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Monday, September 28, 2015

क्षमावाणी : दश दिनों तक धर्म के दशलक्षणों की आराधना का प्रतिफल

धर्मके दशलक्षणों की आराधना का परिणाम -

क्षमावाणी -

इसी आलेख से -

- "क्षमा करने का तात्पर्य है भविष्य में दुष्कृत्य न करने का संकल्प और क्षमा मांगने का तात्पर्य है पूर्वकृत दुष्क्रत्यों के प्रति प्रायश्चित."

- "क्षमा करने से हम अपनी कषायों को क्रियान्वित (execute) करने के अनन्त भारसे मुक्त होकर हम निर्भार होजाते है और क्षमा मांगने से (मिलनेपर) हम सामने वाले की ओर से अपने अनिष्ट की आशंका का त्यागकर निर्भय हो जाते हें.
 उक्त दोनों ही परिणाम किसी और के नहीं स्वयं हमारे अपने हित में हें."









क्षमावाणी 

त्यागना  क्रोधादि  का  , नाम  है  उत्तमक्षमा 
धर्मकी आराधना का,परिणाम है उत्तमक्षमा 
धार मनमें बैर अरु ,क्रोधादिकर जगमें भ्रमा
निराकुल हुआ  मैं आज , धारउर  उत्तमक्षमा 

उपकार मेरा आत्मा पर, जगतके सबजीव पर 
क्रोधबैर परित्यागकर,समभाव चितमें धारकर 
क्षमा मैं करता सभीको, अपने लिए मांगूं क्षमा 
यह धर्मधारण स्वयं का, यह नहीं कोई याचना 




पदों का अर्थ -

क्रोधादि (क्रोध, मान , माया, लोभ) कषायों का त्याग करना उत्तम क्षमा धर्म है. यह धर्म की आराधना का स्वाभाविक परिणाम है. आजतक यह जीव उक्त कषायों के वशीभूत होकर संसार में भ्रमता रहा पर आज मैं अपने ह्रदय में उत्तमक्षमा धारण करके निराकुल हुआ हूँ.

आज मैं क्रोधादि कषायों का त्याग करके व अपने चित्त में समताभाव धारण करके सबके प्रति स्वयं क्षमाभाव धारण करता हूँ और सभी से क्षमायाचना करता हूँ. मेरा यह कृत्य मेरी अन्तरंग धर्मधारण की प्रक्रिया है जगत से कोई याचना नहीं है. 


क्षमा करने का तात्पर्य है भविष्य में दुष्कृत्य न करने का संकल्प और क्षमा मांगने का तात्पर्य है पूर्वकृत दुष्क्रत्यों के प्रति प्रायश्चित.

क्षमा करने से हम अपनी कषायों को क्रियान्वित (execute) करने के अनन्त भारसे मुक्त होकर हम निर्भार होजाते है और क्षमा मांगने से (मिलनेपर) हम सामने वाले की ओर से अपने अनिष्ट की आशंका का त्यागकर निर्भय हो जाते हें.
 उक्त दोनों ही परिणाम किसी और के नहीं स्वयं हमारे अपने हित में हें.

क्षमा करना और क्षमा मांगना कोई लेन-देन की क्रिया नहीं है, इसमें कई अलग-अलग लोग शामिल नहीं हें. 
यह आत्मा का धर्म है, धर्म स्वाधीन होता है इसमें किसीपर निर्भरता की आवश्यक्ता नहीं. धर्म की आराधना हमने की है, कषायों की मंदता हमें हुई है और इसलिये क्षमाभाव हमारे चित्त में प्रकट हुआ है, यदि कोई क्षमा न मांगे तो क्या हम क्षमा भाव धारण ही नहीं कर सकेंगे ? या कोई हमें क्षमा ही न करे तो क्या निजात्मतत्व का आश्रय हमें निर्भर करने में समर्थ नहीं होगा? 

Saturday, September 26, 2015

उत्तमब्रह्म्मचर्य धर्म

धर्म के दश लक्षणों में दशबां 

उत्तमब्रह्म्मचर्य धर्म - 

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -
"अरे भोले !
तुझे यह अहसास भी है क्या !कि जब ललचाई हुई, याचक की निगाहों से तू परकी ओर ताकता है तब सबसे बड़ा अपराध करता है.
बस ! यही तेरा वह अपराध है जिसके कारण तू संसार में भटक रहा है."










उत्तमब्रहम्मचर्य धर्म 

परिणति पर में भटकना ही,आत्मा का घात है 
अब्रह्म्म कहते हें इसेही,सबसे बड़ा यह पाप है 
पंचेन्द्रियों के  भोग  अरु ,  भोगने की  भावना
भटका रही संसार में, परद्रव्य की यह कामना  


सम्यक्त से आतमा को,परसे रहित पहिचानना
आतमा में रमण करना, बस उसे अपना मानना  
निज आत्मा में  रमण बस, धरम की है श्रेष्ठता 
है यही उत्तमब्रहम्मचर्य,ये धरम की पराकाष्ठा 

पदों के अर्थ -

परपदार्थों में परिणति का भटकना आत्मा के स्वभाव का घात है. यही व्यभिचार है और सबसे बड़ा पाप है.
परद्रव्यों को पाने और भोगने की कामना ही अनादिकाल से इस जीव को संसार में भटका रही है.

सम्यग्दर्शन पूर्वक आत्मा को परपदार्थों से प्रथक पहिचानकर, निज भगवान्आत्मा को ही "मैं " मानकर उसीमें लीन होना ही  उत्तमब्रहम्मचर्य धर्म है, ऐसा उत्तमब्रहम्मचर्य धर्म, धर्म की पराकाष्ठा है.



