शिल्प में जो कुछ भी अभिव्यक्त होता है वह शिल्पी का अपना द्रष्टिकोण होता है , उसकी अपनी परिकल्पना होती है . हमें अपने आपको जिस रूप में ढालना है वह किसी अन्य की परिकल्पना नहीं वरन हमारा अपना स्वप्न है ,हमारा अपना स्वप्न होना चाहिए ,और इसलिए हमें अपना शिल्पी स्वयं बनना होगा .
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल -अंतर्द्वंद्व , अपनी बात
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