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Thursday, August 20, 2015

"क्या अपने ऐसे ही होते हें?“ - (एक लघु कथा) - "____मैं अपनी सफाई पेश करके पाता भी क्या, आपतो मुझे पहिले ही अपराधी मान ही चुके होते थे. ----"

इसी कहानी में से -
- "आप गलत हो भी कैसे सकते हें, आपतो राजा हें, आपतो जो फरमाएंगे वही क़ानून बन जाएगा, फिर  अपराधी तो बो कहलायेंगे जो आपके बनाए क़ानून का उलंघन करेंगे."

- "शत्रु भी इससे भिन्न और क्या जुल्म कर सकते हें? तब फिर संरक्षक और शत्रु में फर्क ही क्या रहा?"
- “माता मारे आपनी, बाप बेचके खाये
  राजा मारे देशका,कहन कौनसौं जाये”

“क्या अपने ऐसे ही होते हें?“ - (एक लघु कथा)

-  परमात्म प्रकाश भारिल्ल






सत्य ही तो फरमाया आपने, भला आप गलत होते ही कब हें?
आप गलत हो भी कैसे सकते हें, आपतो राजा हें, आपतो जो फरमाएंगे वही क़ानून बन जाएगा, फिर  अपराधी तो बो कहलायेंगे जो आपके बनाए क़ानून का उलंघन करेंगे.
हाँ! सच कहा आपने!
मैंने अपनी सफाई क्यों पेश नहीं की?
हुजूर को शायद अहसास ही नहीं है कि हुजूर ने सफाई माँगी ही कब?
सफाई पेश करने का मौक़ा ही कब दिया?
मुझे आरोपपत्र सुनाया ही कब गया हुजूर!
आपको आरोपपत्र सुनाने और सफाई मांगने की आवश्यक्ता भी तो नहीं पडी न!
शायद आप यही मान बैठे कि – “वो जो आकर कान में कह जाते हें, वे कोई झूंठ थोडे ही बोलते होंगे, वे भी तो भले आदमी लगते हें, भोले भी दिखते हें.”
मुझे मालूम है कि आपको सोचने-समझने में समय बर्बाद करना विल्कुल पसंद नहीं है.
और यह गवाही-सफाई, ये तो आपको राजनीति सी लगती है, जो आपको विल्कुल पसंद नहीं, घ्रणा करते हें आप राजनीति से तो.
हाँ! वे पडौस वाले छब्बेजी जो कान में कानाफूसी कर जाते हें, वे कोई राजनीति थोड़े ही करते हें, वे तो जनेऊधारी धर्मात्मा हें भाई!
अपने बचपन की वे घटनाएं मैं अभी भूला नहीं हूँ कि किस तरह आप घर में प्रवेश करते ही मेरे ऊपर तडातड़ लात-घूसों की बरसात कर देते थे, क्योंकि घर के दरबाजे पर ही वो पडौस वाले “सत्यवादी हरिश्चन्द्र के अवतार” छब्बेजी आपके समक्ष मेरा दिनभर का आरोपपत्र पेश कर चुके होते थे; और तब भी मेरी सफाई पूंछने की कोई आवश्यक्ता ही नहीं समझी जाती थी.
समझी भी क्यों जाती? 
आखिर मैं आपका ही तो बेटा हूँ, और आप क्या मुझे जानते नहीं कि "यदि कोई कह रहा है कि मैंने अपराध किया है तो अवश्य ही मैंने ऐसा किया ही होगा. गवाही–सफाई की जरूरत तो उसे पड़े जो जानता-पहिचानता न हो." 
ऐसा भी नहीं है कि छब्बेजी की कोई बात आजतक गलत साबित ही न हुई हो, पर इससे क्या? कभी-कभी तो गल्ती सभीसे हो जाती है. वे भी तो आखिर इंसान ही तो हें, कोई भगवान् के अवतार तो हें नहीं, पर भला वो झूंठ क्यों बोलेंगे?
आपने इस तथ्य की ओर तो कभी गौर ही नहीं किया कि छ्ब्बेकी का व्यक्तित्व कैसा है, मुहल्ले में उनकी छवि कैसी है, और वे जहां भी जाते हें वहां मात्र तोड़फोड़ और उपद्रव ही करके लौटते हें.
मैंने जब भी मुंह खोलने की कोशिश की, मेरी हर बात में आपको राजनीति की ही गंध आती रही, मेरी बात सुनने का धैर्य तो आपमें कभी था ही नहीं. 
पर इसमें आपका क्या दोष? यहतो आपके रघुकुल की रीत है, किसीने भी, किसीकी भी, कोईभी बात सुनी ही कब?
मैं अपनी सफाई पेश करके पाता भी क्या, आपतो मुझे पहिले ही अपराधी मान ही चुके होते थे. 
अब तो मैं जितना ही बोलने की कोशिश करता, उतनी ही अधिक मार खाता.
उस पर तुर्रा यह कि –
“मैं कोई पराया थोड़े ही हूँ, तुम्हारा अपना हूँ, शुभचिंतक हूँ, कोई दुश्मन नहीं. मैं जो भी करता हूँ वह तेरी भलाई के लिए ही तो करता हूँ, वरना किसे अपने ही बच्चों की पिटाई करने में मजा आता है. 
वो पडौसवाले छब्बेजी कोई मेरे सगे नहीं हें कि मैं उनका पक्षलूं.”
न सही, आपमें इतना धैर्य नहीं था कि मुझसे कैफियत-तलब करते पर आप मेरे व्यक्तित्व और वृत्तिओं से तो परिचित थे ही न, आप इतना तो जानते ही थे न कि मैं आपकी ही तरह आपका ही वह बेटा हूँ जिसे अन्याय-अनीति वर्दाश्त ही नहीं, तब आप यह कल्पना ही कैसे कर पाए कि मैं ऐसा कुछ करभी सकता हूँ ?
न सिर्फ मेरी जबान ही पर मेरा व्यक्तित्व, मेरा आपसे रिश्ता और आपका मेरे प्रति वात्सल्य भी मेरे पक्ष में गबाही न दे सका, मुझे संरक्षण नहीं दे सका, मुझे immunity प्रदान नहीं कर सका.
जब सिर्फ आपही मेरे सबकुछ थे, मुझे आपकी, आपके स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन की और आपके संरक्षण की सबसे अधिक आवश्यक्ता थी, तब मुझे आपसे यह मिला.
गल्तियाँ मुझसे भी हुई हें, सभी गल्तियाँ करके ही तो सीखते हें न, पर एक गल्ती के परिपेक्ष्य में मुझे सदा के लिए गलत ही मान लेना क्या आपकी महान गल्ती नहीं है? क्या कोई अपने ही बालकों की गल्तियों पर ऐसे ही व्यवहार करता है?
शत्रु भी इससे भिन्न और क्या जुल्म कर सकते हें?
तब फिर संरक्षक और शत्रु में फर्क ही क्या रहा?
सारी दुनियाँ कहती रही कि-
“इतनी बड़ी दुनियाँ में सिर्फ आपही मेरे अपने थे” मैं भी ऐसा ही मानता रहा और मेरी नजर में अपनों की कुछ ऐसी ही तस्वीर बन पडी है, मैं अबतक “अपनों” की यही परिभाषा जान/समझ पाया हूँ जैसे आप हें.
अब आप ही एक बार बतलाओ न, please-
“क्या अपने ऐसे ही होते हें ?“
आखिर मैं भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि –

“माता मारे आपनी, बाप बेचके खाये
राजा मारे देशका,कहन कौनसौं जाये”


"आखिर तो भवितव्य ही वलवान है” 

Saturday, December 17, 2011

एक दिन तो यह होना ही था (कहानी)


एक दिन तो यह होना ही था 
(कहानी)

सुना तुमने !
मैं कहता नहीं था , एक दिन तो ये होना ही था . 
आखिर कितने दिन तक चल सकता है ये सब , ताश के महल टिकते थोड़ी हें , हवा का एक झोंका आया और --------------
चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात .
पता नहीं लोग ऐसा करते क्यों हें , आखिर क्या मिलता है इससे ?
न चैन न शुकून , न नाम न यश .
बस थोड़े दिन की जाहो जलाली , थोड़े दिन की वाह वाह ; पर अब क्या ? 
सारी दुनिया थू थू कर रही है .
कल तक जो लोग आगे पीछे घूमते थे वही आज पीछे पड़े हें , कोई गालियाँ बक रहा है , कोई मरने मारने पर उतारू है .
तब समझ में नहीं आती थी , तब तो बस अंधे हुए जा रहे थे , तब तो बस वो ही वो दिखाई देता था , दूसरे तो सब मूरख लगते थे , अब मालूम पडा मूरख कौन था , तुम या हम .
पर एक बात है , शराफत का ज़माना ही नहीं है , इमानदार आदमी तो ज़िंदा ही नहीं रह सकता है .
चोर - लुटेरे मौज करते हें , दुनिया को लूटते हें और दुनिया उन्हीं के गुणगान करती है , उन्हीं के तलुए चांटती है .
शरीफ और इमानदार लोग तो बस मूर्ख और फिसड्डी दिखाई देते हें .
पर एक न एक दिन तो हकीकत सामने आ ही जाती है न .
पर इससे भी क्या होता है , एक दिन थोड़ा सहम - ठिठक जायेंगे फिर वही ढ़ाक के तीन पात , आज तक इसके पीछे दौड़ते थे कल से किसी और के पीछे दौड़ेंगे , आज तक ये भगवान बने हुए थे , कल कोई दूसरा मिल जाएगा .
मैं यह़ी तो कहूं क़ि आखिर ऐसा कौन सा जादू है क़ि वो दिन दूना रात चौगुना बढ़ता ही जा रहा है , अरे हम भी दिन रात लगे ही तो रहते हें पर क्या कर पाते हें ? वही ढ़ाक के तीन पात .
पर जिसे घोटाला ही करना हो उसे क्या ?
ये कैसी त्रासदी है , एक आदमी जो घोटालेबाज है वह भी बाजार में ८-१० बर्ष तो टिक ही जाता है क्योंकि एक साथ ही तो सब कुछ नष्ट हो नहीं जाता है , वह तो धीरे - धीरे नुकसान करते करते ८-१० बर्ष में  इस स्थिति तक पहुंचता है क़ि उसे दिवालिया घोषित होना पड़े , पर इस बीच वह बर्षों तक उन लोगों को अपने सामने बाजार में टिकने नहीं देता है जो सही मायनों में व्यापार करके सीधे सादे ढंग से अपना जीवन यापन करना चाहते हें क्योंकि वह सबसे ज्यादा कीमत पर माल खरीदता है और कोई उसके सामने माल ले ही नहीं पाता है और फिर वह इतने कम भाव पर माल बेच भी देता है क़ि कोई बेच ही ना पाए .
उक्त हालात में होता यह है क़ि वह तो लगातार नुकसान करता रहता है और प्रतिपल बर्बादी की ओर बढ़ता जाता है , दूसरी ओर दूसरे लोग बाबजूद कड़ी मेहनत और पूरी होशियारी के कुछ भी नहीं कर पाते .
यह क्रम कभी बंद नहीं होता है , लगातार चलता ही रहता है , सिर्फ मोहरे बदल जाते हें , एक जाता है तो दूसरा आजाता है , ऐसे में आखिर सीधा सादा आदमी काम कैसे करे ?
व्यापार मैं जैसे जैसे घाटा बढ़ता जाता है तब बाजार की उधारी चुकाने में दिक्कतें आने लगतीं हें , दरबाजे पर सदा ही मागने बालों की भीड़ लगने लगती है और तब ये निरंतर फायनेंस जुटाने में ई व्यस्त रहने लगता है .
अब प्राथमिकताएं बदल जातीं हें , अब कमाने के लिए दौड़ने की जगह पैसा जुटाने के लिए दौड़ने लगता है .
इस तरह पहिले जो efforts productive हुआ करते थे अब nonproductive efforts में उलझ जाता है , पहिले जो व्यापार में मेहनत करता था तो उससे नया पैसा पैदा होता था जो सदा उसके पास रहने बाला था , आज उधार लेकर जो पैसा जुटाता है वह तो कल लौटाना ही है ऊपर से व्याज और चुकाना होगा .
