्ष्य तो पंचमगति (मोक्ष) है और मैं लगातार उस दिशा में आगे बढ़रहा हूँ. रास्ते में सूखा हो, बंजर हो या वसंत हो, हरियाली हो, मुझे उससे क्या प्रयोजन ?
अस्तु !



विकल्पजाल में उलझे मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (3) : जीवन के प्रति हमारा द्रष्टिकोण कैसा होना चाहिए ?

विकल्पजाल में उलझे मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (3) -

जीवन के प्रति हमारा द्रष्टिकोण कैसा होना चाहिए ?
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 


इसी आलेख से - 

- "क्या कोई सराय (धर्मशाला या होटल) छोड़ते समय भी वहां की व्यवस्थाओं की चिंता करता है कि "पानी कब आयेगा, सफाई कौन करेगा,----"

- "----जब एक दिन मैं चला जाउंगा तब भी तो यही लोग यह सब करेंगे ही न , तब क्यों नहीं आज से ही सही."

- "----क्या मैं अपने स्वभाव में थोड़ा परिवर्तन करके इन अप्रिय प्रसंगों को टाल नहीं सकता हूँ ---"

- "------यदि ये लोग इसी तरह जीना चाहते हें तो मैं क्यों इसमें बाधक बनकर अपना ही सुखचैन खो दूं?"

- "सच तो यह है कि जगत का परिणमन तो स्वतंत्र है, यहाँ मेरे विकल्प से कुछ भी नहीं होता है, तब मैं क्यों व्यर्थ विकल्पों में उलझकर अपना उपयोग मलिन करूँ? मेरा मात्र ज्ञाताद्रष्टा रहना ही योग्य है."






लगता है कि वह दिन (म्रत्यु )जो इस जीवन में कभी तो आना ही था, अब समीप है. अब मेरा देहपरिवर्तन का समय होगया है. 
मेरा मन अबभी क्यों यहीं पर उलझा हुआ है? 
क्या कोई सराय (धर्मशाला या होटल) छोड़ते समय भी वहां की व्यवस्थाओं की चिंता करता है कि "पानी कब आयेगा, सफाई कौन करेगा, अगला यात्री कब आयगा आदि.
मेरे इस घर में और सराय में अब मेरे लिए फर्क ही क्या  है? इस अनादि-अनन्त आत्मा के लिए ये मात्र  60-70 बर्ष क्या मायने रखते हें ? यह समय शान्ति और सुविधापूर्वक इस घर में कट गया पर अबतो इसका मोह छोड़कर आगे बढ़ना ही होगा न !
अब मैं यहाँ से चला जाउंगा तो न तो मैं ईन लोगों को पहिचानूंगा और न ही ये लोग मुझे. हम सभी लोग एकदूसरे से अनंतकाल तक के लिए बिछुड़ जायेंगे. 
अपने अगले जीवन में कदाचित संयोगवश मैं यहाँ आ भी पहुंचा तो यही मेरे ही द्वारा नियुक्त चौकीदार मुझे यहाँ घुसने तक नहीं देगा .
ऐसे में मेरा इनसे और इनका मुझसे क्या प्रयोजन है?
क्यों तो मैं इनसे द्वेष करूँ और क्यों राग करूँ? दोनों ही तो निष्फल हें. 
क्या मेरे बिना यहाँ की व्यवस्थाएं चलेंगीं नहीं? 
सच तो यह है कि बहुत अच्छी तरह से चलेंगीं, अबभी जब में कुछ इनों के लिए बाहर चला जाता हूँ तो यहाँ क्या रुक जाता है, क्या लुट जाता है? सबकुछ तो व्यवस्थित रहता है, तब क्यों में व्यर्थ ही अपने समय और उपयोग को इन्हीं के विकल्प में बर्बाद करूँ.
पहिले तो मुझे यह विकल्प भी सताता था कि यदि मैं यह सब नहीं करूंगा तो सब लोग क्या कहेंगे? क्या वे इसे मेरा असहयोग नहीं मानेंगे? 
पर अबतो सभी चाहते हें कि मैं उनके इन सब मामलों में दखल देना बंद करदूं. अबतो वे मेरी दखलन्दाजी को मेरा असहयोग मानने लगे हें. 
क्या यही मेरे हित में नहीं है ? मेरा समय, श्रम और शक्ति बचे और इन सबको अनुकूलता महसूस हो.
अब ये सब्जी थोड़ी मंहगी लेआयें या कुछ सब्जी सड़-गल कर फिक जाए तो मैं कर भी क्या सकता हूँ, मैं भी यह सब कबतक कर पाउँगा, जब एक दिन मैं चला जाउंगा तब भी तो यही लोग यह सब करेंगे ही न , तब क्यों नहीं आज से ही सही.
यूं भी मेरे पास इतना सबकुछ है और मेरी आवश्यकताएं हें अत्यंत सीमित. जो कुछ भी बचेगा वह इन्हीं के पास तो रहेगा न ! 
मैं इन्हें सुखी और संतुष्ट ही तो देखना चाहता हूँ न ? स्वयं मैं भी तो यही चाहता हूँ कि इन्हें अधिक से अधिक मिले ताकि उसका उपभोग करके ये सब लोग सुख से रहें, अब यदि इन्हें इसीप्रकार की कार्यप्रणाली से सुख मिलता है तो मैं क्यों रोकटोक करके इनके रंग में भंग करूँ ?
यूं भी मेरे रोकने से क्या रुक जाता है , ये तो वही करते हें जो इन्हें करना होता है, व्यर्थ ही मात्र वातावरण ही तो खराब होता है, तो क्या मैं अपने स्वभाव में थोड़ा परिवर्तन करके इन अप्रिय प्रसंगों को टाल नहीं सकता हूँ .
क्या ये लोग नहीं जानते हें कि मेरे ईन प्रयासों से जो भी बचत होगी वह इन्हीं को मिलेगी, वह मेरे तो किसी काम आने वाली है नहीं, तब भी यदि ये लोग इसी तरह जीना चाहते हें तो मैं क्यों इसमें बाधक बनकर अपना ही सुखचैन खो दूं?