अरे भोले !
तुझे यह अहसास भी है क्या !कि जब ललचाई हुई, याचक की निगाहों से तू परकी ओर ताकता है तब सबसे बड़ा अपराध करता है.
बस ! यही तेरा वह अपराध है जिसके कारण तू संसार में भटक रहा है.
तेरी वही इन्द्रियाँ जिन्हें तू अपना मित्र और ज्ञान में सहायक मानता है, तेरे सबसे बड़े अपराध का उपकरण हें, क्योंकि उन्हीं की सहायता से तू पर में प्रवेश करता है.
इन्द्रियाँ मात्र रूपी परपदार्थों को अपने ज्ञान का बिषय बनाती हें, अपने अरूपी आत्मा को नहीं, इसीलिये इन्द्रियज्ञान तुच्छ है, हेय है.

याचनाभरी निगाहों से, परपदार्थों में सुख की कल्पना से पर की ओर ताकना ही व्यभिचारी वृत्ति है. 
अनादिकाल से उक्त वृत्ति ने ही आत्मा का घात किया है, संसार में भ्रमाया है.
अनन्तगुणों के स्वामी अपने निज भगवान्आत्मा के अनन्त वैभव को जानकार/पहिचानकर, अपनी वृत्तियों को निज में ही केन्द्रित करना उत्तमब्रहम्मचर्य धर्म है.
सम्यगचारित्र युक्त ऐसा उत्तमब्रहम्मचर्य धर्म सब धर्मों में श्रेष्ठ है, धर्म की पराकाष्ठा है.

जगत में मात्र स्पर्शइन्द्रिय के बिषय को ब्रहम्मचर्य का घातक माना जाता है पर यह सही नहीं है, क्योंकि मात्र स्पर्शइन्द्रिय का बिषय ही आत्मा के स्वरूप का घात नहीं करता है वरन सभी इन्द्रियाँ ही आत्माके उपयोग को बाहर भटकाती हें, उसके स्वरूप का घात करती हें.

चूंकि सभी इन्द्रियाँ स्पर्शनइन्द्रिय में शामिल हें इसीलिये स्पर्शनइन्द्रिय के बिषय को ब्रहम्मचर्य का घातक कहा गया है.


Friday, September 25, 2015

उत्तम आकिंचन्य धर्म

धर्म के दशलक्षणों में नवमां-

उत्तम आकिंचन्य धर्म -
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -

"परपदार्थों और उनके लक्ष्य से उत्पन्न होने वाले विकारों को पर जानकर उनसे विमुख होना ही उत्तमआकिंचन धर्म है.
पर पदार्थों के ग्रहण का नाम (उनके प्रति ममता व उनके ग्रहण का भाव) परिग्रह है और परिग्रह का त्याग करना आकिंचनधर्म है."






                               उत्तम आकिंचन्य धर्म                   


सर्व पर से विमुख होना, उत्तम अकिंचन  धर्म है 
परिग्रह का त्याग करना, उत्तम अकिंचन धर्म है 
सीमितरहे निजआत्म में,परका ग्रहण करता नहीं
परको न अपना मानना, उत्तम अकिंचन धर्म है 


आजतक यह आत्मा, बोझिल रहा परकी चाह से 
भटका किया अटका रहा, पर की सदा परवाह से 
वृत्तियाँ  परद्रव्य लक्षित, अंतर्परिग्रह   जानकार
द्रष्टि परसे हटा निजमें,थितरहे अकिंचनधर्मधर   


पदों का अर्थ -

परपदार्थों को अपना न मानना और पर स्वीकार कर, उनसे विमुख होकर, परिग्रह का त्याग करके निज में स्थित होना ही अकिंचन धर्म है.
आज तक यह आत्मा परपदार्थों की चाह में ही व्यस्त रहता आया है. परद्रव्य के लक्ष्य से उत्पन्न होने वाले विकारों को अन्तरंग परिग्रह जानकर पर से द्रष्टि हटाकर निज में स्थापित करना ही अकिंचन धर्म है.


परपदार्थों और उनके लक्ष्य से उत्पन्न होने वाले विकारों को पर जानकर उनसे विमुख होना ही उत्तमआकिंचन धर्म है.
पर पदार्थों के ग्रहण का नाम (उनके प्रति ममता व उनके ग्रहण का भाव) परिग्रह है और परिग्रह का त्याग करना आकिंचनधर्म है.

आत्मा में उत्पन्न होने वाले मोह, राग और द्वेष आदि भाव अन्तरंग परिग्रह हें और धन-संपत्ति आदि बाह्य सामग्री बाह्य परिग्रह हें.
परिग्रह के 24 भेद हें -

 14 प्रकार के अन्तरंग परिग्रह और 10 प्रकार के बहिरंग परिग्रह.

Thursday, September 24, 2015

उत्तम त्याग धर्म

धर्म के दशलक्षणों में आठबां - 

उत्तम त्याग धर्म  - 
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 


इसी आलेख से -
"दान को ही त्याग मानकर अपनेआपको धर्मात्मा मानने वाले दानवीरो जबाब दो!
अगर आपही उत्तम त्याग धर्म के धारी धर्मात्मा हें तो उन निर्ग्रन्थ वीतरागी संतों का क्या होगा जिनकेपास देने को कोई द्रव्य है ही नहीं?
तो क्या वे धर्मात्मा ही नहीं रहेंगे ?"






