Showing posts with label धर्म और दर्शन के विभिन्न बिषयों पर मेरा समीक्षात्मक द्रष्टिकोण. Show all posts
Showing posts with label धर्म और दर्शन के विभिन्न बिषयों पर मेरा समीक्षात्मक द्रष्टिकोण. Show all posts

Thursday, August 13, 2015

तू अपनी यह वक्रता और मायाचार कब त्यागेगा? क्या अब भी तुझे मोक्ष जाने की कोई जल्दी नहीं है?

इसी लेख से -
"कदाचित किसी ज्ञानी-धर्मात्मा के प्रति तेरा अनन्त राग और उनके विरह की वेदना ही तो तुझे विचलित नहीं कर रही है?
राग तो राग है भाई! 
राग तो आग है, किसी के प्रति ही क्यों न हो, वह तो जलाएगा ही."------------------------------

"क्यों नहीं जहाँ से भी जिसके पास से भी केवली भगवान की और सम्यग्द्रष्टि धर्मात्मा की वाणी सुनने और पढने को मिले, तदनुसार युक्ति और विवेक के अनुसार अपने स्वरूप का निर्णय करूं और फिर अपने उस निर्णय का हाजराहुजूर भगवान आत्मा से मिलान करलूं.
यदि तीर्थंकर केवली विद्यमान भी हों और हमने उनकी वाणी प्रत्यक्ष भी सुनी हो तब भी तत्व निर्णय की विधि तो यह़ी है."





तू अपनी यह वक्रता और मायाचार कब त्यागेगा? क्या अब भी तुझे मोक्ष जाने की कोई जल्दी नहीं है?

- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

हे भव्य आत्मार्थी !
इस कलिकाल में वीतरागी, सर्वज्ञ का तो विरह है. सम्यग्द्रष्टि ज्ञानी का भी संयोग हो या न हो, या संभव है संयोग होकर फिर विरह हो जाबे.
यदि अब आज सम्यग्द्रष्टि का संयोग मुझे नहीं है तब वियोग की अपेक्षा तो सम्यग्द्रष्टि और केवली दोनों ही मेरे लिए समान हुए न ! 
तब यदि आश ही करनी है तो सम्यग्द्रष्टि की क्या आश करूं, केवली की क्यों नहीं?
यूं भी वियोग तो वियोग है, पल भर पूर्व हुआ हो या अनंतकाल पूर्व.
अब यदि अभी संयोग दोनों का ही नहीं है और वाणी दोनों की ही हमारे पास विद्यमान है, तो हमारे लिए तो दोनों ही समान ही है न?
फिर संयोग और वियोग तो अपने आधीन हें नहीं पर अपना भगवान आत्मा अपने साथ है, मैं स्वयं ही तो आत्मा हूँ.
तब क्यों नहीं जहाँ से भी जिसके पास से भी केवली भगवान की और सम्यग्द्रष्टि धर्मात्मा की वाणी सुनने और पढने को मिले, तदनुसार युक्ति और विवेक के अनुसार अपने स्वरूप का निर्णय करूं और फिर अपने उस निर्णय का हाजराहुजूर भगवान आत्मा से मिलान करलूं.
यदि तीर्थंकर केवली विद्यमान भी हों और हमने उनकी वाणी प्रत्यक्ष भी सुनी हो तब भी तत्व निर्णय की विधि तो यह़ी है.
अब तू ही बतला क़ि यदि अभी तू स्वयं समोशरण में बैठकर ही भगवान की वाणी सुन रहा हो तब भी तू क्या करेगा? तब भी तो यह़ी करना होगा.
तब फिर तेरा क्या लुट गया है? 
क्या है जो तुझे प्राप्त नहीं है? 
कौन है जो तुझे आत्मानुभव से रोकता है?
कदाचित किसी ज्ञानी-धर्मात्मा के प्रति तेरा अनन्त राग और उनके विरह की वेदना ही तो तुझे विचलित नहीं कर रही है?
राग तो राग है भाई! 
राग तो आग है, किसी के प्रति ही क्यों न हो, वह तो जलाएगा ही.
जो ज्ञानी थे, जिन्हें तूने ज्ञानी स्वीकार किया था उनका विरह हो गया है.
कदाचित आज भी ज्ञानी विद्यमान हों पर तुझे उनका संयोग न हो.
यह भी संभव है क़ि संयोगवश तुझे उनका संयोग हो भी जाबे और तू उन्हें पहिचान ही न पाए.
आखिर ज्ञानी की पहिचान भी तो ज्ञानी ही कर सकता है न, अज्ञानी तो कर नहीं सकता.
तब तेरे पास उपाय ही क्या है, तुझे उस ज्ञानी से परिचय कौन कराएगा?
अब कौन है जो तुझे बतलाये क़ि फलां व्यक्ति ज्ञानी है, उसके स्वयं के ज्ञानी होने का प्रमाण कौन देगा? 
यदि वही स्वयं ज्ञानी न हुआ तो? यदि वह भी अज्ञानी ही हो तो?
इस प्रकार तो तू जिसे ज्ञानी मान रहा है, उस ज्ञानी और उसके ज्ञान के प्रति तेरी श्रद्धा मात्र एक संयोग ही तो है.
मात्र संयोगवशात ही तुझे इस बात का भरोसा हो गया क़ि फलां व्यक्ति ज्ञानी है या था. तेरे पास तो उस ज्ञानी के भी ज्ञानी होने का कोई प्रमाण नहीं है न?
यूं भी जब तू स्वयं ही ज्ञानी नहीं है तो किसी के ज्ञानी होने या न होने का निर्णय करने वाला तू कौन है?
तेरे निर्णय की कीमत ही क्या है?
और फिर तूने इस जीवन में किसी ज्ञानी की खोज के लिए प्रयास ही कब किये हें?
ऐसे कई लोग हें जिन्हें बहुत लोग ज्ञानी मानते हें, जिनके तत्व निरूपण में भी कोई विपरीतता नहीं है, पर वे ज्ञानी हें या नहीं इस बात की हमने कब परीक्षा करने की कोशिश की है? हम तो उन्हें दूर से ही अस्वीकार कर देते हें? क्यों ?
सत्य तो यह है क़ि कोई ज्ञानी (अनुभवी) है या अज्ञानी, यह उसकी अपनी निधि है, पर यदि वह जिनवाणी के अनुसार तत्व का सच्चा निरूपण करता है तो वह हमारे लिए तो कार्यकारी है और यदि पूर्वमें हमें कभी किसी ज्ञानी की देशना सुलभ हुई हो तो सम्यग्दर्शन में निमित्त भी हो सकती है.
अगर हम उक्त तथ्य को स्वीकार नहीं करेंगे तो उस देश और काल में तो तत्वचर्चा का ही लोप हो जाएगा जहाँ कन्फर्म और प्रमाणित (certified & certified) ज्ञानी की उपस्थिति न हो. 
क्या आपको या किसी को भी यह इष्ट हो सकता है?
कहीं ऐसा तो नहीं है न कि अपने किसी व्यामोह भरे आग्रह के कारण हम स्वयं अपने लिए और अन्यों के लिए आत्मकल्याण का मार्ग ही अवरुद्ध कर रहे हें?
क्या यह आत्मघाती अनर्थ नहीं है?
अरे अभागे!
अनादिकाल से ऐसे ही दुराग्रहों के कारण तू संसार में भटक रहा है, क्या फिर भी तूने कोई सबक नहीं सीखा?
तू अपनी यह वक्रता और मायाचार कब त्यागेगा?
क्या अब भी तुझे मोक्ष जाने की कोई जल्दी नहीं है?
अरे भोले! 
यदि मेरी माने तो उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हमें अपने द्रष्टिकोण में परिवर्तन करके उचित निर्णय करना योग्य है, अन्यथा हमें तो मालूम नहीं कि केवली भगवान् के ज्ञान में तेरा भविष्य कैसा आया है.


Monday, June 22, 2015

आध्यात्मिक ज्ञानदान ही सभी प्रकार के दानों में सर्वोत्तम है.

आध्यात्मिक ज्ञानदान ही सभी प्रकार के दानों में सर्वोत्तम है.