इनके बचपन में मैं इन्हें कहानियाँ सुनाता था तो ये सभी बड़े प्रसन्न होते थे, हालांकि मेरे पास समय कम रहता था तो ये लोग कहानियां सुनाने के लिए चिरौरियाँ करते थे . अब आज हालात बदल गए हें. आज यदि मैं इन्हें कुछ सुनाना चाहता हूँ तो ये सुनना ही नहीं चाहते हें, पहिले मेरे पास सुनाने के लिए समय नहीं था आज इनके पास सुनने के लिए समय नहीं है. 

से मैं क्यों मैं जबरदस्ती कुछ न कुछ सुनाने का आग्रह पालूँ ?
यदि मैं कुछ नहीं भी सुना पाया तो न तो इनका मोक्ष रुकने वाला है और न ही मेरा, तब क्यों नहीं मैं अपना सुनाने का लोभ संवरण करूँ., यही सभीके हित में भी है.

सच तो यह है कि जगत का परिणमन तो स्वतंत्र है, यहाँ मेरे विकल्प से कुछ भी नहीं होता है, तब मैं क्यों व्यर्थ विकल्पों में उलझकर अपना उपयोग मलिन करूँ? मेरा मात्र ज्ञाताद्रष्टा रहना ही योग्य है.
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Monday, September 21, 2015

आत्मकल्याण के लिए उपयुक्त जीवन शैली श्रावकाचार : जैन जीवनशैली

आत्मकल्याण के लिए उपयुक्त जीवन शैली श्रावकाचार : जैन जीवनशैली 

- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इस आलेख का कथ्य –

जैन श्रावकों को अपने इस जीवन में मात्र इसी जीवन के भरणपोषण का कार्य नहीं करना है वरन अनादिअनन्त इस आत्मा के अनंतकाल तक केलिए सुखी होने का उपक्रम भी इसी जीवन में करना है.
वे लोग जो आत्मा की स्वतंत्र सत्ता और उसकी अनादिअनन्तता को स्वीकार नहीं करते हें उनके लिए तो इस जीवन में अन्य कोई लक्ष्य है ही नहीं, शिवाय इसके कि किसी भी प्रकार यह जीवन सुखसुविधा पूर्वक व्यतीत हो जाए, बस इसीलिये वे तो जीवनभर, दिनरात मात्र अनुकूल संयोग और प्रचुर भोगसामग्री जुटाने और भोगने में व्यस्त रहते हें.
यह तो हम जानते हें कि हमारी तत्कालीन आवश्यकताओं और त्रैकालिक हितों में मूलभूत अंतर होता है.
आपही विचार करिए कि एक तत्कालीन हितों के अभिलाषी और एक अपने त्रैकालिक अविनाशी कल्याण की भावना वाले साधक की जीवनशैली एक सामान कैसे हो सकती है? उसमें मूलभूत अंतर होना ही चाहिए.

इसी आलेख से -


- "जैन सिद्धान्त के अनुसार हमारा यह संसारप्रवास मात्र कारागार ही तो है जहां हम अपने स्वरूप को भूलने की सजा भोग रहे हें. 
ऐसे में हमें यहाँ सुविधापूर्वक टिके रहने के प्रयास करने चाहिए या इससे छूटने के उपक्रम करने चाहिए ? 
क्या स्थायीतौर पर रहने की और अपनी यात्रा के दौरान थोड़े से समय के 
अस्थायी पड़ाव की जीवनशैली एक जैसी हो सकती है?
नहीं न!"






जैनदर्शन और अन्य दर्शनों में एक बहुत बड़ा अंतर यह है कि अन्य दर्शनों में भगवान् अलग होते हें और उनके वन्दे अलग.
उनके अनुसार भगवान् सदा से भगवान थे और सदा भगवान् रहेंगे भी व सामान्य संसारीजीव सदा संसारी ही रहेंगे.  
संसारी जीव अपने भले-बुरे के लिए सदा भगवान् की कृपा पर ही निर्भर रहेंगे. 
भगवान् संसारी लोगों के शुभ-अशुभ कर्मों के अनुरूप उन्हें फल प्रदान करेंगे और समय-समय पर यदि भगवद्क्रपा मिल जाए तो इसका अपवाद भी संभव है. संभव है कि आपके दुष्कर्म माफ़ करदिये जाएँ और आपको शुभ फल ही मिले.
यहाँ यह स्पष्ट नहीं है कि कोई संसारी जीव शुभकर्म करे या अशुभकर्म, इसका नियंता कौन है?
यदि वह जीव स्वयं है तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि उसपर पूरी तरह भगवान् का नियंत्रण नहीं है. तब भगवान् सर्वशक्तिमान कैसे हुआ, जगत पर उसका सम्पूर्ण नियंत्रण कहाँ रहा?
यदि यह सब (संसारी जीवों के शुभ-अशुभ कर्म) भगवान् ही करबाते हें तो फिर उन दुष्कर्मों का दुष्फल उन भोले, विवश संसारियों को क्यों?
यह तो अन्याय हुआ न कि पहिले वही दुष्कर्म करबाए और फिर वही उन्हीं दुष्कर्मों के लिए दण्डित भी करे.
यह तो ऐसे हुआ कि “चोर से कहे चोरी कर और कोतवाल से कहे दंड दे.”
यदि कोई सर्वशक्तिमान भगवान् जगत का कर्ता-धर्ता है तो ऐसी अनीति तो संभव है नहीं.
खैर --------
हमें बात तो दूसरी करने थी.

जैनदर्शन में प्रत्येक आत्मा शक्तिरूप से परमात्मा है और अपना स्वरूप पहिचानकर उसीमें स्थित होकर पर्याय (वर्तमान) में भी परमात्मा बन सकता है.
जो आज परमात्मा हैं वेभी पहिले हमारे सामान ही संसारी थे जो कि उक्त विधि से ही परमात्मा बने हें.
यहाँ प्रत्येक आत्मा अपनेआप में (स्वयं के लिए) सर्वशक्तिमान है, सर्वगुण और वैभव सम्पन्न है पर परके लिए वह कुछ नहीं. उसका अन्य द्रव्यों (जीव-पुद्गलों इत्यादि) पर कोई नियंत्रण नहीं. इसीप्रकार किसी परद्रव्य का हममें भी कोई दखल नहीं, उनका व हमारा परिणमन स्वतन्त्र है, कोई किसी के आधीन नहीं.