उत्तम त्याग धर्म 

परिपूर्ण हूँ मैं स्वयं में, पर का ग्रहण  करता नहीं 
पर हुआ न मेरा आजतक, स्वयं है परित्यक्त ही 
पर के ग्रहण की कामना,मेरी भूल है ये विकार है 
परसे प्रथक आत्मसन्मुख, जीव ही  अविकार है 


त्याग धरम है आत्मा का, वस्तु का विनिमय नहीं
परिणमन यह परिणति का,ना लेनदेन इसमें कहीं  
दान नहीं है त्याग क्योंकि, उसमें अनिच्छा है नहीं 
जो भोगता वह दान देता, अनिष्ट का हो त्याग ही 

पदों का भावार्थ -

मैं (आत्मा) अपनेआप में परिपूर्ण हूँ और पर का न तो ग्रहण करता हूँ और न ही त्याग.
परपदार्थ आजतक मेरा हुआ ही नहीं अत: स्वत: ही परित्यक्त है. मैंने अपने परिपूर्ण स्वभाव को भूलकर अनादिकाल से आजतक पर पदार्थों के ग्रहण की कामना की  यह मेरी भूल थी, आत्मा का विकार था. मैं यह आत्मा तो पर से प्रथक हूँ और आत्मसन्मुखता पूर्वक सदा अविकारी हूँ.

त्याग आत्मा का धर्म है, इसमें लेनदेन को कोई स्थान नहीं है, इसमें तो लेनदेन की व्रत्ति का त्याग है. 
लोक में प्राय: दान को त्याग मान लिया जाता है पर यह ठीक नहीं है क्योंकि जिस वस्तु का हम दान देते हें उस वस्तु के ग्रहण की हमें अनिक्षा नहीं है , हम उपयोगी जानकार वह वस्तु अन्य को भी देते हें और स्वयं भी ग्रहण करते हें , जबकि त्याग मात्र अनुपयोगी वस्तु का किया जाता है.




दान को ही त्याग मानकर अपनेआपको धर्मात्मा मानने वाले दानवीरो जबाब दो!
अगर आपही उत्तम त्याग धर्म के धारी धर्मात्मा हें तो उन निर्ग्रन्थ वीतरागी संतों का क्या होगा जिनकेपास देने को कोई द्रव्य है ही नहीं?
तो क्या वे धर्मात्मा ही नहीं रहेंगे ?
यदि आप दान देकर उत्तमत्याग धर्म के धारी धर्मात्मा होगये तो धर्म के अन्य लक्षणों का क्या होगा? धर्म के दश लक्षण तो एक साथ प्रकट होते हें.
क्या यह धन (लक्ष्मी)आपकी गुलाम है, आपकी आज्ञा में है? 
क्या यह आपकी आज्ञा से आती और जाती है?
यदि नहीं तो तू होता कौन है इसे किसी को देने वाला या इसे ग्रहण करने वाला?
एक बात और यदि धन दान देने वाला त्यागधर्म का धारी धर्मात्मा होगा तो लेने वाला क्या होगा?
एक तो चार प्रकार के दानों में धन दान नामका कोई दान है ही नहीं पर यदि इसे दान मान भी लिया जाए तो प्रश्न है धर्मात्मा कौन? 
देने वाला या लेने वाला?
अहारदान गृहस्थ देते हें और साधु ग्रहण करते हें, उनमें उत्तमत्याग धर्म का धारी धर्मात्मा कौन है?
साधु या गृहस्थ? 
अब भी क्या आपको लगता नहीं कि उत्तमत्याग धर्म का स्वरूप वह नहीं जो आप समझते हें, कुछ और है.

एक द्रव्य दुसरे द्रव्य का स्पर्श ही नहीं करता है तो ग्रहण और त्याग कैसे हो?
यदि किसी पर पुद्गल द्रव्य की यहाँ से वहां हेराफेरी को उत्तमत्याग धर्म माना जाएगा तो धर्म पराधीन हो जाएगा, क्योंकि फिरतो दान देने के लिए धन चाहिए, आहार और औषधि देने के लिए उनका संयोग आवश्यक है.
तो क्या धर्म पराधीन है? 
यदि धर्म ही पराधीन क्रिया होगी तो फिर धर्म के आश्रय से मुक्ति कैसे होगी?

प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है और कोई एक दुसरे को स्पर्श तक नहीं करता है. 

उक्त वस्तुस्वरूप को भूलकर यह आत्मा आनादिकाल से परपदार्थों के ग्रहण का राग करता रहा. और इस प्रकार धर्म से विमुख रहा.

तत्वज्ञान के अभ्यास से ज्ञानीजीव द्वारा पर के ग्रहण और त्याग दोनों ही विकल्पों को निरर्थक जानकार छोड़ना ही उत्तम त्याग धर्म है.

जगत में दान को ही त्याग समझ लिया जाता है.
दान और त्याग में मूलभूत अंतर यह है कि -

- त्याग धर्म है और दान पुण्य.

- त्याग मुक्ति का कारण है और दान (पुन्य) बंध का कारण. 

- दान उपयोगी व हितकारी वस्तु का किया जाता है अनुपयोगी व अहितकर वस्तु का नहीं. 
  त्याग के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है 

- दान पराधीन क्रिया है जिसमें तीन लोग शामिल हें- दाता, लेने वाला और वस्तु.
त्याग के लिए न तो लेने वाला चाहिए और न ही कोई वस्तु, त्याग तो ग्रहण के राग का किया जाता है, वह वस्तु हमारे पास होना आवश्यक नहीं  

- दान उपयुक्त पात्र  को ही दिया जाता है, त्याग के लिए पात्र की आवश्यक्ता नहीं.

- त्याग के बाद दाता उक्त (वैसी ही अन्य)वस्तु का ग्रहण नहीं करता है, दान में ऐसी कोई शर्त नहीं.

