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Sunday, October 4, 2015

मेरी कल्पना -
एक मुमुक्षु का आदर्श अंतिम सन्देश -
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी कविता का एक पद -

"अब हम चले निजलोक में 

संसार में अब ना भ्रमेंगे


तुम हमें अब भूल जाओ


मोक्ष में अब हम मिलेंगे "


अनादि से तो चल रहा है
संसार का ये सिलसिला 
जन्म, जीवन, म्रत्यु मिलकर
बन पड़ा यह क़ाफ़िला

बिछुड़ गए कई बार मिलकर 
फ़िरसे मिले, फिरसे जुदा
ये सिलसिले चलते रहे
तुम कहो हमको क्या मिला

सुध आई हमको आत्मा की 
स्वरूप का निर्णय हुआ
मैं एक हूँ परिपूर्ण निज में 
कोई मेरा कब हुआ 

यह जानकर, निर्धार कर 
निज रूप में स्थित हुआ
कोई आऐ, कोई जाऐ
अबतक यही सब कुछ हुआ

ओ लोक के सब लोग सुनलो
अब भूल जाओ सब गिले 
आधि व्याधि उपाधि तजकर
इस देह से अब हम चले

अब हम चले निजलोक में 
संसार में अब ना भ्रमेंगे
तुम हमें अब भूल जाओ
मोक्ष में अब हम मिलेंगे 

मुक्ति को अब कूच मेरा
स्वरूप में अावास होगा 
लोकाग्र में होकर अवस्थित 
सिद्धों से सहवास होगा

Wednesday, September 23, 2015

यह जीवन रहता है तो उत्तम है पर यदि म्रत्यु आती है तो आये, एक दिन तो आनी ही थी : मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (4)

मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (4)

यह जीवन रहता है तो उत्तम है पर यदि म्रत्यु आती है तो आये, एक दिन तो आनी ही थी
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल 


इसी आलेख से -

- "----वह पल कभी भी आ सकता है और कब आ धमके यह कोई नहीं जानता. बस इसीलिये मैं सदा से ही इसके लिए तैयार ही था."

- "-----जब मौत कभी भी आसकती  है तो कहीं ऐसा न हो बिना तैयारी के ही चल देना पड़े."

- "--ज्ञाताद्रष्टा बने रहकर सबकुछ सहजरूप से स्वीकार करना ही योग्य है."

- "----आखिर किसका विकल्प करूं?
जो छूट रहा है उसका या जिसका नवीन संयोग होने वाला है उसका?"

- "----लोग तो व्यर्थ ही अज्ञात के भय से भयभीत होते रहते हें, पर मैं सोचता हूँ कि अज्ञात का भय ही क्यों, अज्ञात की प्रसन्नता भी तो हो सकती है न? जिज्ञासा भी तो हो सकती है न!"

- "--------क्यों नहीं मैं आगत का स्वागत करूं."

- "-----------संयोग तो क्षणिक ही होते हें और क्षणिक ही रहेंगे. यदि मुझे स्थायित्व चाहिए तो मुझे ही अपने आपको संयोगों से असम्प्रक्त्य (disconnect) करना होगा."

- "-----जब अनुकूल संयोग होते हें तब भी सुख-चैन कहाँ? तब मैं इस दुश्चिंता में उलझा रहाता हूँ कि कहीं ये संयोग बिखर न जाए.
सच तो यह है कि ये संयोग मुझे सुखी-दुखी करते ही नहीं.
मेरा सुख-दुःख स्वयं मेरी अपनी व्रत्ति पर ही निर्भर है "

- "----एक अवस्था है जो बदलती हुई भी सदा एक सामान ही रहती है, सिद्धदशा, अबतो मुझे उसी का पुरुषार्थ करना होगा."

- "------स्वयं किये अशुभकर्मों की परवाह मात्र म्रत्यु समीप देखकर ही क्यों ?---------"

- "कुछ संयोग भले ही म्रत्यु के साथ मुझसे छूट जायेंगे पर मेरे अपने ये संस्कार तो मेरे साथ ही रहेंगे, और मैं स्वयं तो हूँ ही हाजराहुजूर भगवान आत्मा."