इस प्रकार निष्कर्ष यह है कि जहां अन्य दर्शनों में संसारी जीवों के सामने अन्य कोई लक्ष्य नहीं है, शिवाय इसके कि प्रभुकृपा से उनका यह जीवन भौतिक सुख-शान्ति पूर्वक, अनुकूल संयोगों के बीच वैभवशाली शैली में व्यतीत होजाए.
यदि वे यह करपाए तो उनका यह जीवन सफल होगया अन्यथा निष्फल गया, बस! इसलिये उनके लिए तो यही उचित है कि जीवनभर धंधे-व्यापार में सक्रिय बने रहकर अधिकतम धनोपार्जन करें और उसका उपभोग करें, उपयुक्त उपयोग करें. कथित रूपसे सुखी जीवन व्यतीत करें और अंतत: ब्रहम्मलीन हो जाएँ.
उक्त के विपरीत जैन श्रावक यदि आत्मा से परमात्मा नहीं बन सके या परमात्मा बनने के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सके तो उनका जीवन सामान रूपसे निष्फल ही है, फिर चाहे वह चक्रवर्ती के वैभव के बीच लौकिक रूपसे (भौतिक रूप से) अत्यंत सफल रहकर बीते या किसी भी प्रकार की लौकिक उपलब्धि रहित, दरिद्री रहकर बीते. दोनों ही प्रकार के जीवन में कोई फर्क नहीं है क्योंकि अंतत: वह रहा तो संसार का संसार में ही, मुक्त तो हुआ नहीं.
रहा तो पामर ही, परमात्मा तो बना नहीं.
चाहे वैभवशाली रहे या दरिद्री, रहा तो संसार में ही न! मुक्त तो हुआ नहीं. 
कैद प्रथम श्रेणी की हो या तृतीय श्रेणी की, हथकड़ी सोने की हो या लोहे की दोनों बंधन ही हें, स्वतंत्रता के सामने दोनों एक जैसे ही हें, बंधन ही हें, त्यागने योग्य ही हें.
जैन श्रावक के जीवन की सफलता की एकमात्र कसौटी, एकमात्र लक्ष्य परमात्मा बनना है अन्य कुछ नहीं.

उक्त तथ्य जानलेने के बाद, समझ में आने के बाद, स्वीकृत होने के बाद यह कैसे संभव है कि जैन और जैनेतर लोगों की जीवनशैली एक जैसी ही हो, क्रियाकलाप एक जैसे ही बने रहें?

जब दोनों के लक्ष्य ही अलग-अलग हें तो उन्हें प्राप्त करने की प्रक्रिया एकजैसी कैसे हो सकती है. तब उन दोनों का नित्यक्रम और जीवनशैली एकजैसी कैसे हो सकती है, दोनों के क्रियाकलाप सामान कैसे हो सकते हें? उनमें तो आमूल अन्तर होना ही चाहिए, दोनों का जीवनक्रम एकदम भिन्न ही होना चाहिए.  

जैनेतर लोगों के लिए तो यही योग्य है कि वे दिनरात इस जीवन को वैभवशाली बनाने में रचेपचे रहें, भोग भोगने में ही लीन रहें, यदि अन्य लोगों का भलाबुरा करने के मामले में ईश्वर का ही एकाधिकार न हो तो अपना समय उनकी (अन्य लोगों की) भलाई के कामों में व्यतीत करें, नाम और पुन्य कमायें. शेष समय अपने किये दुष्कर्मों का दुष्फल भोगने से बचने के लिए तथा शुभकर्मों का सुफल पाने के लिए प्रभुकृपा पाने की प्रक्रियास्वरूप उनकी भक्ति-पूजा में अर्पण करदें.
इतना सब करलेने पर उनके कर्तव्यों की तो इतिश्री हो जाती है.

उक्त के विपरीत जैन लोग ऐसा कैसे कर सकते हें?
यदि वे यही सब करने में ही उलझे रहेंगे तो संसार के संसारमें ही बने रहेंगे, दुखी ही बने रहेंगे क्योंकि संसार में तो सुख है ही नहीं, संसार के सुखाभास तो दुखों के ही अन्य प्रकार हें, प्रकारान्तर हें, उनमें तो उनकी दिलचस्पी हो नहीं सकती है, होनी ही नहीं चाहिए. तब वे परमात्मा बनने और अनन्त सुखी होने का उपक्रम कब और कैसे करेंगे? 

जिसप्रकार अपने घर की स्थायी जीवनशैली भिन्न होती है और किसी कार्यवश बाहर जाने पर कुछ ही दिनों के लिए सराय (hotel) में ठहरने की अलग.
अपने घर में हम अपने लिए स्थायी तौर पर सभी प्रकार की सुविधाएं जुटाते हें पर जब बाहर जाने पर होटल में ठहरते हें तो वहां उस तरह की व्यवस्थाओं में उलझकर शक्ति,श्रम और समय बर्बाद नहीं करते हें. वहांतो कमसेकम साधनों की मदद से अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करके, अपना काम निपटाकर जल्दी से जल्दी अपने घर लौट जाना चाहते हें.
जैन मान्यता के अनुसार हमारा यह मानवजीवन, यह संसार हमारा अंतिम लक्ष्य नहीं है, यह हमारा स्थायी आवास भी नहीं है. यहाँ तो हम अपने मोक्ष पाने के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए कुछ दिनों के सराय के आवास (hotel stay) की तरह रुके हुए हें. ऐसी अवस्था में हम अन्य लोगों की ही तरह यहाँ की व्यवस्थाओं में ही अपना सम्पूर्ण समय और शक्तियों को कैसे झोंक सकते हें? हमें तो  अपना आत्मकल्याण का उपक्रम करके जल्दी से जल्दी यहाँ से आगे बढजाने का लक्ष्य रखना होगा.
कल्पना कीजिये कि हम अपने घर में भी नहीं हों और होटल में भी नहीं; किसी संयोगवश कारावास में ही रह रहे हों, तो हम क्या करेंगे ?
क्या वहां भी इसी प्रकार दीर्घावधि योजनायें बनाने लगेंगे, व्यवस्थाएं जुटाने में व्यस्त हो जायेंगे, या शीघ्रातिशीघ्र वहां से छूटने का उपक्रम करेंगे ?