 -- परमात्म प्रकाश भारिल्ल

 आध्यात्मिक ज्ञानदान ही सभी प्रकार के दानों में सर्वोत्तम है. क्योंकि यह अनंतकाल तक जीवके साथ रहेगा और जीव को शिद्धशिला तक ले जाएगा.

ज्ञानदान का प्रभाव दीर्घजीवी होने के कारण सर्वोत्तम है.

तीर्थंकर और गणधर भी मात्र यही उपकार करते हें....


लौकिक शिक्षा (ज्ञान) मात्र इसी जीवन में योगदान करेगा और यह मोक्ष का मार्ग नहीं, मात्र संसार बढाने में ही योगदान करेगा. 

 एक बात और ज्ञान आप कितना ही बांटिये, कभी कम नहीं होगा, कम नहीं पडेगा, कितने ही काल तक, कितने ही लोगों को, कितने ही क्षेत्र में बांटते रहिये बस.

भूंखे को भोजन करबाना भी है तो उत्तम कार्य, पर आप कितना कर सकते हें ?
१-२-४, १०-२० , १००-२००, १०००-२००० लोगों को ?
वह भी कितने दिन ?
कहीं तो सीमा होगी ?
किसी को भोजन कराओ और कुछ ही घंटों में फिर भूँखा !


क्या कोई धन कुबेर भी बिना मूल्य एक आदमी का जीवनभर भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी ले सकता है ?
ज्ञानदान करने वाले ऐसा कर सकते हें, अनंत जीवों को अनंतकाल तक के लिए सुखी करने की जिम्मेदारी ले सकते हें.


है न महान काम ?

क्या आप यह काम नहीं करना चाहते हें ?

यदि हाँ, तो धार्मिक शिक्षण के लिए पाठशालाएं खोलने और संचालन करने में हमें सहयोग कीजिये.

Sunday, June 14, 2015

किसीको धर्म (आत्मकल्याण) के मार्ग पर लगाना ही उसके व जगत के प्रति अनन्त उपकार है ।

किसीको धर्म (आत्मकल्याण) के मार्ग पर लगाना ही उसके व जगत के प्रति अनन्त उपकार है ।
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल

इन्द्रभूति गौतम (महावीर के मुख्य गणधर) जैसे तद्भव मोक्षगामी को भी इसी प्रकार सन्मार्ग पर लगाया गया था ।

यह कार्य साधारण नहीं, स्वयं सौधर्म इन्द्र ने यही काम किया था, वर्ना वक़्त की वलिहारी तो देखिए - 

-तीर्थंकर जैसे वक़्ता हों

-सौधर्म इन्द्र जैसे व्यबस्थापक

और 
समोसरण जैसी भव्य सभा 

तबभी एक योग्य श्रोता न मिले ?
और इसलिए तीर्थंकर की दिव्यध्वनि न खिर सके ।

धन्य हैं वे लोग जो ऐसे महान कार्य में लगे हैं।
यह
क्या आप भी ऐसे ही सौभाग्यशाली हैं ?

Saturday, October 12, 2013

क्या तुझे अपना कल्याण नहीं करना है ? तब फिर क्यों नहीं सारे आग्रह और बंधन तोड़कर सत्य का निर्णय करता है ?