- "अब मेरा लक्ष्य तो पंचमगति (मोक्ष) है और मैं लगातार उस दिशा में आगे बढ़रहा हूँ. रास्ते में सूखा हो, बंजर हो या वसंत हो, हरियाली हो, मुझे उससे क्या प्रयोजन ?"






तो आखिर आज आ ही गई यह मौत!

मुझे मालूम तो था ही कि एक न एक दिन तो यह आनी ही है.

मुझे तो यह भी अहसास था कि वह दिन, वह पल कभी भी आ सकता है, और कब आ धमके यह कोई नहीं जानता. बस इसीलिये मैं सदा से ही इसके लिए तैयार ही था.


मैं तैयार तो था पर लालायित नहीं.


तैयार तो इसलिए था कि मौत आनी तो है ही और जब कभी भी आसकती  है तो कहीं ऐसा न हो बिना तैयारी के ही चल देना पड़े.


और लालायित तो मैं जीवन के प्रति भी न रहा तो फिर मौत की लालसा कैसी? जब सबकुछ अपने नियमित क्रम में स्वमेव ही होता है, चाहने से कुछ मिलता नहीं, रोकने से रुकता नहीं और टालने से टलता नहीं तो किसकी लालसा करूं? ज्ञाताद्रष्टा बने रहकर सबकुछ सहजरूप से स्वीकार करना ही योग्य है.


आज मुझे परेशान करने वाला कोई विकल्प भी मेरे चित्त में नहीं है.


आखिर किसका विकल्प करूं?

जो छूट रहा है उसका या जिसका नवीन संयोग होने वाला है उसका?

जो छूट रहा है उसके विकल्प का तो प्रयोजन ही क्या है? मैं न तो उसका कर्ता हूँ और न ही भोक्ता, उसका तो मैं ज्ञाता भी नहीं बन पाउँगा, तब इस सबसे तो मेरा क्या नाता और क्या प्रयोजन रहा.

अब जहां मैं जारहा हूँ वह तो मुझे ज्ञात ही नहीं, तब विकल्प किसका करूं, ध्यान किसका करूं, उसके भी विकल्प का क्या प्रयोजन हो सकता है.


मेरा सौभाग्य कि मुझे इस जीवन में सज्जन और अनुकूल सहयात्री मिले, यदि ऐसा न भी होता तो क्या? सभी तो सामान नहीं होते हें न ? 
इस जीवन में भी मैंने कितनी यात्राएं कीं, कितने और कैसे-कैसे  लोग मिले, अत्यंत सज्जन और अनुकूल भी तथा दुर्जन भी. 
क्या फर्क पडा?
यात्रा का थोड़ा सा ही वक्त तो काटना था, सो कट गया. बादमें तो न अनुकूल याद रहे और न प्रतिकूल.
आखिर कोई कितनों को याद रख सकता है? मिलते तो अनेकों हें.
अब इस भववन में भ्रमते हुए अनादि से कितने रिश्ते बने और टूटे, आज मैं किसे पहिचानता हूँ? कल ये सब भी विस्मृत हो जायेंगे. ये मेरे लिए अनजान हो जायेंगे और मैं इनके लिए. 
अब किससे क्या मोह रखूँ ?

जगत के लोग तो व्यर्थ ही अज्ञात के भय से ही भयभीत होते रहते हें, पर मैं सोचता हूँ कि अज्ञात का भय ही क्यों, अज्ञात की प्रसन्नता भी तो हो सकती है न? जिज्ञासा भी तो हो सकती है न!


क्या मैं अपने विगत जीवन के भावों और क्रियाकलापों के आधार पर इतना भी अनुमान नहीं कर सकता हूँ कि मेरा भविष्य तो उज्जवल ही है, तब क्यों नहीं मैं आगत का स्वागत करूं.?