जैन सिद्धान्त के अनुसार हमारा यह संसारप्रवास मात्र कारागार ही तो है , जहां हम अपने स्वरूप को भूलने की सजा भोग रहे हें. 

ऐसे में हमें यहाँ सुविधापूर्वक टिके रहने के प्रयास करने चाहिए या इससे छूटने के उपक्रम करने चाहिए ? 

क्या स्थायीतौर पर रहने की और अपनी यात्रा के दौरान थोड़े से समय के अस्थायी पड़ाव की जीवनशैली एक जैसी हो सकती है?
नहीं न!"

तब हम क्यों वही जीवन शैली अपनाते हें जो यहाँ के स्थायी निवासियों की है, जिनके पास यहाँ से आगे बढने के लिए कोई लक्ष्य ही नहीं है.

क्यों नहीं हम एक मुक्ति के साधक की जीवन शैली अपनाते हें ?

क्या इस बिषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यक्ता नहीं है? 
यदि हाँ ; तो कब करेगा तू यह कार्य ?
"शुभस्य शीघ्रम "

निश्चित ही जैन श्रावकों की जीवनशैली भिन्न होनी चाहिए. एकदम अलग, जगत की मान्यता से एकदम भिन्न, अनोखी, अद्भुत. वर्तमान में सम्पूर्ण, आकुलता रहित शांति प्रदान करने वाली और भविष्य के लिए सम्पूर्णता (परमपद) प्रदान करने वाली.
उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जैनश्रावकों को अपने दिन/जीवन के कमसेकम समय में अहिंसक तरीके से न्याय-नीति पूर्वक अपनी कमसेकम मूलभूत आवश्यक्ताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त आजीविका की व्यवस्था करके अपना शेष अधिकतम समय अपने त्रैकालिक सुख का उपाय करने (परमात्मा बनने) की साधना में व्यतीत करना चाहिए.
यदि अन्य लोगों की ही तरह वह भी अपनेआपको दिनरात मात्र कमाने और भोगने में ही व्यस्त रखेगा, मात्र इसी जन्म की संभाल में उलझा रहेगा तो अनंतकाल तक के लिए आत्मकल्याण का उपक्रम कब करेगा? 

जैन श्रावक की निव्रत्तिमय आत्मकल्याण के उपक्रम में लीन 
जीवनशैली ही श्रावकाचार कहलाती है, वही अनुकरणीय है, अनुषरनीय है, उपादेय है, एकमात्र कर्तव्य है.

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इस आलेख का उद्देश्य किसी धर्म, साम्प्रदाय, आस्था या मान्यता पर टिप्पणी करना, उसकी निन्दा या प्रशंसा करना या किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है. इसका उद्देश्य मात्र  "जैन  सिद्धांत " के परिपेक्ष्य में  सही जीवन शैली का निरूपण करना है. 
पाठकगण कृपया इसी भावना के साथ पढ़ें -

Sunday, September 20, 2015

लगता है अब बिदाई की वेला आ ही गई है : मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (2)

मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन -
लगता है अब बिदाई की वेला आ ही गई है.
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -

- "----अब यदि यह धर्माराधना के अनुकूल ही नहीं रहा, जब इसका अंत आ ही गया है तो यही सही. 
न तो यह हर्ष का बिषय है और न ही विलाप का. 
मैं न तो इसकी कामना ही करता हूँ और न ही इसके प्रति अरुचिवंत ही हूँ."

- "------मैं आज किसके साथ मित्रता का भाव लेकर जाऊं और किसके प्रति शत्रुता का? कलतो मैं उन्हें पहिचान ही नहीं पाउँगा."

- "-----जब मेरे बस में कुछ है ही नहीं तब मैं ही क्यों विकल्पों में उलझा रहूँ. इस देह को इसके अनुरूप परिणामित होने दो, क्यों नहीं मैं अपना कार्य करूं."

- "-----जीवनभर किया गया तत्वअभ्यास आज मेरी वह संचित निधि है जो मुझे इस संसार सागर से पार उस मुक्त अवस्था में पहुंचाएगी जहां से फिर कभी आवागमन नहीं होगा"







इस मामले में मैं पर्याप्त भाग्यशाली रहा कि मुझे इतना लंबा यह जीवन मिला जिससे मैं अधिकतम संभव समय तक जीवन जीकर आत्माराधना कर सका; अन्यथा जीवन में इतना समय मिलता ही कितनों को है.

एक तो यह मानव जीवन ही दुर्लभ है, फिर उत्तम धर्म, उत्तम कुल, जिनवाणी का श्रवण, स्वस्थ्य शरीर, उत्तम आजीविका, अनुकूल संबंधी और धर्माराधना के अनुकूल देश-काल.  
मेरा सौभाग्य कि मुझे यह सब कुछ उपलब्ध रहा.