आज जो माल लिया था उसका पेमेंट चुकाने के लिए पैसे जुटा रहा है लोन ले रहा है  , कल लोन चुकाने के लिए लोन लेने को निकलेगा , इस तरह यह दुष्चक्र आखिर कब रुकेगा , यह तो अनन्त है .सारी निष्ठाएं ही बदल गईं , जीवन का लक्ष्य ही बदल गया . अब तू व्यापारी कहाँ रहा ? अब तो तू फायनेंस मेनेजर हो गया है , अब कमाएगा कौन और कब ?
अब यदि व्यापार भी करता है तो कमाने के लिए नहीं , फायनेंस मेनेज करने के लिए .
अब पहिले से ज्यादा माल खरीदने लगता है पर ज्यादा कमाने या व्यापार बढाने के लिए नहीं वल्कि फायनेंस जुटाने के लिए क्योंकि माल कुछ दिन की उधारी पर मिल जाता है जिसे बेचकर पुराना पेमेंट चुकाया जा सके .
अब माल उधारी पर मिलता तो है पर थोड़ा महंगा क्योंकि बेचने वाला भी जानने लगा है क़ि पैसा देर से मिलेगा और वह भी कई चक्कर लगाने के बाद ,इसलिए वह इन प्रयासों की फीस अडवांस में ही बसूल लेना चाहता है .
अब माल बिकता भी थोड़ी कम कीमत पर है क्योंकि है बेचने की गरज देखकर ग्राहक कम से कम दाम में माल लेना चाहता है .
अब माल महंगा लेकर सस्ता बेचने के कारण निरंतर घाटा बढ़ने लगता है .
दूर से देखने वालों को लगता है क़ि व्यापार दिन दूना और रात चौगुना बढ़ रहा है , भीड़ लगी रहती है माल ज्यादा आता और जाता है , स्टाफ बढता जा रहा है  , दूकान बड़ी होती जा रही है तो बे दूर से देखने बाले लोग उसकी तरक्की की प्रसंशा करते नहीं थकते हें . 
बे लोग जो उसी व्यापार में हें और अपनी रफ्तार से ही चल पा रहे हें , हालाँकि सब कुछ जानते - समझते हें पर फिर भी या तो चुप रहते हें या फिर उन्हीं  अन्य  लोगों की हाँ में हाँ मिलाने पर मजबूर हें क्योंकि अन्यथा इर्ष्यालू कहलाने का डर रहता है .
कहने को व्यापार बढ़ता जाता है पर सचमुच तो घाटा बढ़ता जाता है , पहिले लोग इनके पास अपना पैसा जमा कराने के लिए आते थे अब ये लोगों के पास लोन लेने के लिए जाते हें . 
पहिले दुकान पर ग्राहकों की भीड़ हुआ करती थी अब साहूकारों और लेनदारों  की भीड़ रहती है .
एक दिन भीड़ इतनी बढ़ने लगती है क़ि अब उसका अपनी ही दुकान पर बैठना भी संभव नहीं रहता है ,और अब लेनदार लोग उसकी दुकान पर बैठते हें और वह कहीं और .
ऐसे में आप जान सकते हें क्या होता होगा .
पहिले धंधा दिन में मात्र दुकान पर चलता था और घर आजाने के बाद आराम रहता था , अब बे लोग जो दिन में दुकान पर सम्पर्क नहीं कर पाते हें वे या उनके फोन रात को घर पर आने लगते हें , परिवार और मोहल्ले के लोग समझते हें क़ि व्यापार अब बढ़ रहा है .
अब वह जहान से निकलता है दो चार लोग उसके साथ होलेते हें , देखने वाले समझते हें क़ि बड़ा आदमी बन गया है , लोग उससे बात करने के लिए और उसका जबाब सुनने के लिए चातक की भांति मुह बाए खड़े रहते हें देखने वालों को लगता है वाह इनकी कितनी चाहत है .
मांगने वाले लोग अब थोड़े ज्यादा ही विनम्र हो गए हें क्योंकि चाहते हें क़ि सेठजी खुश होकर औरों से पहिले उन्हें पैसे दे दें, साथ ही उन्हें डर भी रहता है क़ि यदि सेठजी नाराज हो गए तो --- , और देखने वालों को लगता है क़ि लोग उनकी कितनी इज्जत , लिहाज और सन्मान करते हें .
अब कभी कभी सेठजी गर्म भी होने लगे हें पर जैसे ही वे थोड़ा ही ऊँचे स्वर में बोलते हें आसपास के लोग सहम कर चुप होजाते हें , फिर चाहे वे कोई भी तुर्रमखां क्यों न हों और देखने वाले लोगों पर प्रभाव पड़ता है क़ि सेठजी का रूतबा कितना है , उनके सामने तो अच्छे अच्छों की बोलती बंद हो जाती है .