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि वर्तमान में मेरे जीवन में अनुकूलताएँ हो या प्रतिकूलताएं, और इसी तरह भविष्य में (अगले जन्म में )भी मुझे अनुकूलताएँ मिलें या प्रतिकूलताएं; ये दोनों ही बातें मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं हें क्योंकि ये सब संयोग तो क्षणिक हें,प्रतिपल ही तो बदलते रहते हें. यदि कोई संयोग मुझे अनुकूल लगता है तो अभी मैं उसका उपभोग भी नहीं कर पाता हूँ और वह बदल जाता है. ठीक इसी तरह प्रतिकूल संयोग भी; अभी मैं उनसे निपटने की योजना ही बना रहा होता हूँ और वे स्वमेव ही बदल जाते हें.

उक्त के विपरीत यदि मैं शुभ संयोगों को जुटाने और और अशुभ संयोगों को मिटाने का प्रयास करता हूँ  तो समस्त प्रयास निष्फल ही होते हें, तब मेरे पास करने को रह ही क्या जाता है ?
क्या यह मेंढकों को तोलने जैसा कार्य नहीं है ?

संयोगों की यह क्षणिकता ही मेरी आज की ज्वलंत समस्या है.
दरअसल तो यह कथन भी सही नहीं है, संयोग तो क्षणिक ही होते हें और क्षणिक ही रहेंगे. यदि मुझे स्थायित्व चाहिए तो मुझे ही अपने आपको संयोगों से असम्प्रक्त्य (disconnect) करना होगा.

अब देखो न ! जब अनुकूल संयोग होते हें तब भी सुख-चैन कहाँ ? तब मैं इस दुश्चिंता में उलझा रहाता हूँ कि कहीं ये संयोग बिखर न जाएँ.
सच तो यह है कि ये संयोग मुझे सुखी-दुखी करते ही नहीं.
मेरा सुख-दुःख स्वयं मेरी अपनी व्रत्ति पर ही निर्भर है. यदि मैं सकारात्मक व्रत्ति वाला हूँ तो प्रतिकूल संयोगों में भी इस विचार से ही संतुष्टी पालेता हूँ कि ये दिन हमेशा थोड़े ही रहेंगे, कभी तो बदलेंगे. 

सच पूंछा जाए तो मेरी समस्या अनुकूल या प्रतिकूल संयोग हें ही नहीं, मेरी सबसे बड़ी समस्या तो संयोगों की अस्थिरता है, यदि संयोग ही शाश्वत होजाएं तो मैं एक बार पुरुषार्थपूर्वक इष्ट संयोग जुटालूं और फिर हमेशा के लिए सुखी होजाऊं .

संयोग स्थिर न हों तो न सही, एक अवस्था है जो बदलती हुई भी  सदा एक सामान ही रहती है, सिद्धदशा ! अबतो मुझे उसी का पुरुषार्थ करना होगा.

यदि कदाचित प्रसंगवश मेरे जीवन में मुझसे कुछ अशुभकार्य हो ही गये हें जिनसे निश्चित ही अशुभ कर्मों का बंध हुआ है, तो यह तो मैं तब भी जानता ही था कि इन भावों का फल क्या होगा, जब जानबूझकर ही मैंने यह सब किया है तो अब उनके फल से बचने की बेईमानी भरी निरर्थक चाहत भी क्यों हो?
फिर एक बात और !
स्वयं किये अशुभकर्मों की परवाह मात्र म्रत्यु समीप देखकर ही क्यों?
क्या अशुभकर्म इस जन्म में ही प्रतिफलित नहीं हो सकते हें?
हुए ही होंगे न? हालांकि मैं यह नहीं जान सकता हूँ कि वर्तमान में उदय में आया कर्म कब बंधा था? पर इससे क्या!

संसार की व्यवस्था भी तो देखिये! जिस प्रकार की आधि-व्याधियाँ आती हें उनको झेलने में सक्षम संहनन भी स्वत: ही मिल जाता है. यदि नरकों में भयंकर मारकाट है तो वहां उससे निपटने में सक्षम वैक्रियक शरीर भी विद्यमान है.

