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Monday, September 5, 2011

दर्पण में अपना रूप देखकर आज तक भला कौन संतुष्ट हुआ है -

दर्पण में अपना रूप देखकर आज तक भला कौन संतुष्ट हुआ है -

"--------न जाने ऐसी कौनसी महत्वपूर्ण व सुन्दरतम वस्तु है यह दर्पण क़ि दुनिया का हर व्यक्ति , चाहे वह स्वयं कितना ही व्यस्त क्यों न हो और उसका समय कितना ही कीमती क्यों न हो , अपने दिन का , अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय (prime time ) दर्पण के सामने बिताता है ---------------"

परमात्म प्रकाश भारिल्ल -१५ मार्च २०००


तो जीवन कैसे आकार लेगा ?

जब विचार ही आकार नहीं ले पाएंगे तो जीवन कैसे आकार लेगा ?

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल -अंतर्द्वंद्व ,अपनी बात

विचारों को भी आकार देना साधारण काम नहीं है


जीवन को आकार देना तो बात ही और है पर विचारों को भी आकार देना साधारण काम नहीं है .जिस प्रकार आधारहीन भारहीन तिनके हवा से विचलित हो जाते हें ,बिखर जाते हें ,उसी प्रकार हमारे विचरों का प्रवाह भी नित्यक्रम के अत्यंत सामान्य से घटनाक्रमों से छिन्न भिन्न हो जाता है . इस प्रकार तिनकों से बने घोंसलों के समान हमारे विचार जीवन भर बदलते रहते हें , विचारधारा का आकार ग्रहण नहीं कर पाते .

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल -अंतर्द्वंद्व ,अपनी बात

यह एक सतत प्रक्रिया है .


अपने विचारों के अनुरूप अपने जीवन को ढालना कोई एक दिन का कार्य नहीं है ,वरन यह एक सतत प्रक्रिया है .

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल -अंतर्द्वंद्व ,अपनी बात

तो हमें अपना शिल्पी स्वयं बनना होगा

यदि हम किसी और के द्वारा निर्मित किसी भी कृति को पसंद नहीं करते तो फिर भला फिर हम अपने आपको गढ़े जाने के लिए किसके हवाले करदें ? इसलिए यदि हम अपने जीवन को अपनी स्वयं की परिकल्पना के अनुरूप एक आदर्श शिल्प बनाना चाहते हें तो हमें अपना शिल्पी स्वयं बनना होगा .

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल -अंतर्द्वंद्व ,अपनी बात

हमें अपना शिल्पी स्वयं बनना होगा


शिल्प में जो कुछ भी अभिव्यक्त होता है वह शिल्पी का अपना द्रष्टिकोण होता है , उसकी अपनी परिकल्पना होती है . हमें अपने आपको जिस रूप में ढालना है वह किसी अन्य की परिकल्पना नहीं वरन हमारा अपना स्वप्न है ,हमारा अपना स्वप्न होना चाहिए ,और इसलिए हमें अपना शिल्पी स्वयं बनना होगा .

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल -अंतर्द्वंद्व ,अपनी बात

हमें तो लोक में पैसे से ज्यादा सुन्दर कुछ दिखाई ही नहीं देता है


हमें तो लोक में पैसे से ज्यादा सुन्दर कुछ दिखाई ही नहीं देता है ,न जाने कैसा गजब का आकर्षण है इसमें ,सारी दुनियां दीवानी हुई जा रही है इसके पीछे .

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल ,अंतर्द्वंद्व- पेज-14

मेरी दुखती रग


मेरी दुखती रग -

कौन कहता है मेरे पास कुछ नहीं है अपने साथ ले जाने के लिए. हाँ लेजाने लायक कुछ नहीं है, पर लेजाने के लिए तो है ना ! जीवन भर किये गए पापों का बोझ .

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल , अन्तर्द्वन्द्व -पेज

मेरा द्वंद्व-


मेरा द्वंद्व-

जिस पैसे के लिए हम अपना सारा जीवन झोंक डालते हें ,क्या वह सम्पूर्ण पैसा देकर भी हम पुन: जीवन का एक क्षण भी खरीद सकते हें ? नहीं ! तब हम अपना यह जीवन धनोपार्जन में कैसे झोंक सकते हें ?

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल , अन्तर्द्वन्द्व -पेज 14

काश ! जीवन दो बार जीने को मिलता


मेरी वेचारगी-

कभी-कभी सोचता हूँ क़ि काश ! जीवन दो बार जीने को मिलता ;एक बार सीखने के लिए ,अनुभव लेने के लिए ,ट्रायल करने के लिए व् फिर दूसरी बार पूरी तरह जीने के लिए ;पर यह तो कल्पना लोक की उडान है,यथार्थ जीवन में तो यह संभव नहीं है

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल ,अन्तर्द्वन्द्व -अपनी बात