अब कभी कभी सेठजी अपने सिद्धांत भी बघारने लगे हें , किसी अन्य के प्रवचन लोग सुनें या न सुनें पर उनकी बातें बड़े धैर्य के साथ सुनते हें तो दूर से देखने वालों को लगता है क़ि लोगों को सेठजी के प्रति श्रद्धा भी बहुत है .
जब सेठजी तनिक गुस्से में लोगों से कहते हें क़ि  " ठीक है कभी किसी का समय पर नहीं दे पाया पर किसी लेकर भागा भी नहीं हूँ , जब होगा तब दूंगा , नहीं होगा तो कहाँ से लाऊंगा , मैं सिद्धांत से चलता हूँ , जिसका पहिले लिया है उसका पहिले दूंगा, अभी तुम्हारा नंबर दूर है तुम चुप रहो " तो लोग समः कर चुप रह जाते हें और देखने सुनने वालों को लगता है क़ि सेठजी सही और सिद्धान्तबादी हें इसीलिये तो भरे बाजार इतना जोर से बोल सकते हें ,और फिर अगर ये लोग सही होते और सेठजी गलत तो सब चुप क्यों रह जाते ?
भीड़ के अपने तर्क होते हें , अपनी मानसिकता होती है और भीड़ उन्हीं के अनुसार चलती है , भीड़ की मानसिकता को जो समझ जाता है वह नेता बन जाता है . भीड़ को रिझाने के लिए यह जरूरी नहीं क़ि आप सही हों या बेहतर हों यह इस बात पर निर्भर करता है क़ि आपका प्रस्तुतीकरण कैसा है .
भीड़ यह कभी नहीं जान पाती क़ि आप कैसे हें , उसका निर्णय तो इस बात पर निर्भर करता है क़ि आप कैसे दिखाई देते हें . 
भीड़ आवेग से नियंत्रित होती है , उसके सामने तर्क बेमानी होते हें और तथ्य भोंथरे .
एक ओर कथित तौर से व्यापार बढ़ रहा था तो साथ ही साथ लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ रही थीं , मन भी बढ़ रहे थे .
परिवार वालों को अब बड़ा घर चाहिए था ,बड़ी कार चाहिए थी , महंगे कपडे और जेवरात चाहिए थे . उन्हें देश और विदेश घूमना था , बड़ी बड़ी पार्टियां करनी थी , लोगों को  oblige एवं प्रभावित  करना था.
त्योहारों और शादी विवाह के प्रसंगों पर बहिन बेटियों और रिश्तेदारों की अपेक्षाएं बड गई थीं .
समाज भी उसकी ओर आशा भरी निहाहों से देखने लगा था.
चन्दा और भीख मांगने वालों को भी अब कुछ कम से संतोष नहीं होती था . दोष उनका भी नहीं था , खुद उसने ही तो पहिले अपना नाम बड़ा करने के लिए आगे आगे बडचढ़कर ज्यादा ज्यादा देना शुरू किया था .
अब सरकार को टैक्स ज्यादा चाहिए था और अफसरों को ज्यादा रिश्वत .
दुकानदारों को ज्यादा दाम चाहिये था और मजदूरों और कमचारियों को ज्यादा मजदूरी और तनख्वाह .
अब वह ज्यादा खर्च करके उदार तो नहीं कहलाता था पर उच्च कमी दिखने पर कंजूस अवश्य दिखने लगा था .
अब लोग उससे कितना भी पा लेते पर संतुष्ट नहीं होते , किसी न किसी कमी की कोई न कोई कसक उनके मन में बनी ही रहती .
घर पर भी लोगों के नजरिये और बातों में परिवर्तन साफ नजर आने लगा था .
पत्नी कहती क़ि तुमने इतना कमा लिया पर मुझे क्या मिला ? सारे गाँव को बांटा पर तुमने मुझे क्या दिया ? मेरे हिस्से तो बस वहीं मेहमानों की मेजवानी और खातिरदारी ही आई , दिन देखो न रात बस लगे रहो . दिन भर घर में जुटे रहो और शाम को माडेल बनकर पार्टियों में जाओ झूंठा रूतबा और आबरू बढाने के लिए , मन हो या न हो , श्रृंगार करो , महंगे कपडे पहिनों , तन पर गहनों को सजाओ और शो पीस बनकर चाहे अनचाहे लोगों को देखकर मुस्कुराओ .
बच्चे कहते क़ि पापा ये क्या बिजनेस-बिजनेस दिनरात ? अरे लाइफ भी तो एन्जॉय करनी चाहिए और ये क्या सादा सी घड़ी और चश्मा , आपको तो डिजायनर कपडे , limited addition wathch और सोने की फ्रेम का चश्मा पहिनना चाहिए .
और न जाने क्या क्या .
खर्चे बढ़ते रहे , कर्जे बढ़ते रहे और वह अन्दर ही अन्दर से टूटता रहा .
आखिर जो होना था वही हुआ .
और आज वह चौराहे पर खडा है .
" bankrupt "