यदि यह जीवन कुछ और दिन धर्माराधना के अनुकूल स्वस्थ्य बने रहकर चलता तो कुछ और समय धर्माराधना में व्यतीत होता पर अब यदि यह धर्माराधना के अनुकूल ही नहीं रहा, जब इसका अंत आ ही गया है तो यही सही. 
न तो यह हर्ष का बिषय है और न ही विलाप का. 
मैं न तो इसकी कामना ही करता हूँ और न ही इसके प्रति अरुचिवंत ही हूँ.
क्या नितप्रति जब हम अपने कपडे बदलते हें तो विलाप करते हें? 
नहीं न !
जबतक यह आत्मा (मैं) अशरीरी नहीं होजाता है तबतक इसका इस प्रकार शरीर बदलना भी तो एक सामान्य सी प्रक्रिया है,आखिर इसके प्रति इतनी संवेदनशीलता क्यों?
कपडे बदलने के प्रति संवेदनशील तो वे दरिद्री हो सकते हें जिन्हें वर्तमान वस्त्र त्यागदेने पर उससे बेहतर वस्त्र मिलने की उम्मीद न हो. 
मैंने तो इस प्रकार का धर्मसम्मत, संयमित जीवन जिया है कि मुझे अपने बेहतर भविष्य के बारे में संदेह का कोई  कारण ही नहीं है .

यूं भी सब कुछ तो देख-जान लिया है मैंने इस जीवन में, सब कुछ तो भोग लिया है, कुछ भी तो करना शेष नहीं रहा है.
इस संसार के स्वरूप का कोई भी पहलू तो मुझसे अपरिचित नहीं रहा, अब इससे कैसी ममता?

एक समय था (बचपन) जब लगता था कि मैं इनके (माता-पता व सम्बन्धी) बिना कैसे रहूँगा, फिर एक समय ऐसा आया जब लगने लगा कि ये मेरे बिना कैसे रहेंगे और फिर हम साथ-साथ कैसे और कब तक रह सकते हें भला. अब कहीं ऐसा न हो कि कोई विचारने लगे कि यहसब कब तक चलेगा?

कितनी निकटता से मैंने देखा और कितनी गहराई से अनुभव किया है कि जगत के ये संयोग, ये भोग कितने दोगले हें, दूर के ढोलों की ही तरह दूर से देखने पर कितने सुहाने लगते हें पर इनका यथार्थ तो विल्कुल इसके विपरीत है, जितना ही इन्हें भोगो, भूंख बढ़ती ही जाती है, तृप्ति तो कभी मिलती ही नहीं. 
स्पष्ट है कि तृप्ति का उपाय भोग नहीं.  इनके सहारे तो मुझे इस जीवन में कभी भी संतुष्टी और तृप्ति मिलेगी ही नहीं न ? तब क्यों मैं इनकी माया में ही उलझा रहूँ; क्यों नहीं किसी विश्वस्त आश्रय की तलाश करूँ, जहां मुझे सच्चा सुख और तृप्ति मिले, मात्र तात्कालिक ही नहीं वरन त्रैकालिक, हमेशा के लिए.
आज मुझे अपनी इस नादानी पर हंसी आरही है कि अबतक भी क्यों में इन्ही की माया में उलझा रहा ? 
इनका चरित्र तो सदा से ही स्पष्ट था, मैं स्वयं ही बहुत पहिले ही इस निष्कर्ष पर पहुँच ही गया था, पर फिर भी मैंने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया. बस इन्हीं की ममता में अटका रहा, इन्हीं के हाथों में खेलता रहा, इन भोगों और संयोगों ने मेरी शक्तियों और समय का भरपूर शोषण किया. 
अरे! इन्होंने क्या किया ?
ये कौन होते हें ऐसा करने वाले ?
मैंने ही तो यह सब होने दिया.
संयोगों ने कब मुझे भुलावे में रखा? वे तो निरंतर ही बदलते रहे, स्पष्ट संकेत देते रहे, पुकार-पुकारकर कहते रहे कि हम अस्थिर हें, हमतो बेबफा हें. मैंने ही उनके संकेतों को नहीं समझा. 
अब देखो न ! एक-एक कर सभी तो छोड़कर चले गए.
माता-पिता, बंधु-बांधव, सगे-संबंधी, मित्र-अनुचर (servants) कोई भी तो नहीं ठहरा साथ निभाने के लिए?
अरे माता-पिता के सामान निस्पृह, निस्वार्थ, ममतामयी संबंधी तो और कौन होता है, पर वे तो मुझे अबोध (innocent) छोड़कर ही चले गये थे. 
जब वे ही ना रहे तो और किसकी आशा की जाए? 
मुझे तो तभी समझ लेना चाहिए था, पर मैं नहीं समझा.

मानाकि माता-पिता ने तो मरकर ही छोड़ा था. वे तो कहाँ छोड़ना चाहते थे पर आखिर मौत पर किसका जोर चलता है. तब भी वे तो अंततक मेरी ही चिंता करते रहे, सबसे मेरे बारे में ही बातें करते रहे, स्वयं मुझे और अन्य सभीको मेरे ही बारे में निर्देश देते रहे, पर उनके जाने के बाद पिता सामान बड़े भाई तो जीतेजी ही छोड़कर चले गए न! जानबूझकर अनजान बनते हुए.
आखिर कौन था उनके शिवाय मेरा इस विशाल दुनिया में? पर उन्हें इस बात की परबाह ही कहाँ थी, उनके कुछ और भी तो अपने होगये थे न!

अब ये पत्नी और बच्चे हें जो भले ही मुझपर जान छिड़कते हें पर अब मैं ही कहाँ उनका हुआ? मैं भी तो आखिर चल ही दिया ना!

अरे! औरोंकी बात क्या करें, यह देह तो मेरी अपनी है, कितना जतन किया मैंने इसका? दिनरात इसीकी सेवा में तो लगा रहा.
इसको सजाने-संबारने में, इसको खिलाने-पिलाने में, न तो भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार किया और न ही दिन-रात का. 
इसको स्वस्थ्य रखने के लोभ में कितनी बर्जिसें कीं. 
सरे बाजार घोड़े जैसा दौड़ा और कुत्ते जैसा हाँफा.
भोजन किया तो इसके पोषण के लिए, छोड़ा तो इसके स्वास्थ्य के लिए.
मैं इसके प्रति कितना समर्पित बना रहा पर इसने कब मेरी एक भी सुनी?