अब इस जीवन में भी मैंने क्या कम कष्ट सहे हें, पर मैं उन्हें वर्दाश्त तो करही गया न? उन कष्टों ने मेरे जीवन को क्या हानि पहुंचाई? मैं मर तो नहीं गया न! 
यदि मरभी जाता तो क्या बिगड़ जाता, जबतक यह संसार है तबतक यह जीवन-मरण तो चलता ही रहेगा. इससे बचने का एकमात्र उपाय तो अपने स्वरूप में स्थित होना ही है. इस जीवन में मैंने इस ओर कदम बढाये भी हें;
यदि कुछ और आगे बढ़ सका होता तो उत्तम होता पर यदि यह नहीं भी होसका तो क्या फर्क पड़ता है, अन्य कुछ संयोग भले ही म्रत्यु के साथ मुझसे छूट जायेंगे पर मेरे अपने ये संस्कार तो मेरे साथ ही रहेंगे, और मैं स्वयं तो हूँ ही हाजराहुजूर भगवान आत्मा.

अब मेरा लक्ष्य तो पंचमगति (मोक्ष) है और मैं लगातार उस दिशा में आगे बढ़रहा हूँ. रास्ते में सूखा हो, बंजर हो या वसंत हो, हरियाली हो, मुझे उससे क्या प्रयोजन ?
अस्तु !



विकल्पजाल में उलझे मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (3) : जीवन के प्रति हमारा द्रष्टिकोण कैसा होना चाहिए ?

विकल्पजाल में उलझे मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (3) -

जीवन के प्रति हमारा द्रष्टिकोण कैसा होना चाहिए ?
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 


इसी आलेख से - 

- "क्या कोई सराय (धर्मशाला या होटल) छोड़ते समय भी वहां की व्यवस्थाओं की चिंता करता है कि "पानी कब आयेगा, सफाई कौन करेगा,----"

- "----जब एक दिन मैं चला जाउंगा तब भी तो यही लोग यह सब करेंगे ही न , तब क्यों नहीं आज से ही सही."

- "----क्या मैं अपने स्वभाव में थोड़ा परिवर्तन करके इन अप्रिय प्रसंगों को टाल नहीं सकता हूँ ---"

- "------यदि ये लोग इसी तरह जीना चाहते हें तो मैं क्यों इसमें बाधक बनकर अपना ही सुखचैन खो दूं?"

- "सच तो यह है कि जगत का परिणमन तो स्वतंत्र है, यहाँ मेरे विकल्प से कुछ भी नहीं होता है, तब मैं क्यों व्यर्थ विकल्पों में उलझकर अपना उपयोग मलिन करूँ? मेरा मात्र ज्ञाताद्रष्टा रहना ही योग्य है."