Saturday, November 26, 2011

समकित:(उपन्यास) - अपने वर्तमान जीवनक्रम की निरर्थकता व मानव जीवन की सच्ची सार्थकता को रेखांकित करने का एक प्रयास


समकित 
(उपन्यास)
( अपने वर्तमान जीवनक्रम की निरर्थकता व मानव जीवन की सच्ची सार्थकता को रेखांकित करने का एक प्रयास )



-----समकित के एकरस धाराप्रवाह जीवन में एक द्विधा का अंकुरण भी अनायास ही हो गया -----
---उन नन्ही - नन्ही तरंगों ने समय के साथ - साथ विशाल रूप धारण करके उसके ह्रदय में विचारों का एक तूफ़ान खडा कर दिया था ,जिसके कम्पन को आज परिवार के अन्य सदस्य भी महसूस करने लगे थे.---
----- क्योंकि चिंतन तो अभी हम लोगों की दिनचर्या का अंग ही नहीं बन पाया है -----
------आज तक जिस पथ पर चला वह मार्ग नहीं , भटकाव था -------
-----पर मार्ग क्या है इसका निर्धारण अभी शेष था------

                                                                                                                                  (1)
उस दिन उसके नए बंगले की नीव क्या पडी , उसकी जीवन धारा ही बदल गई . समकित के एकरस धाराप्रवाह जीवन में एक द्विधा का अंकुरण भी अनायास ही हो गया .
हुआ यह क़ि अपने बंगले के लिए पसंद की गई भूमि के बारे में जब वास्तुशास्त्री ने बतलाया क़ि यह तो देव भूमि है और इसमें सुख - सम्रद्धि का वास है , तबसे ही उसके मानो मस्तिष्क में सात्विक कोमल भाव हिलोरें लेने लगे थे और उसने अपने आध्यात्मिक प्रष्ठभूमि न होने के बावजूद भूमि पूजन के अवसर पर नगर के आध्यात्मिक संत के प्रवचन का आयोजन किया .
उन शांत ,तेजस्वी,सरल व निस्पृह संत के करुना पूर्ण प्रवचन के कुछ भाग अनायास ही उसके मस्तिष्क पटल पर अंकित हो गए  .
"अनादिकाल से अनन्त गुणों के वैभव का स्वामी यह भगवान आत्मा ,अपने निज वैभव को भूलकर ,भोगों का भिखारी बनकर दर-दर भटक रहा है , दुर्लभ यह मानव जीवन लक्ष्मी पूजन व भूमि पूजन के यज्ञ में आहूत हो जाता है ."
ऐसा सुनते ही समकित अति विनम्रता पूर्वक हाथ जोड़कर बोला -"स्वामीजी ! हमारे यहाँ तो लक्ष्मी पूजन नहीं होता है , हमतो दीपावली के दिन महावीर पूजन करते हें ,वह भी रात को घर पर नहीं बल्कि प्रात:काल मंदिर में ही ."
स्वामीजी उसके मासूम से स्पष्टीकरण पर तनिक मुस्कराए और बोले -
"दिन रात अपने आफिस और कल कारखानों में क्या करते हो ? 
सिर्फ लक्ष्मी की आराधना ही तो ?
किसी प्रतिमा के सामने बैठकर एक थाली के चावल दूसरी थाली में ट्रांसफर कर देने मात्र का नाम ही तो पूजन नहीं है , सच्ची आराधना तो समर्पण का भाव है .
क्या आज हम धनार्जन के लिए पूर्णत: समर्पित नहीं हें , यह लक्ष्मी पूजन नहीं तो और क्या है ?
स्वामीजी ने उसे अपने बंगले में एक स्वाध्याय कक्ष बनाने की प्रेरणा दी और मानो इसी के साथ उन्होंने समकित के जीवन में मोक्ष के मार्ग का शिलान्यास कर दिया .वे बोले - " जिस प्रकार भौतिक मलिनता और ताप के शमन के लिए घर में स्नानागार (bathroom) बनाया जाता है उसी प्रकार मनोविकारों और मनश्ताप (mental tension)  के शमन हेतु एक स्वाध्याय कक्ष भी अपने घर में अवश्य होना ही चाहिए ."
स्वामीजी की प्रेरणा के परिणाम स्वरूप आज समकित के इस विशाल ,मनोरम , आधुनिक व सर्वसुविधा संपन्न बंगले के अंतिम छोर पर एक सादगी पूर्ण , शांत व व्यवस्थित स्वाद्याय कक्ष स्थित है जिसके प्रवेशद्वार के ऊपर लगी एक संगमरमर की पट्टिका पर कुछ पंक्तियाँ स्वर्णाक्षरों में उत्कीर्ण हें -