जिस जबानी पर मैं इतना इठलाता था, वही मुझे छोड़कर चली गई.
जिस शक्ति पर मुझे इतना गुमान था अब वही नहीं रही?
मेरे वे सुन्दर रेशमी बाल, जिसकी एक-एक लट को मैं घंटों-घंटों सजाता-संबारता था, कहाँ गए बे?
पहिले वे एक-एक कर काले से सफ़ेद होते गए, मैं उनपर कालिख पोत-पोतकर ही जैसे-तैसे काम चलाता रहा पर मैं अंतत: असहाय सा ताकता ही रहा और आखिर वे भी मैदान छोड़ ही भागे. 

यही हाल इस जमीन-जायजाद और धन-सम्पत्ति का रहा, इसने तो मानों सराय ही समझ लिया था मेरे घर को, जब चाहे आजाती और चाहे जब चली जाती, मानो इसे इजाजत लेने की तो आवश्यक्ता ही न थी. 
मैं ही इसका चाकर बना रहा, जब आई तो जश्न मनाता रहा, गई तो क्रंदन करता रहा इस जैसी बेबफा के लिए. अब इसे बुद्धी का दिवालियापन नहीं तो और क्या कहा जाए? 

इस प्रकार सारे ही संयोग तो एक-एककर मुझे छोड़कर चले गए. 
वे तो चले गए पर में तब भी उन्हीं की ममता में अटका रहा. विलाप करता रहा, दुखी होता रहा.
तब तो वे जाते थे और मैं रह जाता था विरही बनकर, पर अब आज में ही चला उन्हें विरह की वेदना में छोड़कर.

पता नहीं क्यों बहुत बुरा-भला कहते हें लोग इस मौत को, इसके विचार मात्र से कांपते हें, इसके जिक्र से ही परहेज करते हें. 
क्यों नहीं लोग समझ पाते हें कि मौत तो हमारी मित्र है जो इस सड़े-गले, जर्जर, भग्न शरीर से छुटकारा दिलाकर हमें नया स्वस्थ्य शरीर प्रदान करती है.
जिन जैसे संयोगों को छोड़कर मैं यहाँ से जारहा हूँ इन्हें तो मैं भूल जाउंगा, इस बार मुझे तो उनसे विरह की पीड़ा होगी नहीं, मैं तो अपनी आदत के अनुरूप अपने नए संयोगों में तन्मय हो जाउंगा. 
अनादिकाल से आजतक मैं कितनी बार कितने जीवों के निकट संपर्क में आया और फिर उनसे बिछुड़ गया, अब मैं उन्हें जनता तक नहीं, उनकी याद में विरह की पीड़ा हो इस बात का तो प्रश्न कहाँ है?
संसार के इन अनन्त जीवों में से कितने जीव, मेरे कितने भवों में मेरे निकट संबंधी और हितैषी रहे होंगे और कितने प्रतिद्वंद्वी व बैरी; पर मैं आज किसे पहिचानता हूँ?
ऐसे में मैं आज किसके साथ मित्रता का भाव लेकर जाऊं और किसके प्रति शत्रुता का? कलतो मैं उन्हें पहिचान ही नहीं पाउँगा.
संभव है कि आज जो शत्रु हें, अत्यंत पराये हें, कल वे ही मेरे निकटतम और संबंधी बन जाएँ और आज जो अपने हें वे पराये हो जाएँ.
हो नहो, जो आज मेरे अपने हें, अत्यंत निकट हें, वे ही कल तक प्रतिद्वंद्वी व पराये रहे हों. 
अब कोई तो कहे कि किसे अपना मानकर प्रीति करूं और किसे पराया जानकर बेरुखी दिखलाऊं? सभीतो एक जैसे ही परद्रव्य हें जो न कभी "मैं "हुए हें और न ही "मेरे". 

जिन्हें मैं छोड़कर जारहा हूँ वे भी अपने नए संयोगों में व्यस्त हो जायेंगे. आखिर इस दुनियाँ में किसके लिए क्या रुक जाता है, ऐसी ही स्थितियों में मैं स्वयं ही कब किसी के लिए ठहरा? 
आखिर क्या नहीं होगा? 
क्या भूंख या प्यास नहीं लगेगी, क्या मलमूत्र क्षेपण नहीं होगा, या श्वासोच्छ्वास ही रुक जाएगा? 
क्या दिन-रात नहीं होंगे, निद्रा और जागरण नहीं होगा, क्या आवागमन ठहर जाएगा ?
जब यह सबकुछ चलेगा तो यह धन्धा-व्यापार ही कबतक बंद रह सकेगा? 
यह सबतो चलता ही रहेगा, मेरे चलेजाने से क्या रुक जाएगा? 
कुछ दिनों में तो लोग भूल ही जायेंगे कि इस नाम का भी कोई व्यक्ति था.
यूं भी मुझे इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि कोई याद करे या भूल ही जाये. जब मैं ही वह नहीं रहा.
रही बात संयोगों की तो ऐसे ही संयोग मुझे वहां भी मिल ही जायेंगे जहां मैं जारहा हूँ, मैं उनमें गाफिल हो जाउंगा. मैं भी कब इन्हें याद करने वाला हूँ ?
यही उचित भी तो है ! आखिर हम जैसे लोगों के जीवन में ऐसा है ही क्या जिसे याद रखा जाए, आखिर हम किस मायने में अन्यों से भिन्न और विशिष्ट हें जो उल्लेखनीय हो?

आज जब यह शरीर आत्माराधना के अनुकूल ना रहा, मैं सबके लिए अनुपयोगी होगया और सब मेरे लिए असहाय, वेदना रहित निराकुलता न रही, यह जीवन संभव ही न रहा, सबसे अच्छी बात तो यह है कि मेरी यह अवस्था देख-समझकर सभी लोग मेरे बिना जीवन जीने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो ही गए हें, जब मेरे बस में कुछ है ही नहीं तब मैं ही क्यों विकल्पों में उलझा रहूँ. इस देह को इसके अनुरूप परिणामित होने दो, क्यों नहीं मैं अपना कार्य करूं. 
यूं तो आज इस अवस्था में मेरे लिए यह भी संभव नहीं होता कि जिनवाणी का अध्ययन व श्रवण कर सकूं, उसके मर्म को, अपने इस आत्मा के वैभव को समझ सकूं, स्वपरभेद्विज्ञान कर सकूं पर जीवनभर किया गया तत्वअभ्यास आज मेरी वह संचित निधि है जो मुझे इस संसार सागर से पार उस मुक्त अवस्था में पहुंचाएगी जहां से फिर कभी आवागमन नहीं होगा , मैं फिर कभी माँ की कोख में नहीं जाउंगा, फिर कभी आज जैसी इस अवस्था में नहीं आउंगा.