- दान मात्र उसी वस्तु का दिया जासकता है जो हमारे पास हो, त्याग के लिए यह शर्त नहीं.

- दान देने के बाद उसके सदुपयोग पर द्रष्टि रखना दाताका कर्तव्य है. 
त्याग के बाद वस्तु का विकल्प आना भी अनुचित है.

(उक्त सभी विचार डा. हुकमचन्द भारिल्ल द्वारा रचित पुस्तक "धर्म के दशलक्षण "के "उत्तमत्याग धर्म " नामक लेख से लिए गए हें.)

Wednesday, September 23, 2015

उत्तम तप धर्म

धर्म के दश लक्षणों में सातबां-

उत्तम तप धर्म  -

- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -

"अहो ! कैसी विचित्रता है ? 
कुछ करना नहीं है, अकर्तव्य का त्याग करना है. 
वस्तु का नहीं ग्रहण का त्याग करना है 
अनादिकाल से आत्मा ने जगत के परपदार्थों के ग्रहण का राग किया है, पर का ग्रहण तो होता ही नहीं है, होही नहीं सकता है.
जब ग्रहण हुआ ही नहीं तो त्याग किसका करें?
मात्र ग्रहण के राग का त्याग करना है, यही उत्तम तप नामक धर्म है."





                                                                उत्तम तप धर्म 

त्यागना  परवस्तु  का  राग , बस   यह   तप   कहा
ग्रहण तो किया कब था, सो कुछ नहीं करने को रहा 
त्याग करना  लालसा का , वा  आतमा  में  रमणता 
प्रतपन-विजयन स्वरूप में,जिनधर्म  में ये तप कहा


बिन सम्यक  तपाना देह को, आत्मा का  तप  नहीं
परिणमन तन का  देह में  है, पर देह तो  मेरी  नहीं 
सम्यक्त्व दर्शन ज्ञान पूर्वक , चारित्र ही है तप अहो 
चारित्र गुण है आतमा का, क्या देह का  इसमें कहो 

पदों का अर्थ -

आत्मा ने आनादिकाल से कभी परवस्तु का ग्रहण तो किया ही नहीं है, सिर्फ ग्रहण का राग करता है, उसी राग के त्याग का नाम तप है.
परके ग्रहण की इक्षा के त्यागपूर्वक आत्मा में लीनता अर्थात् निजस्वरूप में प्रतपन व विजयन ही तप है.
उत्तम तप आत्मा का धर्म है जोकि सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान पूर्वक ही होता है क्योंकि सम्यकचारित्र आत्मा का गुण है देह का नहीं. 


अहो ! कैसी विचित्रता है ? 
कुछ करना नहीं है, अकर्तव्य का त्याग करना है. 
वस्तु का नहीं ग्रहण का त्याग करना है 
अनादिकाल से आत्मा ने जगत के परपदार्थों के ग्रहण का राग किया है, पर का ग्रहण तो होता ही नहीं है, होही नहीं सकता है.
जब ग्रहण हुआ ही नहीं तो त्याग किसका करें?
मात्र ग्रहण के राग का त्याग करना है, यही उत्तम तप नामक धर्म है.

अन्य सभी धर्मों के ही सामान उत्तमत्याग धर्म भी सम्यग्दर्शनपूर्वक ही होता है क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना परपदार्थों से एकत्व-ममत्व बुद्धी छूटती ही नहीं है.

तप के दो प्रकार हें- 

- बाह्य तप 
  एवं 
- अन्तरंग तप  

बाह्य तप छह प्रकार के होते हें -

- अनशन 
- अवमौदर्य
- वृत्तिपरिसंख्यान 
- रसपरित्याग 
- विविक्तश्य्यासन 
   एवं 
- कायक्लेश 

अन्तरंग तप के भी छह प्रकार हें -

- प्रायश्चित 
- विनय
- वैयाव्रत 
- स्वाध्याय 
- व्युत्सर्ग 
   एवं 
- ध्यान 


  




Tuesday, September 22, 2015

उत्तम संयम धर्म

धर्म के दश लक्षणों में छठबां -

उत्तम संयम धर्म -

- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -

"अपनेआपमें सीमित रहना संयम है और बाहर भटकना असंयम, निजवैभव का उपभोग संयम है और याचक की निगाहों से परकी ओर ताकना असंयम."





उत्तम संयम धर्म 

पर से हटा उपयोग को, स्थापना  निज आत्म में 
बनना बनाना है  किसे, मैं हूँ स्वयं  परमात्म  मैं  
निजलीनता उपयोग की, संयम धरम है संयमन 
परसे प्रथक प्रत्येक द्रव, बस रहे निजमें ही मगन 


सम्यक्त्व सह उपयोग को, आत्मसन्मुख जो करे 
है संयमी  वह जीव जो, भाव आताप  वा  पीड़ा हरे 
पंचेन्द्रियों को  जीतकर  जो, महाव्रत  धारण  करे 
समिति पाले,कषाय निग्रह, त्रियोग को वशमें करे 

पदों का भावार्थ -
अपने उपयोग को परपदार्थों से हटाकर आत्मसन्मुख करना ही संयम है, उपयोग का संयमन ही संयम है. संसार का प्रत्येक द्रव्य स्वभाव से ही पर द्रव्यों से प्रथक है और निज में ही सीमित है, प्रत्येक द्रव्य की इस स्वतंत्रता और संप्रभुता की स्वीक्रति का नाम ही संयम है.
सम्यग्दर्शन पूर्वक पांच व्रतों का धारण करना, पांच समितियों का पालन करना,पांच कषायों को वश में करे और मन, वचन, काय इन तीन डंडों का त्याग करना संयम है. 