धन कन कंचन राज सुख , सबहि सुलभ कर जान 
दुर्लभ   है   संसार   में    ,    एक   जथारथ   ज्ञान 
घर के कोने में बना यह स्वाध्याय कक्ष तो आज तक अपने उपयोग की प्रतीक्षा ही करता रहा,परन्तु मन के कोने में घर कर गई स्वामीजी की वे पंक्तियाँ-
"अनादिकाल से अनन्त गुणों का स्वामी यह भगवान आत्मा भोगों का भिखारी ------"
चिंतन की लहरें उत्पन्न करने लगीं थीं .उन नन्ही - नन्ही तरंगों ने समय के साथ - साथ विशाल रूप धारण करके उसके ह्रदय में विचारों का एक तूफ़ान खडा कर दिया था ,जिसके कम्पन को आज परिवार के अन्य सदस्य भी महसूस करने लगे थे.
इन दिनों समकित अपना कुछ समय स्वाध्याय कक्ष में बिताने लगा था , उसके खान पान में सादगी ,व्यवहार में उदासीनता और व्यक्तित्व में गंभीरता परिलक्षित होने लगी थी .
अब तक कभी उसके जीवन में ऐसा अवसर नहीं आया था क़ि घर के किसी शांत एकांत कोने में कुछ देर शान्ति से बैठकर अपने जीवन के लक्ष्यों का निर्धारण किया हो ; क्योंकि चिंतन तो अभी हम लोगों की दिनचर्या का अंग ही नहीं बन पाया है . अरे ! दिनचर्या की तो बात ही क्या ,हमारे तो सम्पूर्ण जीवन में ही चिंतन का कहीं कोई स्थान ही नहीं है , सभ्यता के विकास एवं स्वचालित जीवन शैली ने हर कदम से पूर्व चिंतन की शैली को ही कुंठित कर दिया है .
हम सभी की ही तरह समकित ने भी बिना विचारे अनायास ही कब अपने आपको अधिकाधिक धनोपार्जन की मानव सुलभ प्रवृति के हवाले कर दिया था (व्यापार में झोंक दिया था ) , उसे स्वयं भी पता न चला था .
आज वह पूरी तरह व्यापार के लिए ही समर्पित था , उसका यह समर्पण रंग भी लाया और एक माध्यम वर्गीय परिवार में जन्मा यह बालक आज एक छोटे-मोटे औद्योगिक साम्राज्य का नियंता बन चुका था .
हर आने वाली सुबह आज उसके जीवन में और -और अधिक सम्रद्धी का स्वर्णिम प्रकाश बिखेर देती है व घोर काली रातों में भी अब यह क्षमता नहीं है क़ि उसके जीवन के उजालों को हर लें .
प्रतिदिन उसकी ऊँचाइयों को नए-नए आयाम मिला करते हें पर अब ये उंचाइयां उसके लिए बेमानी हो चलीं हें ,अब वह अपने आपको छला गया सा महसूस करने लगा है क्योंकि अब तक वह संतुष्टी के इस अहसास के साथ जी रहा था क़ि अपनी यात्रा की अधिकतम दूरी उसने तय करली है और अब तक अपने अवचेतन मन में जिस सुकून के स्वप्न संजोये बैठा है ,उसकी वह मंजिल निकट ही यहीं कहीं होनी चाहिए , और फिर अब आगे का मार्ग उतना दुरूह (कठिन ) भी नहीं लगता है , जितना पहिले था .
अब आज जब इस मुकाम पर आकर उसे पता चला क़ि " आज तक जिस पथ पर चला वह मार्ग नहीं , भटकाव था " तब भला उसकी प्रतिक्रया इससे भिन्न और हो भी क्या सकती थी ?
ऐसा भी नहीं है क़ि इस मनस्थिति ने उसके वर्तमान जीवन क्रम को पूरी तरह से बदल ही डाला हो ,वल्कि यदि सच कहूँ तो कहीं भी कुछ भी नहीं बदला था,सब कुछ वैसा ही चल रहा था ,वही धंधा -व्यापार , वही कोठी-कार ,वही फेक्ट्री-बाजार , सब कुछ वही तो था , यदि कुछ बदला था तो वह था उस सब के प्रति उसका द्रष्टिकोण , उसकी आसक्ति .
जिस पर अब तक चलता रहा वह मार्ग नहीं है यह ज्ञान तो हो गया था , पर मार्ग क्या है इसका निर्धारण अभी शेष था .
मार्ग समझे बिना आगे बढना अनुचित हटा और ठहर जाना कर्मण्य के लिए संभव नहीं होता है , इसलिए रुके बिना चलते रहना व चलते हुए भी ठहरे रहने का एक मात्र उपाय था कदमताल और यह़ी उहापोह भरी कदमताल उसका आज का जीवन क्रम है .
will be continued -