सत्य का निर्णय -
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

दुनिया में अनेकों धर्म , मान्यताएं और कुल परम्पराएं हें , वे सभी एक दूसरे से भिन्न ही नहीं विपरीत भी हें। 
एक दूसरे के सर्वथा विपरीत होने से वे सभी तो एक साथ सच हो नहीं सकते हें , उनमें से तो कोई एक ही सच होगा .
इस प्रकार इनमें से सच कोई भी हो पर अधिकतम लोग जो सत्य के अलावा अन्य धर्म को मानते हें वे तो गलत ही हुए न ?
यदि सभी लोग अपने वंश की परम्परा को ही निभायेंगे तो आप समझ ही सकते हें क़ि दुनिया के अधिकतम लोग तो गलत ही होंगे .
हमें यह देखना है क़ि कहीं हम भी तो उन्हीं अभागों में से ही एक तो नहीं हें ?
अरे भाई ! आज तू यहाँ है कल जाने कहाँ होगा , आज इस परम्परा को सच मानेगा इसका विकास और प्रचार करेगा और मरकर कल किसी और कुल में चला जाएगा , तब क्या होगा ?
क्या तब तू उसका उपासक नहीं हो जाएगा ,उसीको सच नहीं मानने लगेगा , क्या तब उसी का प्रचार नहीं करेगा ?
तो क्या तू बस इसलिए बना है , आज इसका और कल उसका ढिंढोरा पीटने के लिए। 
जब तू आज एक बात कहता है और कल उसी के विपरीत दूसरी , तब क्या तू खुद अपने कल के किये पर पानी नहीं फेरता है ?
अब इस बात का क्या भरोसा कि आज तू जिस बात को सच बतलाता है , कल उसी बात का फिर से खंडन नहीं करेगा ?
तो क्या इसी गोरख धंधे में उलझा रहेगा ?
क्या तुझे अपना कल्याण नहीं करना है ?
तब फिर क्यों नहीं सारे आग्रह और बंधन तोड़कर सत्य का निर्णय करता है ?
अपना हित इसी में है क़ि हम स्वयं सत्य का निर्णय करें , स्वीकार करें , क्योंकि यह अपने हित की बात है .

Monday, October 7, 2013

हमें धर्म से भी संसार ही चाहिए , हमें तो अमृत पीकर भी नशा ही चाहिए

कमाल हें हम !
हमें धर्म से भी संसार ही चाहिए 
हमें तो अमृत पीकर भी नशा ही चाहिए 
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

अरे ! हें न नशे की दुकानें , वहां जा न ? यदि नशा ही चाहिए तो। 

यदि संसार ही बढ़ाना है तो बिखरा तो पडा है , सराफ की दूकान में शराब क्या खोजता है ?

यदि तू संसार से उब गया हो , 
त्रस्त हुआ हो , 
अब तुझे कहीं और कोई आकर्षण न रहा हो , 
संसार में दुःख ही दुःख दिखाई देता हो , 
यदि तू अब सच्चे सुख की तलाश में हो , 
तो धर्म की शरण में आ !
तेरा कल्याण होगा 

Tuesday, July 23, 2013

क्या श्रृंगार का नाम भगवान् है ? भगवान् को श्रृंगार से क्या काम ? क्या भगवान को स्वयं भी अपना यह रूप पसंद है ? तू उस रूप पर मोहित होकर अपने आप को बड़ा भगत मानता है , क्या यह तेरा भ्रम नहीं है ?

हम अपने आप को धोखे में रखने में माहिर हें . 
हम भौतिक वस्तुओं पर रींझते हें और अपने आप को बड़ा भक्त मानते हें 

हम दर्शन करने जाते हें तो भगवान के श्रृंगार पर मोहित हो जाते हें . 
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

मैं पूंछता हूं कि आखिर श्रृंगार किसकी विशेषता है ?
भगवान की या श्रृंगार करने वाले पुजारी की ?
क्या श्रृंगार का नाम भगवान् है ?
भगवान् को श्रृंगार से क्या काम ?
क्या भगवान को स्वयं भी अपना यह रूप पसंद है ?
तू उस रूप पर मोहित होकर अपने आप को बड़ा भगत मानता है , क्या यह तेरा भ्रम नहीं है ?

हम मंदिर की सुन्दरता पर रींझते हें , वहां के वातावरण में रमते हें . 
क्या अच्छा लगता है हमें मंदिर में ?
क्या वहां की ध्वनि ? 
पूजा-पाठ और वाद्य और घंटों की आबाज ?
क्या वहां की गंध ? 
धूप , चन्दन और अगरवत्ती की खुशबू ?
क्या वहां के लोग ?
तरह-तरह से सज्जित होकर आये हुए लोग ?
वहां के बाग़ बगीचे ?
मंदिर का वास्तु ?

क्या अच्छा लगता है हमें ?
किस पर रींझते हें हम ?

क्या इन सब का नाम भगवान् की भक्ति है ?
क्या ये सब भगवान के गुण हें , जिन पर तू रींझा है ?

हम अपने आप को धोखे में रखने में माहिर हें . 
हम भौतिक वस्तुओं पर रींझते हें और अपने आप को बड़ा भक्त मानते हें 
हम पिकनिक पर मंदिर जाते हें फिर चाहते हें कि इस पर प्रसन्न होकर भगवान् दुनिया की सारी नियामतें हम पर लुटादें . 
क्या यह संभव है ?