लगता है कि वह दिन (म्रत्यु )जो इस जीवन में कभी तो आना ही था, अब समीप है. अब मेरा देहपरिवर्तन का समय होगया है. 
मेरा मन अबभी क्यों यहीं पर उलझा हुआ है? 
क्या कोई सराय (धर्मशाला या होटल) छोड़ते समय भी वहां की व्यवस्थाओं की चिंता करता है कि "पानी कब आयेगा, सफाई कौन करेगा, अगला यात्री कब आयगा आदि.
मेरे इस घर में और सराय में अब मेरे लिए फर्क ही क्या  है? इस अनादि-अनन्त आत्मा के लिए ये मात्र  60-70 बर्ष क्या मायने रखते हें ? यह समय शान्ति और सुविधापूर्वक इस घर में कट गया पर अबतो इसका मोह छोड़कर आगे बढ़ना ही होगा न !
अब मैं यहाँ से चला जाउंगा तो न तो मैं ईन लोगों को पहिचानूंगा और न ही ये लोग मुझे. हम सभी लोग एकदूसरे से अनंतकाल तक के लिए बिछुड़ जायेंगे. 
अपने अगले जीवन में कदाचित संयोगवश मैं यहाँ आ भी पहुंचा तो यही मेरे ही द्वारा नियुक्त चौकीदार मुझे यहाँ घुसने तक नहीं देगा .
ऐसे में मेरा इनसे और इनका मुझसे क्या प्रयोजन है?
क्यों तो मैं इनसे द्वेष करूँ और क्यों राग करूँ? दोनों ही तो निष्फल हें. 
क्या मेरे बिना यहाँ की व्यवस्थाएं चलेंगीं नहीं? 
सच तो यह है कि बहुत अच्छी तरह से चलेंगीं, अबभी जब में कुछ इनों के लिए बाहर चला जाता हूँ तो यहाँ क्या रुक जाता है, क्या लुट जाता है? सबकुछ तो व्यवस्थित रहता है, तब क्यों में व्यर्थ ही अपने समय और उपयोग को इन्हीं के विकल्प में बर्बाद करूँ.
पहिले तो मुझे यह विकल्प भी सताता था कि यदि मैं यह सब नहीं करूंगा तो सब लोग क्या कहेंगे? क्या वे इसे मेरा असहयोग नहीं मानेंगे? 
पर अबतो सभी चाहते हें कि मैं उनके इन सब मामलों में दखल देना बंद करदूं. अबतो वे मेरी दखलन्दाजी को मेरा असहयोग मानने लगे हें. 
क्या यही मेरे हित में नहीं है ? मेरा समय, श्रम और शक्ति बचे और इन सबको अनुकूलता महसूस हो.
अब ये सब्जी थोड़ी मंहगी लेआयें या कुछ सब्जी सड़-गल कर फिक जाए तो मैं कर भी क्या सकता हूँ, मैं भी यह सब कबतक कर पाउँगा, जब एक दिन मैं चला जाउंगा तब भी तो यही लोग यह सब करेंगे ही न , तब क्यों नहीं आज से ही सही.
यूं भी मेरे पास इतना सबकुछ है और मेरी आवश्यकताएं हें अत्यंत सीमित. जो कुछ भी बचेगा वह इन्हीं के पास तो रहेगा न ! 
मैं इन्हें सुखी और संतुष्ट ही तो देखना चाहता हूँ न ? स्वयं मैं भी तो यही चाहता हूँ कि इन्हें अधिक से अधिक मिले ताकि उसका उपभोग करके ये सब लोग सुख से रहें, अब यदि इन्हें इसीप्रकार की कार्यप्रणाली से सुख मिलता है तो मैं क्यों रोकटोक करके इनके रंग में भंग करूँ ?
यूं भी मेरे रोकने से क्या रुक जाता है , ये तो वही करते हें जो इन्हें करना होता है, व्यर्थ ही मात्र वातावरण ही तो खराब होता है, तो क्या मैं अपने स्वभाव में थोड़ा परिवर्तन करके इन अप्रिय प्रसंगों को टाल नहीं सकता हूँ .
क्या ये लोग नहीं जानते हें कि मेरे ईन प्रयासों से जो भी बचत होगी वह इन्हीं को मिलेगी, वह मेरे तो किसी काम आने वाली है नहीं, तब भी यदि ये लोग इसी तरह जीना चाहते हें तो मैं क्यों इसमें बाधक बनकर अपना ही सुखचैन खो दूं?

इनके बचपन में मैं इन्हें कहानियाँ सुनाता था तो ये सभी बड़े प्रसन्न होते थे, हालांकि मेरे पास समय कम रहता था तो ये लोग कहानियां सुनाने के लिए चिरौरियाँ करते थे . अब आज हालात बदल गए हें. आज यदि मैं इन्हें कुछ सुनाना चाहता हूँ तो ये सुनना ही नहीं चाहते हें, पहिले मेरे पास सुनाने के लिए समय नहीं था आज इनके पास सुनने के लिए समय नहीं है. 

से मैं क्यों मैं जबरदस्ती कुछ न कुछ सुनाने का आग्रह पालूँ ?
यदि मैं कुछ नहीं भी सुना पाया तो न तो इनका मोक्ष रुकने वाला है और न ही मेरा, तब क्यों नहीं मैं अपना सुनाने का लोभ संवरण करूँ., यही सभीके हित में भी है.