अब मैं स्वयं में स्थित होता हूँ.
अस्तु !




Monday, July 20, 2015

यह संपत्ति है या विपत्ति ?

अरे भूले भगवान ! ये जो दुनिया की दौलत है न , यह तो एकांत (सिर्फ और सिर्फ ) दुःख ही है .
इसका कमाना दुखदायक है , संभालना दुखदायक है , भोगना दुखदायक है और छोड़ना भी दुखदायक है .

यह संपत्ति है या विपत्ति ?
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

अभी यह बात जाने भी दीजिये क़ि जो हमने भोग लिया वह हमारा हुआ या नहीं ; पर जो हमने भोगा नहीं , हमारी उस धन-संपत्ति में और उस सरकारी धन-संपत्ति में क्या फर्क है जिसका लेखाजोखा रखने की नौकरी हम करते हें .
हम दोनों का सिर्फ हिसाब ही तो रखते हें , हम उसका स्पर्श तक तो करते नहीं .
यदि कोई फर्क है तो सिर्फ इतना क़ि सरकारी हिसाब-किताब करके हम चैन की नींद सो जाते हें , हमें उसकी चिंता नहीं सताती है पर जिसे हम अपना मानते हें उसकी सुरक्षा की चिंता हमारी रातों की नींद हराम जरूर कर देती है .
अरे ! यह जो परिग्रह हमने कमा कर इकट्ठा कर लिया है इसने हमारा सिर्फ वही समय नहीं खाया है जो हमने इसे कमाने में व्यतीत किया है , वल्कि अब यह प्रतिपल हमारे उपयोग को खाता है , उलझाए रखता है , विकल्प जाल में .
यह निन्यानबे का फेर बड़ा खतरनाक है ! 
यदि १ रुपया कम है तो चित्त इस चिंतन ( चिंता , चिता ) में डूबा रहता है क़ि कहाँ से लाऊं और यदि एक ज्यादा हो जाता है तो यह चिंतन भी कोई कम नहीं क़ि अब इसे कहाँ ठिकाने लगाऊं क़ि कहीं नष्ट न हो जाए , बस बढ़ता रहे .
अरे ! ये कमाई सुकून तो पल भर को देती है ( क्या सचमुच देती है ?) पर सुकून जीवन भर का हर लेती है .
और तो और ; मरने के बाद इसका क्या होगा इसी चिंता में डूबा रहता है ये.
मन तो नहीं मानता ( यदि मानता तो जीतेजी न दे देता ? ), पर जिसके  कहने भर को भी कोई अपने हें वह तो अपनी संपत्ति उनके नाम करके सुकून पाता है ( झूंठा ही सही ) पर जिनका कोई अपना नहीं है उनकी ये दुर्दशा तो हमसे देखी ही नहीं जाती .
छाती फटती है उनकी .
खाया या भोगा जाता नहीं , आखिर कितना खायेगा या भोगेगा ; उसकी भी तो शक्ति चाहिए न ! 
साथ लेजा नहीं सकता और किसी को देने का मन नहीं करता है .
उसे तो बस यह़ी लगता है क़ि मैं लुटा जा रहा हूँ.
अरे भोले ! 
तू तो लुट ही चुका है. 
उस दिन नहीं जब तू यह सब छोड़कर मर जाता है या कोई यह सब तुझसे छीन लेता है.
तू तो उस दिन ही लुट चुका जब तूने यह सब इकट्ठा करने में अपना समय गंबा दिया, और रही सही कसर तेरी उस चिंता ने करदी जो तू इस सब के लिए करता रहा ( मरता रहा ).
अब जो यह पीड़ा तू भोग रहा है वह तो अतिरिक्त है.
अधिक क्या कहूं, अपने सुख-चैन और यहाँ तक कि जीवन को भी संकट में डालकर जब यह धन कमा लेता है तो इसकी अनेकों समस्याओं में एक समस्या और जुड़ जाती है. उक्त धन को सार्थक करने की चिंता.
आखिर करे क्या इस धन का; यदि इसका उपयोग ही नहीं किया तो कमाने का फायदा ही क्या है ?  
इस प्रकार अनेक कष्टों से उपार्जित इस धन को सार्थक करने के फेर में लोग अनावश्यक ही गन्दी आदतें अपना लेते हें और अपने तन, मन और जीवन को भी दूषित कर बैठते हें.
एक ओर तो धन की अधिकता होने पर व्यर्थ ही अनेकों लोग आपके इर्दगिर्द इस तरह से मंडराने लगते हें जिस प्रकार शक्कर के ऊपर चींटी. ये लोग निरन्तर आपके चित्त को उद्वेलित करते रहते हें, आपको चैन से बैठने ही नहीं देते हें.
ऐसे लोगों में अनेकों तो ऐसे होते हें जो येनकेनप्रकारेण आपसे आपका धन हड़प लेना चाहते हें, बहला-फुसलाकर दान या भिक्षा के नाम पर या फिर चोरी से या ठगकर भी. इनके अलावा अनेकों गुलाम वृत्ति के लोग तो ऐसे होते हें जिनके किसी भी प्रयोजन की सिद्धी किसी भी तरह से आपके द्वारा न तो होती ही है और न ही कभी हो सकती है तथापि बस खामखाँ अहो भाव से आपके इर्दगिर्द मन्डराते रहते हें और आपका ध्यान आकर्षित करने का प्रयत्न करते हुए आपको परेशान करते रहते हें.
यह दौलत आपको अपने प्रिय अपनों से दूर कर कर देती है, वे या तो अपनी उचित-अनुचित आशा-अपेक्षाएं पूरी न होने से, या इर्ष्या व द्वेष वश या, हीनता और उच्चता की भावना के वशीभूत होकर या और कुछ नहीं तो आपके पास उनके लिए समय का आभाव होने के कारण ही सही, आपसे दूर हो जाते हें और उनका स्थान ऐसे लोग लेलेते हें जिनसे आपका कोई मनमेल ही नहीं होता है, जैसे आपके अपने ही नौकर-चाकर, सहायक या चापलूस, ठग-चोर या भिखारी और इन सबसे बढ़कर वे सरकारी विभाग और कर्मचारी जो वलात ही आपको लोभ देकर,  भय दिखाकर या डरा-धमकाकर आपका धन आपसे छीन लेने के फेर में रहते हें, मात्र चोर ही नहीं पुलिस की निगाह भी आपकी दौलत पर लगी रहती है, आपके रक्षक ही आपके भक्षक बन जाते हें.
अधिक क्या कहूं, वे लोग जिन्हें आपसे और आपको जिनसे कोई सारोकार ही नहीं ऐसे लोग भी व्यर्थ ही  आपके प्रति द्वेष पालकर बैठ जाते हें और यत्र तत्र सर्वत्र ही आपके प्रति कदम-कदम पर अपशब्दों का इस्तेमाल करते देखे जाते हें, यथा - "हूँह ! काली कमाई पर इतरा रहा है" और न जाने क्या क्या. ऐसे लोग आपको अपराधी और आपकी दौलत को अन्याय से अर्जित अपवित्र करार देते नहीं थकते. ये आपको समाज के शोषक कहते और मानते हें.

