Sunday, September 20, 2015

उत्तम शौच धर्म

धर्म के दशलक्षणों में चतुर्थ -

उत्तम शौच धर्म -

- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -
- "केवली भगवान् उत्तमशौच धर्म के धारी हें, हालांकि उनके अशुचि तन  ((अपवित्र  शरीर) का संयोग अभी भी विद्यमान है, यह तथ्य इस बातको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि हलांकि शारीरिक शुद्धी को भी व्यवहार से भले ही शौचधर्म कह दिया गया हो पर उत्तम शौच धर्म से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है."





                                                                उत्तम शौच धर्म 

यह आत्मा परिपूर्ण है, स्थित रहे निज भाव में 
ग्रहण-त्याग कुछभी नहीं, निजात्म  स्वभाव में 
परके ग्रहण की कामना ही, लोभरूप  विकार है
जिसे नहीं कुछ चाहिए, वह आत्मा अविकार है  

संयोग सब अशुचि हें,  है शुद्धता निज भाव  में 
पर्याय भी वह शुद्ध है,जो लीन आत्मस्वभाव में 
निजभाव को  जो छोड़ता, भ्रमें  बांधत  कर्म है 
सम्यक्त्वसह नि:रागता,  शौच नामक धर्म  है  

पदों का भावार्थ -

आत्मा अपनेआप में परिपूर्ण है और अपने निजस्वभाव में ही स्थित रहता है. परसे कुछ भी ग्रहण करना या अपना कुछ भी त्यागदेना आत्मा का स्वभाव नहीं है.
परसे कुछ भी ग्रहण करने की भावना लोभ कषाय है, विकार है, जिसे इस प्रकार का लोभ नहीं है वह आत्मा निर्विकार है.
संयोग अशुचि (अशुद्ध) हें क्योंकि वे स्वभाव में विकार उत्पन्न करते हें व स्वभाव परमपवित्र है.
जो पर्याय शुद्ध द्रव्य का आश्रय लेती है वह पर्याय भी शुद्धता को प्राप्त होती है.
यह जीव अपने स्वभाव से विमुख होकर कर्म बांधता है संसार में भ्रमण करता है व सम्यग्दर्शन पूर्वक उत्पन्न वीतरागता ही शौच नामक धर्म है.


जगत के समस्त द्रव्य अपनेआप में परिपूर्ण हें, किसी में ऐसी कोई कमी नहीं है कि उसे कुछ भी पाने के लिए किसी की ओर देखना पड़े. अपने ऐसे परिपूर्ण, शौचस्वभाव के आश्रय से आत्मा में प्रकट होने वाली लोभान्त कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) के अभावरूप वीतराग परिणति (शुद्धी) उतम शौच धर्म है.
अनादिकाल से अपने परिपूर्णस्वरूप को भूला हुआ यह आत्मा, अपनी लोभवृत्ति के कारण भिक्षुक बनकर परकी और आशा भरी निगाहों से ताकता है, इस प्रकार मोह, राग-द्वेष रूप परिणमित होकर अपने परिपूर्ण शुद्ध स्वभाव का घात करता हुआ, विकार रूप परिणमन कर अशुचिता को धारण करता है.
तेरहबें गुणस्थानवर्ती केवली भगवान् उत्तमशौच धर्म के धारी हें, हालांकि उनके अशुचि तन (अपवित्र  शरीर) का संयोग अभी भी विद्यमान है, यह तथ्य इस बातको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि हलांकि शारीरिक शुद्धी को भी व्यवहार से भले ही शौचधर्म कह दिया गया हो पर उत्तम शौच धर्म से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है.

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