सच तो यह है कि जगत का परिणमन तो स्वतंत्र है, यहाँ मेरे विकल्प से कुछ भी नहीं होता है, तब मैं क्यों व्यर्थ विकल्पों में उलझकर अपना उपयोग मलिन करूँ? मेरा मात्र ज्ञाताद्रष्टा रहना ही योग्य है.
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Sunday, September 20, 2015

लगता है अब बिदाई की वेला आ ही गई है : मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (2)

मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन -
लगता है अब बिदाई की वेला आ ही गई है.
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -

- "----अब यदि यह धर्माराधना के अनुकूल ही नहीं रहा, जब इसका अंत आ ही गया है तो यही सही. 
न तो यह हर्ष का बिषय है और न ही विलाप का. 
मैं न तो इसकी कामना ही करता हूँ और न ही इसके प्रति अरुचिवंत ही हूँ."

- "------मैं आज किसके साथ मित्रता का भाव लेकर जाऊं और किसके प्रति शत्रुता का? कलतो मैं उन्हें पहिचान ही नहीं पाउँगा."

- "-----जब मेरे बस में कुछ है ही नहीं तब मैं ही क्यों विकल्पों में उलझा रहूँ. इस देह को इसके अनुरूप परिणामित होने दो, क्यों नहीं मैं अपना कार्य करूं."

- "-----जीवनभर किया गया तत्वअभ्यास आज मेरी वह संचित निधि है जो मुझे इस संसार सागर से पार उस मुक्त अवस्था में पहुंचाएगी जहां से फिर कभी आवागमन नहीं होगा"







इस मामले में मैं पर्याप्त भाग्यशाली रहा कि मुझे इतना लंबा यह जीवन मिला जिससे मैं अधिकतम संभव समय तक जीवन जीकर आत्माराधना कर सका; अन्यथा जीवन में इतना समय मिलता ही कितनों को है.

एक तो यह मानव जीवन ही दुर्लभ है, फिर उत्तम धर्म, उत्तम कुल, जिनवाणी का श्रवण, स्वस्थ्य शरीर, उत्तम आजीविका, अनुकूल संबंधी और धर्माराधना के अनुकूल देश-काल.  
मेरा सौभाग्य कि मुझे यह सब कुछ उपलब्ध रहा.

यदि यह जीवन कुछ और दिन धर्माराधना के अनुकूल स्वस्थ्य बने रहकर चलता तो कुछ और समय धर्माराधना में व्यतीत होता पर अब यदि यह धर्माराधना के अनुकूल ही नहीं रहा, जब इसका अंत आ ही गया है तो यही सही. 
न तो यह हर्ष का बिषय है और न ही विलाप का. 
मैं न तो इसकी कामना ही करता हूँ और न ही इसके प्रति अरुचिवंत ही हूँ.
क्या नितप्रति जब हम अपने कपडे बदलते हें तो विलाप करते हें? 
नहीं न !
जबतक यह आत्मा (मैं) अशरीरी नहीं होजाता है तबतक इसका इस प्रकार शरीर बदलना भी तो एक सामान्य सी प्रक्रिया है,आखिर इसके प्रति इतनी संवेदनशीलता क्यों?
कपडे बदलने के प्रति संवेदनशील तो वे दरिद्री हो सकते हें जिन्हें वर्तमान वस्त्र त्यागदेने पर उससे बेहतर वस्त्र मिलने की उम्मीद न हो. 
मैंने तो इस प्रकार का धर्मसम्मत, संयमित जीवन जिया है कि मुझे अपने बेहतर भविष्य के बारे में संदेह का कोई  कारण ही नहीं है .

यूं भी सब कुछ तो देख-जान लिया है मैंने इस जीवन में, सब कुछ तो भोग लिया है, कुछ भी तो करना शेष नहीं रहा है.
इस संसार के स्वरूप का कोई भी पहलू तो मुझसे अपरिचित नहीं रहा, अब इससे कैसी ममता?