Saturday, July 20, 2013

क्या कभी तूने अपने मनोभावों का विश्लेषण किया कि तू किस पर रींझ रहा है ?

अपने मन को टटोल कर देख लेना , मुझे गलत साबित नहीं कर पायेंगे .

क्या कभी तूने अपने मनोभावों का विश्लेषण किया कि तू किस पर रींझ रहा है ?
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 


जब कोई मधुर स्वरों में भगवान् की भक्ति करता है और तू भाव विभोर हो जाता है तब  क्या कभी तूने अपने मनोभावों का विश्लेषण किया कि तू किस पर रींझ रहा है ?
तू भगवान् के गुणों पर रींझ रहा है या ललित काव्य पर और या मधुर स्वरों पर .
मैं सच कहूं तो ९० प्रतिशत लोग मधुर स्वरों पर रींझ रहे होते हें और शेष १० % लोग ललित काव्य पर .
भगवान् के गुणों पर कोई नहीं रींझ रहा होता है .
अपने मन को टटोल कर देख लेना , मुझे गलत साबित नहीं कर पायेंगे .

Wednesday, July 10, 2013

हाँ ! यह अहंकार है , है !! और यही अहंकार ही धर्म है , धर्म अहंकार का ही नाम है . " मैं और सिर्फ मैं "

कोरी आदर्श की बातें धर्म नहीं हें , धर्म वास्तविकता है.
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

दुनिया में भी दो तरह की बातें होती हें , एक वे बातें जो कहने -सुनने में तो अच्छी लगती हें पर बस बातें होती हें " बातें हें बातों का क्या ? "
दूसरी तरह की बे बातें को किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए की जाती हें (discussion for execution ) . इस तरह की बातों में २+२ = ४ वाली भाषा में बातें होती हें , चिकनी - चुपड़ी , दिखावटी बातें नहीं .
अब दुनिया में कोई बहुत " मैं - मैं " करे तो उसे अहंकारी माना जाता है , और सुनने वाले को यह अच्छा भी नहीं लगता है , पर धर्म की तो शुरुवात ही "  मैं " से होती है और अंत भी " मैं " पर ही होता है . 
हाँ ! यह अहंकार है , है !! और यही अहंकार ही धर्म है , धर्म अहंकार का ही नाम है . " मैं और सिर्फ मैं "
धर्म का मार्ग संसार के मार्ग से अलग है , संसार से विपरीत है .
जो बातें संसार की चिकनी चुपड़ी भाषा में अच्छी लगती हें वे बातें धर्म के विपरीत बातें हें , वे बातें संसार बढाने वाली हें , वे कल्याणकारी बातें नहीं हें , वे पाखंड की बातें हें , सत्य और सच्चाई से परे .

Monday, September 19, 2011

(हमें उन जैसा बनना चाहिये था , हमने उन्हें अपने जैसा बना लिया

"जिनेन्द्र भगवान के दर्शन का उद्देश्य तो यह था क़ि हम अपने आप में जिनेन्द्र भगवान के रूप (स्वरुप, गुण ) की स्थापना करें , उसकी जगह हमने भगवान के ऊपर अपनी मलिन (मैली ) कल्पना थोपनी प्रारम्भ करदी .(हमें उन जैसा बनना चाहिये था , हमने उन्हें अपने जैसा बना लिया )जिनेन्द्र भगवान को हम जैसे जगत के लोगों की संगती का यह उपहार मिला है , इसीलिये मोक्ष मार्गी (आत्मार्थी) लोग घरबार छोड़कर जंगल को चले जाते हें .

Thursday, September 15, 2011

वीतरागता आये बगैर सर्वज्ञता आ जाना अभिशाप है वरदान नहीं

जिस तरह वीतरागता आये बगैर सर्वज्ञता आ जाना अभिशाप है वरदान नहीं उसी प्रकार चरित्र और नैतिकता के संस्कार जीवन में आये बगैर आर्थिक सम्पन्नता आ जाना अभिशाप है वरदान नहीं .