Monday, October 24, 2011

रामू की कहानी -आखिर किसी के पास फालतू वक्त ही कहाँ था ?कोई अपने जीवन की उपलब्धियों को भोगने में व्यस्त था तो किसी का करियर अपने सबाब पर था और कोई अपने जीवन की आधारशिला को मजबूत करने में जी-जान से जुटा हुआ था,ऐसे में उस बिखरते खंडहर की तरफ ध्यान देने की फुर्सत ही किसे थी ?


रामू की कहानी  -
क्या रामू की गाथा हमारे जीवन का सबसे काला अध्याय नहीं है ? आखिर क्या अंतर  था हम सभी में व उसमें  ? उसने लगभग सारा जीवन ही तो हमारे ही घर में हमारे साथ ही बिता दिया , हम सभी की सेवा करते हुए. अभी वमुश्किल १०-१२ साल का ही तो रहा होगा जब उसकी माँ उसे हमारे घर  पर छोड़ गई थी, यह कहते हुए क़ि "यहीं किसी कोने में पड़ा रहेगा ,बचा-खुचा , बासी खाकर पल-बड़ जायेगा बाबूजी ! और बदले में घर के कामों में हाथ बंटा दिया करेगा .
 
उस दिन छोड़कर क्या गई मानो मातृत्व के दायित्व से मुक्त हो गई ,फिर तो उसने मुड़कर कभी उसकी खोज-खबर तक न ली .
 
रामू यहीं इसी घर में ,इन्हीं बच्चों  समकित और सुरभित  के साथ ही तो खेलते-खाते  बड़ा हो गया,फर्क था तो सिर्फ इतना क़ि जब  बे साथ खेलते तो वे  जीतते रहे ,वो  हरता रहा ,वे रूठते रहे वो मनाता रहा वे फैलाते रहे वो समेटता रहा .
 
लगभग साथ-साथ जन्मे ,पाले-बड़े व रहे ,पर वे क्या बन गए और वो क्या बनकर रह गया .
 
रसोइघर के कामों में हाथ बंटाते-बंटाते रामू एक सिद्धहस्त रसोइया बन गया था ,यह तो उसकी काबिलियत थी क़ि रसोइघर पर वह एकछत्र काबिज हो गया था ,उसके रहते कभी किसी को बहां जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती ,शायद उसके सिवाय कोई और जानता भी न था क़ि चाय में किसे कितनी चीनी चाहिए और सब्जी में किसे कितनी मिर्ची ,या क़ि किसका फुल्का कितना सिकना चाहिए .आलम तो यह हो चला था क़ि यदा-कदा जब कभी उसे अपने गाँव जाने का मन हो आता तो मानो घर-परिवार पर संकट के बादल छाजाते   .सबके कारण अपने-अपने थे ,पर उसके जाने की खबर सुनकर सांप सभी को सूंघ जाता था .
 