अरे भूले भगवान ! इस प्रकार हम यह पाते हें कि ये जो दुनिया की दौलत है न, यह तो एकांत (सिर्फ और सिर्फ ) दुःख ही है.
इसका कमाना दुखदायक है, संभालना दुखदायक है, भोगना दुखदायक है और छूटजाना भी दुखदायक है.
फिर क्यों उलझा रहता है बस इसी में ?
इसे छोड़ दे , तभी तेरा कल्याण होगा .



Friday, June 12, 2015

दरिद्री कौन ?

दरिद्री कौन ?
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल

जिसे जितना कम चाहिए वह उतना ही अधिक सम्पन्न है।

जिसे कुछ नहीं चाहिए वह सम्पूर्ण है। 
क्यों ?
क्योंकि वह अपने में कमी महसूस ही नहीं करता है।

जिसे जितना अधिक चाहिए वह उतना ही बड़ा दरिद्री है क्योंकि वह अपने पास उतनी ही अधिक कमी महसूस कर रहा है । 

किसके पास कितना, क्या है या नहीं है, इस बात से उनके सम्पन्न या दरिद्री होने का कोइ सम्बन्ध नहीं है क्योंकि कुछभी किसीका नहीं है, प्रत्येक कण स्वतंत्र है।

Friday, April 24, 2015

यदि हम चाहते हें कि हमारे साथ भद्रता का व्यवहार हो तो हमें स्वयं भद्र बने रहना होगा.

यदि हम चाहते हें कि हमारे साथ भद्रता का व्यवहार हो तो हमें स्वयं भद्र बने रहना होगा.
-    परमात्म प्रकाश भारिल्ल
यथार्थ तो यथार्थ हें और वे यथार्थ ही रहेंगे, यथार्थ बदलते नहीं; भद्रता से नहीं और अभद्रता से भी नहीं; पर हमारी भद्रता प्रतिपक्षी के बार की धार को कुंद कर देती है, कभी–कभी तो इस हद तक कि बार, बार ही न लगे, पुष्प बर्षा सा लगे.
सामान्यतया किसी को यह अहसास भी नहीं होता है कि किस प्रकार उसके व्यवहार की भद्रता ने जीवनभर उनकी रक्षा की है.
जगत ने उनके दोषों की अनदेखी है, स्वयं का नुकसान करके भी उनके प्रति अपने व्यवहार में मृदुता बनाए रखी है.
उनकी मृदुता ने उनपर संभावित एवं अपेक्षित अनन्त आक्रमणों को रोका है, इस हद तक रोका है कि वह स्वयं ही अपने बारे में भ्रमित धारणाओं के साथ जीने लगा है.
उसे लगने लगता है कि वह तो गुणों की खान है और उसमें दोष तो हें ही नहीं, या कदाचित वह मानने लगता है कि जगत इतना भोला है कि उसके अभिनय में बहल जाता है और जगत के लोगों में मेरे अन्तरंग को पहिचानने की सामर्थ्य और द्रष्टि ही नहीं है.

होता यह है कि जगत के लोग यह सोचते हें कि यदि यह सभ्यता के आवरण में अपनी पशुता को छुपाये हुए है तो हम क्यों व्यर्थ ही उसे अनावृत करने (उधाड़ने में) में अपना योगदान करें, कुछ लोगों को तो सज्जन बने रहने दें, भले ही अभिनय ही सही.

यदि हमें जगत की ओर से अपने प्रति भद्रता की अपेक्षा है तो हमें अपने व्यवहार की मृदुता कायम रखनी चाहिए.

यदि हमें जगत के लोगों की अपने सम्बन्ध में धारणा सम्बन्धी अपना भ्रम तोड़ना ही हो बस एक बार अपनी भद्रता के कवच से बाहर निकल कर देखिये, पलभर में ही आपके व्यक्तित्व के सम्बन्ध में लोगों की धारणा का सत्य सामने आजायेगा.

आप किसी के इस कथन को असत्य मानने की भूल कभी मत कीजिये कि -“मुझसे बुरा कोई नहीं होगा” कदाचित मात्र यही कहते वक्त वे सत्य बोल रहे होते हें.


सुन्दर त्वचा का बाहरी आवरण हमारे अन्दर व्याप्त मलिनता को मात्र छुपाये ही रहता है, वरना जानता कौन नहीं कि इस सलोनी त्वचा के आवरण से ढंके अन्तर में आपकी हकीकत क्या है ?