अपनेआपमें सीमित रहना संयम है और बाहर भटकना असंयम, निजवैभव का उपभोग संयम है और याचक की निगाहों से परकी ओर ताकना असंयम.  
अनादिकाल से यह आत्मा अपने स्वभाव की सम्पूर्णता और निज वैभव को भूलकर, सुख की खोज में याचक की आशाभरी निगाहों से मात्र परपदार्थों की ओर ताक रहा है. इस प्रकार अपनी सीमाओं का उलंघनकर असंयमी होरहा है. 
इस जीव की यह प्रवृत्ति, चौर्य वृत्ति है, स्व की संप्रभुता और अनन्त द्रव्यों की स्वतंत्रता का घात है, असंयम है, अधर्म है.
प्रत्येक द्रव्य की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए अपने वैभव को पहिचानकर अपने आत्मा में स्थित होना ही निश्चय से संयम है और सम्यग्दर्शन पूर्वक षटकाय के जीवों रक्षा का भाव और इन्द्रियों और मन को वश में करना व्यवहार संयम है 

Monday, September 21, 2015

उत्तम सत्य धर्म

धर्म के दश लक्षणों में पांचबां -

उत्तम सत्य धर्म -

- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -
- "लोग कहते हें कि आज जगत में असत्य का बोलवाला है, पर मुझे तो असत्य कहीं दिखाई ही नहीं देता है. जो दिखाई देता है वह तो है, उसकी तो सत्ता है फिर वह असत्य कैसे हुआ?"

- "असत्य की सत्ता अज्ञानियों के अज्ञान में व धूर्तों के असत्य वचनों में है."

- "वीतरागी संत सत्यमहाव्रत, भाषासमिति और वचनगुप्ती द्वारा स्व-पर के हित में अपने वचनों का सदुपयोग करते हें."







                                                                उत्तम सत्य धर्म  

है सत्य का ही बोलवाला , असत्य जग में कुछ नहीं 
है सत वही अस्तित्व जिसका, असत तो  है ही नहीं 
मैं छल ग्रहण कर जगत में,अस्तित्व ना स्वीकारता 
ये त्रिकाली ध्रुवतत्व आतम, तू स्वयं है क्या ना पता 

सत्ता जगत में आत्मा की , स्वीकारना ही सत्य है 
सार तो बस इक यही है , दिव्य्ध्वनी  का  कथ्य  है 
मैं  एक , शुद्ध , परिपूर्ण  हूँ ,  ज्ञान  वा  आनंद   से  
यही  हें  वे  सत्वचन  जो ,  ज्ञान  को  निर्मल  करे 


पदों का भावार्थ - 
अपने अस्तित्व गुण के कारण मैं स्वयं व प्रत्येक द्रव्य सुरक्षित है, वह नतो कभी उत्पन्न होता है और न ही नष्ट ही. बस इसीलिये जगत में जो कुछ है वह सत्य ही तो है, जो नहीं है (असत्य) उसकी तो सत्ता ही नहीं है.
वस्तुस्वरूप के प्रति, अस्तित्व गुण के प्रति और स्वयं अपनी आत्मा के प्रति यह हमारा छल ही है कि हम अपनी ही सत्ता से ही इन्कार करते हें.
अपने त्रिकालीध्रुव भगवान् आत्मा की सत्ता को स्वीकार करना ही सत्य धर्म है.  


लोग कहते हें कि आज जगत में असत्य का बोलवाला है, पर मुझे तो असत्य कहीं दिखाई ही नहीं देता है. जो दिखाई देता है वह तो है, उसकी तो सत्ता है फिर वह असत्य कैसे हुआ?  

फिर भी यदि हमें यही आग्रह हो कि नहीं असत्य तो चाहिए, उसके बगैर तो हमारा काम ही नहीं चल सकता है, तो ठीक है हम मान लेते हें, असत्य की सत्ता अज्ञानियों के अज्ञान में व धूर्तों के असत्य वचनों में है.
जिस प्रकार जगत में यूं तो गधे के सर पर सींग की सत्ता है नहीं, पर हाँ! कोई ऐसा अज्ञानी हो सकता है जो यह कल्पना करता हो, ऐसा मानता हो.

सामान्यत: लोग सत्य वचन को ही सत्य धर्म मान बैठते हें. 
ठीक भी है, उतम सत्य धर्म के धारी तीन कषाय के अभावरूप वीतरागता के धारक ,निर्ग्रथ संतों के सत्य बचन भी व्यवहार से सत्य धर्म कहे जाते हें.
उक्त वीतरागी संत सत्यमहाव्रत, भाषासमिति और वचनगुप्ती द्वारा स्व-पर के हित में अपने वचनों का सदुपयोग करते हें.   

Sunday, September 20, 2015

उत्तम शौच धर्म

धर्म के दशलक्षणों में चतुर्थ -

उत्तम शौच धर्म -

- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -
- "केवली भगवान् उत्तमशौच धर्म के धारी हें, हालांकि उनके अशुचि तन (अपवित्र  शरीर) का संयोग अभी भी विद्यमान है, यह तथ्य इस बातको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि हलांकि शारीरिक शुद्धी को भी व्यवहार से भले ही शौचधर्म कह दिया गया हो पर उत्तम शौच धर्म से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है."