एक समय था (बचपन) जब लगता था कि मैं इनके (माता-पता व सम्बन्धी) बिना कैसे रहूँगा, फिर एक समय ऐसा आया जब लगने लगा कि ये मेरे बिना कैसे रहेंगे और फिर हम साथ-साथ कैसे और कब तक रह सकते हें भला. अब कहीं ऐसा न हो कि कोई विचारने लगे कि यहसब कब तक चलेगा?

कितनी निकटता से मैंने देखा और कितनी गहराई से अनुभव किया है कि जगत के ये संयोग, ये भोग कितने दोगले हें, दूर के ढोलों की ही तरह दूर से देखने पर कितने सुहाने लगते हें पर इनका यथार्थ तो विल्कुल इसके विपरीत है, जितना ही इन्हें भोगो, भूंख बढ़ती ही जाती है, तृप्ति तो कभी मिलती ही नहीं. 
स्पष्ट है कि तृप्ति का उपाय भोग नहीं.  इनके सहारे तो मुझे इस जीवन में कभी भी संतुष्टी और तृप्ति मिलेगी ही नहीं न ? तब क्यों मैं इनकी माया में ही उलझा रहूँ; क्यों नहीं किसी विश्वस्त आश्रय की तलाश करूँ, जहां मुझे सच्चा सुख और तृप्ति मिले, मात्र तात्कालिक ही नहीं वरन त्रैकालिक, हमेशा के लिए.
आज मुझे अपनी इस नादानी पर हंसी आरही है कि अबतक भी क्यों में इन्ही की माया में उलझा रहा ? 
इनका चरित्र तो सदा से ही स्पष्ट था, मैं स्वयं ही बहुत पहिले ही इस निष्कर्ष पर पहुँच ही गया था, पर फिर भी मैंने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया. बस इन्हीं की ममता में अटका रहा, इन्हीं के हाथों में खेलता रहा, इन भोगों और संयोगों ने मेरी शक्तियों और समय का भरपूर शोषण किया. 
अरे! इन्होंने क्या किया ?
ये कौन होते हें ऐसा करने वाले ?
मैंने ही तो यह सब होने दिया.
संयोगों ने कब मुझे भुलावे में रखा? वे तो निरंतर ही बदलते रहे, स्पष्ट संकेत देते रहे, पुकार-पुकारकर कहते रहे कि हम अस्थिर हें, हमतो बेबफा हें. मैंने ही उनके संकेतों को नहीं समझा. 
अब देखो न ! एक-एक कर सभी तो छोड़कर चले गए.
माता-पिता, बंधु-बांधव, सगे-संबंधी, मित्र-अनुचर (servants) कोई भी तो नहीं ठहरा साथ निभाने के लिए?
अरे माता-पिता के सामान निस्पृह, निस्वार्थ, ममतामयी संबंधी तो और कौन होता है, पर वे तो मुझे अबोध (innocent) छोड़कर ही चले गये थे. 
जब वे ही ना रहे तो और किसकी आशा की जाए? 
मुझे तो तभी समझ लेना चाहिए था, पर मैं नहीं समझा.

मानाकि माता-पिता ने तो मरकर ही छोड़ा था. वे तो कहाँ छोड़ना चाहते थे पर आखिर मौत पर किसका जोर चलता है. तब भी वे तो अंततक मेरी ही चिंता करते रहे, सबसे मेरे बारे में ही बातें करते रहे, स्वयं मुझे और अन्य सभीको मेरे ही बारे में निर्देश देते रहे, पर उनके जाने के बाद पिता सामान बड़े भाई तो जीतेजी ही छोड़कर चले गए न! जानबूझकर अनजान बनते हुए.
आखिर कौन था उनके शिवाय मेरा इस विशाल दुनिया में? पर उन्हें इस बात की परबाह ही कहाँ थी, उनके कुछ और भी तो अपने होगये थे न!