अम्मा को लगता था क़ि दिन का अधिकांश समय अब रसोइघर में ही बीतेगा , मुझे चिता होए लगती क़ि शायद दिन में दो-तीन कप चाय की कटौती तो हो ही जायेगी. समकित जानता था क़ि अब उसे समय पर स्कूल पहुँचने के लिए विशेष सावधानी रखनी होगी तो सुरभित को चिंता थी अपनी पसंद का भोजन न मिल पाने की ,क्योंकि माँ का जोर स्वादिष्ट खाने की अपेक्षा पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक भोजन पर अधिक  था .
 
वह साल  में मुश्किल  से १०-१५ दिन के लिए गाँव जाता था और एक खुली जेल के आजन्म कैदी की भांति पैरोल की अबधि खत्म होते ही फिर बापिस अपने उसी रसोइघर में आकर कैद हो जाता था ,लगभग बर्ष भर के लिए .
 
इसी तरह बर्षों बीत गए , कभी किसी ने गौर ही नहीं किया क़ि कब वह शादी कर आया व कब उसके बाल-बच्चे हो गए और माता-पिता मर खप गए . उसका और सबकुछ हमारा अपना था ,शिवाय उसकी उन व्यक्तिगत खुशियों व ग़मों क्र तथा उसकी पगार (तनख्वाह) लगभग १०००/- रूपये माहबार के .
 
मैं गवाह हूँ क़ि किस तरह उसका बचपन बड़ी तेजी से झटपट गायब हो गया था ,पर एक सीजन तो बीच में छूट ही गया , मानो योवन तो उसके आया ही नहीं और अभी जब समकित और सुरभित की जबानी उनके सबाब पर थी , वह असमय ही बढ़ाने लगा .बाल पाक गए,चेहरा लटक गया ,व कमर झुकने लगी . न जाने ऐसे किस रोग ने आ घेरा क़ि यकायक वह बिखरने लगा . हालाँकि न तो उसकी बीमारी के बारे में मालूम करना मुश्किल काम था और न ही बीमारी का इलाज करना , पर यह सब करता कौन ? आखिर किसी के पास फालतू वक्त ही कहाँ था ?कोई अपने जीवन की उपलब्धियों को भोगने में व्यस्त था तो किसी का करियर अपने सबाब पर था और कोई अपने जीवन की आधारशिला को मजबूत करने में जी-जान से जुटा हुआ था,ऐसे में उस बिखरते खंडहर की तरफ ध्यान देने की फुर्सत ही किसे थी ? हाँ एक चिंता कभी-कभी जरूर हो जाया करती थी क़ि कहीं उसे कोई चेपी रोग तो नहीं है ? कहीं ऐसा न हो ----------.
 
१५ मिनिट बचने के लिए लाइन में लगकर सिनेमा के टिकिट लेने की बजाय जिन्हें १०-२० टिकिट भी १०० रूपये प्रति टिकिट ब्लेक में लेना पोसाता हो , वे उसे लेकर कई दफा घंटों तक म्युनिसिपल हॉस्पिटल के आउटडोर की लाइन में खड़े रहते थे क्योंकि आखिर उसका इलाज किसी प्रायवेट डाक्टर से कैसे कराया जा सकता था , उसकी फीस तो १०० रुपया है न !
 
और एक दिन जब पानी सर से ऊपर बढ़ने लगा तो  परिवार  के  सभी  सदस्यों  की एक आवश्यक मीटिंग हुई  जिसमें आबाल-गोपाल सभी ने अपने विचार व्यक्त किये ,उसके बिगड़ते स्वास्थ्य के प्रति अपनी-अपनी चिंता व्यक्त की ,तद्जनित दुष्प्रभावों का आकलन किया गया और फिर एक सर्वसम्मत निर्णय के तहत अगले ही दिन उसे उसकी जीवन भर की सेवाओं के पुरुष्कार स्वरुप २००००/- रूपये नकद इनाम देकर ,बिना उसके गाँव का पता पूंछे ही उसके गाँव जाने बाली बस में बिठा दिया गया .और हाँ ! इस बार उसके बैग की तलाशी भी नहीं ली गयी थी .
उस दिन रामू गया सो गया ,उसके बाद आजतक किसी को मालूम नहीं क़ि उसका क्या हुआ .
एक दिन वह था जब रामू के बिना घर का पत्ता भी नहीं हिलता था . घर में कोई भगवान का नाम ले या न ले ,पर रामू का नाम दिन में सेकड़ों दफे लिया जाता था . यदि चार बार आदेश दिए जाते थे तो दश बार चिरौरियाँ (request ) भी की जातीं थीं,पर आज उसे कोई याद भी नहीं करता है .मानो वह दुस्वप्न जीवन में कभी आया ही न हो .
 
आज उसकी जगह गोपाल ने लेली है .
अन्तर्द्वन्द्व -पेज-15 , by - परमात्म प्रकाश भारिल्ल
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