                                                                उत्तम शौच धर्म 

यह आत्मा परिपूर्ण है, स्थित रहे निज भाव में 
ग्रहण-त्याग कुछभी नहीं, निजात्म  स्वभाव में 
परके ग्रहण की कामना ही,लोभरूप विकार है
जिसे नहीं कुछ चाहिए, वह आत्मा अविकार है  

संयोग सब अशुचि हें,  है शुद्धता निज भाव  में 
पर्याय भी वह शुद्ध है,जो लीन आत्मस्वभाव में 
निजभाव को  जो छोड़ता, भ्रमें  बांधत  कर्म है 
सम्यक्त्वसह नि:रागता,  शौच नामक धर्म  है  

पदों का भावार्थ -

आत्मा अपनेआप में परिपूर्ण है और अपने निजस्वभाव में ही स्थित रहता है. परसे कुछ भी ग्रहण करना या अपना कुछ भी त्यागदेना आत्मा का स्वभाव नहीं है.
परसे कुछ भी ग्रहण करने की भावना लोभ कषाय है, विकार है, जिसे इस प्रकार का लोभ नहीं है वह आत्मा निर्विकार है.
संयोग अशुचि (अशुद्ध) हें क्योंकि वे स्वभाव में विकार उत्पन्न करते हें व स्वभाव परमपवित्र है.
जो पर्याय शुद्ध द्रव्य का आश्रय लेती है वह पर्याय भी शुद्धता को प्राप्त होती है.
यह जीव अपने स्वभाव से विमुख होकर कर्म बांधता है संसार में भ्रमण करता है व सम्यग्दर्शन पूर्वक उत्पन्न वीतरागता ही शौच नामक धर्म है.


जगत के समस्त द्रव्य अपनेआप में परिपूर्ण हें, किसी में ऐसी कोई कमी नहीं है कि उसे कुछ भी पाने के लिए किसी की ओर देखना पड़े. अपने ऐसे परिपूर्ण, शौचस्वभाव के आश्रय से आत्मा में प्रकट होने वाली लोभान्त कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) के अभावरूप वीतराग परिणति (शुद्धी) उतम शौच धर्म है.
अनादिकाल से अपने परिपूर्णस्वरूप को भूला हुआ यह आत्मा, अपनी लोभवृत्ति के कारण भिक्षुक बनकर परकी और आशा भरी निगाहों से ताकता है, इस प्रकार मोह, राग-द्वेष रूप परिणमित होकर अपने परिपूर्ण शुद्ध स्वभाव का घात करता हुआ, विकार रूप परिणमन कर अशुचिता को धारण करता है.
तेरहबें गुणस्थानवर्ती केवली भगवान् उत्तमशौच धर्म के धारी हें, हालांकि उनके अशुचि तन (अपवित्र  शरीर) का संयोग अभी भी विद्यमान है, यह तथ्य इस बातको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि हलांकि शारीरिक शुद्धी को भी व्यवहार से भले ही शौचधर्म कह दिया गया हो पर उत्तम शौच धर्म से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है.

Saturday, September 19, 2015

उत्तम आर्जव धर्म -

धर्म के दश लक्षणों में त्रतीय -

उत्तम आर्जव धर्म -

इसी आलेख से -
- "अरे भोले ! अपने स्वभाव की वक्रता से तूने आजतक स्वयं अपनेआप को ही छला है किसी अन्य को नहीं.
तूने यह क्या किया?
अपनेआपको पहिचानने से ही इन्कार दिया? स्वयं अपनी सत्ता से ही इन्कार कर दिया?
अरे नादान ! तू अपनी यह धूर्तता कब छोड़ेगा?"

- "सरलता का नाम आर्जव धर्म है, सरलता यानि वक्रता, छल-कपट का अभाव.
यह जीव स्वयं अपनी ही सत्ता से इन्कार करता है, यही इसका सबसे बड़ा मायाचार है.
अनन्त गुणों के स्वामी, अनादि-अनन्त आत्मा (स्वयं) की स्वीकृति ही उतमआर्जव धर्म है."












उत्तम आर्जव 

है स्वयं तूही आत्मा, पर आतम तुझे दिखता नहीं 
इस आत्मा को आत्मा का, जिक्र तक रुचता नहीं
सबसे बड़ा  मायाचार तेरा, है यही तेरी  विफलता 
यह वक्रता  है वृत्ति की, इसकी  विरोधी  सरलता 

आर्जव स्वभावी आत्माका, जो जीव अवलंबन करे
तज  क्रोधादि  कषाय  पुंज,  सरलता  को  जो  वरे
परद्रव्य से निर्लिप्त आतम, द्रव्य का  आश्रय  करे 
कुछ काल में  संसार तज, मुक्तीरमा  को  वह  वरे 

पद का भावार्थ -
तू  स्वयं ही आत्मा है और कहता है कि तुझे आत्मा तो दिखता ही नहीं. इस आत्मा को आत्मा की चर्चा तक नहीं सुहाती है यही इसका मायाचार है, यही इसकी व्रत्ति की वक्रता है, यही इसकी आत्मा को पहिचानने में असफलता है और इसके विपरीत सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म है.

जो जीव उक्त मायाचार का त्यागकर, पर द्रव्यों से प्रथक आर्जव स्वभावी निज आत्मा का आश्रय लेता है वह अल्पकाल में ही मुक्ति वधु का वरण करता है. 

अरे भोले ! अपने स्वभाव की वक्रता से तूने आजतक स्वयं अपनेआप को ही छला है किसी अन्य को नहीं.

तूने यह क्या किया?
अपनेआपको पहिचानने से ही इन्कार दिया? स्वयं अपनी सत्ता से ही इन्कार कर दिया?

अरे नादान ! तू अपनी यह धूर्तता कब छोड़ेगा? 

हे आर्जव स्वभावी आत्मन ! तू कब अपने इस आर्जव स्वभाव भाव में अवतरित होगा?

कपटी की कपट वृत्ति अपने और पराये का भेद नहीं करती है, वह तो स्वयं अपने को और अन्यों को, दोनों को ही अपना निशाना बनाती है, अन्य तो अपने जाग्रत विवेक का उपयोग करके बचजाते हें, पर यह स्वयं हे अपनी चपेट में आजाता है.

छलिया सबसे पहिले और सबसे अधिक अपनेआप को छलता है, यह मानकर कि दुनिया उसके छलावे में आगई अन्यथा दुनिया तो अपने निर्णय अपने विवेक से करती है, किसी के बहकावे में आकर नहीं. 

हाँ ! लोग ऐसा अभिनय करके उस छलिया को अवश्य छल लेते हें, मानो वे उसके बहकावे में आगये हों.

सरलता का नाम आर्जव धर्म है, सरलता यानि वक्रता, छल-कपट का अभाव.

यह जीव स्वयं अपनी ही सत्ता से इन्कार करता है, यही इसका सबसे बड़ा मायाचार है.

अनन्त गुणों के स्वामी, अनादि-अनन्त आत्मा (स्वयं) की स्वीकृति ही उतमआर्जव धर्म है.

अनादिकाल से इस आत्मा ने स्वयं के साथ ही छल किया है, यह कहता है कि आत्मा दिखाई तो देता नहीं, हम कैसे मानें कि आत्मा है और अनन्तकाल तक रहेगा भी. बस इसीलिये यह जीव आजतक संसार में भटक रहा है. 

एक साहित्यकार ने लिखा है - "कैसा गजब होगया है कि खोजने वाला खोगया है, खोजने वाला, खोजने वाले को खोज रहा है पर खोजने वाले को खोजने वाला नहीं मिल रहा है."


जिसदिन यह जीव अपने स्वरूप को पहिचानकर स्वीकार कर लेगा उसीदिन आर्जवधर्म का धारी हो जायेगा.


उक्त के अतिरिक्त अपने दिन-प्रतिदिन के व्यवहार में कियाजाने वाला कपटपूर्ण व्यवहार भी आर्जवधर्म की विरोधी मायाकषाय है ही.


कल पढ़िए उत्तमशौच धर्म -

Friday, September 18, 2015

धर्म के दशलक्षणों में द्वितीय - उत्तम मार्दव धर्म -

धर्म के दशलक्षणों में द्वितीय -
उत्तम मार्दव धर्म -

इसी आलेख से -

- "अपने उक्त परिपूर्ण स्वभाव को भूलकर यह जीव हीनता और उच्चता की भावना (जिसे मान कषाय कहते हें)से ग्रस्त होकर पीड़ित होता है,  
मान कषाय से पीड़ित यह जीव जलबिन मछली के सामान तडपता है, वेचैन और व्याकुल होता है.
मान कषाय के अभावरूप यह मार्दवधर्म इस जीव को उस पीड़ा से मुक्त करने का सरलतम और एकमात्र उपाय है.
              



                       
 उत्तम मार्दव धर्म


                 पर द्रव्य के संयोग से, खुदको बड़ा-छोटा मानना  
                 बड़प्पन की हो  या हो चाहे,  हीनता  की  भावना
                 ना  आत्मा  को  जानना, परिपूर्णता  पहिचानना
                 है मान कषाय यहही, मार्दव धर्म की अवमानना   

  है अनंत गुण पर्यायवाला ,  आत्मा   यह  जानना 
 परिपूर्ण है वहतो स्वयं में, छोटा - बड़ा ना मानना 
 मार्दवस्वभावी आत्मा का, जो जीव अवलंबन करें 
वे  धनी  मार्दव  धर्म  के, मुक्ती  रमा  को  वे  वरें


पदों का भावार्थ -
अपने मार्दवस्वभावी, परिपूर्ण आत्मा को भूलकर परद्रव्यों के संयोग से अपने को बड़ा या छोटा मानना माँ कषाय है.
जो जीव अपने आत्मा के अनन्तगुण व पर्यायों का स्वरूप समझकर उसे अपनेआप में परिपूर्ण मानता व अनुभव करता है वह मार्दवधर्म का धारी होता है और मुक्तिवधु का वरण करता है.

क्षमा के सामान ही मार्दव भी आत्मा का धर्म है.

जगत के प्रत्येक द्रव्य के ही सामान हमारा यह आत्मा अनन्तगुणों का स्वामी व अपने आप में परिपूर्ण है, इसके पास अतितिक्त कुछ भी नहीं कि किसीको कुछ दे सके और न ही कोई कमी है कि किसी से कुछ ग्रहण करे.

अपने उक्त परिपूर्ण स्वभाव को भूलकर यह जीव हीनता और उच्चता की भावना (जिसे मान कषाय कहते हें )से ग्रस्त होकर पीड़ित होता है,  

मान कषाय से पीड़ित यह जीव जलबिन मछली के सामान तडपता है, वेचैन और व्याकुल होता है.
मान कषाय के अभावरूप यह मार्दवधर्म इस जीव को उस पीड़ा से मुक्त करने का सरलतम और एकमात्र उपाय है.

यूं तो जगत का प्रत्येक जीव अपने अनंतगुणों की संपदा से सम्पन्न स्वयं ही सम्मानित है, कौन इसका अपमान कर सकता है और कौन इसका मानभंग करे ? पर अपने इस मार्दवस्वभावी वैभव को भूलकर जब-जब यह पर की ओर देखता है तो अपमान का अनुभव करता है. 


कभी यह हीनता की भावना (inferiority complex)से ग्रस्त होकर अपनेआपको दीनहीन अनुभव करता है और कभी उच्चता की भावना (superiority complex) से ग्रस्त होकर दूसरों को दीनहीन मान बैठता है.

भावना चाहे हीनता की हो या उच्चता की, स्वाभाविक वृत्तियाँ (complex free) दोनों ही नहीं हें. दोनों ही अस्वाभाविकताएं (complex) हें, दोनों ही विकृतियाँ हें, दोनों ही पीडादायक हें.

दोनों ही भावनाओं से प्रेरित होकर यह जीव अन्य लोगों को अपने अनुरूप परिणमाना चाहता है,उनसें सम्मान पाना चाहता है, जो संभव नहीं है, तब यह दुखी होता है.


मार्दवस्वभावी आत्मा का आश्रय लेकर यह जीव मान-अपमान की पीड़ा से मुक्त होजाता है.


आइये हम सभी इस महान मार्दवधर्म को धारण कर परम सुखी हों .


कल पढ़िए आर्जव धर्म के बारे में -

Wednesday, September 16, 2015

धर्माराधना के पर्व दशलक्षण महापर्व - उत्तम क्षमा धर्म


धर्म के दशलक्षणों में प्रथम -
 (1) उत्तम क्षमा धर्म -

इसी आलेख से -

- "अन्य को क्षमा करके हम निर्भार होजाते हें और क्षमा मांगकर निर्भय"

- "क्षमा के अभावरूप क्रोध और बैर किसी अन्य को नहीं वरन हमें ही अशांत करता है, हमें ही जलाता और तड़पाता है.
जिस प्रकार जलते हुए कोयले किसी को तपायें या न तपायें स्वयं तो जलकर राख हो ही जाते हें."






                                                                          उत्तम क्षमा 

निज   आत्मा   को   भूल   जाना   क्रोध    है
अन्य    को    ना    भूल    पाना    क्रोध    है
स्वतंत्र हें सब द्रव्य जग में,अन्य के कर्ता नहीं
किसी को  भी  अन्य का कर्ता बताना क्रोध है 

द्रष्टि को पर से हटा, स्थापना निज आत्म में 
अनंत गुण पर्याय वाला, स्वयं ही परमात्म मैं 
मैं नहीं कर्ता किसी का, ना किसी का कर्म मैं 
जानकर निर्लिप्त होना, उत्तम क्षमा है धर्म है 


पद्यों का भावार्थ -
अनादिकाल से हमने अपने आत्मा की सुध नहीं ली यही हमारा आत्मा (अपने आप ) के प्रति अनन्तानुबन्धी क्रोध है.
हम परपर्दार्थों को अपना कर्ता (अनिष्ट कर्ता) मानते रहे और इसलिये उनपर क्रोध करते रहे, उन्हें भूल नहीं सके, उनसे बदला लेने का संकल्प करते रहे, उनके प्रति हमारी यही कर्ता बुद्धी उनकी स्वतंत्रता का घात है और हमारा अनन्तानुबन्धी क्रोध है.
अनन्त गुणों के स्वामी इस आत्मा का  (अपना ) अकर्ता स्वभाव पहिचानकर परपर्दार्थों से निरपेक्ष हो जाना, उनसे अलिप्त होजाना उतमक्षमा धर्म है.



क्षमा आत्मा का (हमारा ) धर्म है, यह हमारे लिए है, क्षमा को अपनाकर, धारणकर हम स्वयं सुखी होते हें.
अन्य को क्षमा करके हम निर्भार होजाते हें और क्षमा मांगकर निर्भय.
सबको क्षमा करदेने से हम बदला लेने के भार से मुक्त होकर निर्भार होजाते हें, तत्संबंधी आकुलता से बच जाते हें.
सबसे क्षमा मांगने /पा लेने से शत्रु /शत्रुता खत्म हो जाती है, कोई शत्रु न रहने से हम निर्भय हो जाते हें.
क्षमा के अभावरूप क्रोध और बैर किसी अन्य को नहीं वरन हमें ही अशांत करता है, हमें ही जलाता और तड़पाता है.
जिस प्रकार जलते हुए कोयले किसी को तपायें या न तपायें स्वयं तो जलकर राख हो ही जाते हें. 
हमारी कषाय या हम स्वयं किसी अन्य का तो कुछ बिगाड़ ही नहीं सकते हें, कुछ भी भला या बुरा कर ही नहीं सकते हें. उसका भला या बुरा होना तो उसके कर्म के उदय के आधीन है.
यदि उसके शुभकर्मों का उदय हो तो हम उसका बुरा कैसे कर सकते हें? यदि हम ऐसा कर पाए तो उसके शुभकर्मों का क्या होगा ?
क्या उसके कृत्य निष्फल नहीं हो जायेंगे ?
यदि ऐसा हो सके तो क्या यह वस्तुस्वभाव के विरुद्ध नहीं होगा ?
क्या वस्तुस्वभाव में ऐसी अनीति संभव है ?
नहीं ! कदापि नहीं !!
इस प्रकार हम पाते हें कि क्षमा धारण करना स्वयं हमारे लिए हितकर एवं सुखकर है. यह हमारे ह्रदय में धधक रही क्रोध की ज्वाला को शांतकर हमें ही उसके आताप (तपन)से बचायेगी .
हमारा क्षमा धारण करना, किसी अन्य के ऊपर हमारा अहसान या उपकार नहीं है.
तब क्यों नहीं हम सभी क्षमा धारण करें ?
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इस सम्बन्ध में अधिक विस्तार के लिए लेखक का निम्नलिखित लेख पढने चाहिए -


क्षमा मांगने से तो आप मार्दव धर्म के धारी धर्मात्मा बन जाते हें ,और धर्म में शर्म कैसी ?


उक्त लेख पढने के लिए निम्नलिखित लिंक पर क्लिक करें -

http://parmatmprakashbharill.blogspot.in/2011/12/blog-post_3677.html