अब ये पत्नी और बच्चे हें जो भले ही मुझपर जान छिड़कते हें पर अब मैं ही कहाँ उनका हुआ? मैं भी तो आखिर चल ही दिया ना!

अरे! औरोंकी बात क्या करें, यह देह तो मेरी अपनी है, कितना जतन किया मैंने इसका? दिनरात इसीकी सेवा में तो लगा रहा.
इसको सजाने-संबारने में, इसको खिलाने-पिलाने में, न तो भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार किया और न ही दिन-रात का. 
इसको स्वस्थ्य रखने के लोभ में कितनी बर्जिसें कीं. 
सरे बाजार घोड़े जैसा दौड़ा और कुत्ते जैसा हाँफा.
भोजन किया तो इसके पोषण के लिए, छोड़ा तो इसके स्वास्थ्य के लिए.
मैं इसके प्रति कितना समर्पित बना रहा पर इसने कब मेरी एक भी सुनी?

जिस जबानी पर मैं इतना इठलाता था, वही मुझे छोड़कर चली गई.
जिस शक्ति पर मुझे इतना गुमान था अब वही नहीं रही?
मेरे वे सुन्दर रेशमी बाल, जिसकी एक-एक लट को मैं घंटों-घंटों सजाता-संबारता था, कहाँ गए बे?
पहिले वे एक-एक कर काले से सफ़ेद होते गए, मैं उनपर कालिख पोत-पोतकर ही जैसे-तैसे काम चलाता रहा पर मैं अंतत: असहाय सा ताकता ही रहा और आखिर वे भी मैदान छोड़ ही भागे. 

यही हाल इस जमीन-जायजाद और धन-सम्पत्ति का रहा, इसने तो मानों सराय ही समझ लिया था मेरे घर को, जब चाहे आजाती और चाहे जब चली जाती, मानो इसे इजाजत लेने की तो आवश्यक्ता ही न थी. 
मैं ही इसका चाकर बना रहा, जब आई तो जश्न मनाता रहा, गई तो क्रंदन करता रहा इस जैसी बेबफा के लिए. अब इसे बुद्धी का दिवालियापन नहीं तो और क्या कहा जाए? 

इस प्रकार सारे ही संयोग तो एक-एककर मुझे छोड़कर चले गए. 
वे तो चले गए पर में तब भी उन्हीं की ममता में अटका रहा. विलाप करता रहा, दुखी होता रहा.
तब तो वे जाते थे और मैं रह जाता था विरही बनकर, पर अब आज में ही चला उन्हें विरह की वेदना में छोड़कर.

पता नहीं क्यों बहुत बुरा-भला कहते हें लोग इस मौत को, इसके विचार मात्र से कांपते हें, इसके जिक्र से ही परहेज करते हें. 
क्यों नहीं लोग समझ पाते हें कि मौत तो हमारी मित्र है जो इस सड़े-गले, जर्जर, भग्न शरीर से छुटकारा दिलाकर हमें नया स्वस्थ्य शरीर प्रदान करती है.
जिन जैसे संयोगों को छोड़कर मैं यहाँ से जारहा हूँ इन्हें तो मैं भूल जाउंगा, इस बार मुझे तो उनसे विरह की पीड़ा होगी नहीं, मैं तो अपनी आदत के अनुरूप अपने नए संयोगों में तन्मय हो जाउंगा. 
अनादिकाल से आजतक मैं कितनी बार कितने जीवों के निकट संपर्क में आया और फिर उनसे बिछुड़ गया, अब मैं उन्हें जनता तक नहीं, उनकी याद में विरह की पीड़ा हो इस बात का तो प्रश्न कहाँ है?
संसार के इन अनन्त जीवों में से कितने जीव, मेरे कितने भवों में मेरे निकट संबंधी और हितैषी रहे होंगे और कितने प्रतिद्वंद्वी व बैरी; पर मैं आज किसे पहिचानता हूँ?
ऐसे में मैं आज किसके साथ मित्रता का भाव लेकर जाऊं और किसके प्रति शत्रुता का? कलतो मैं उन्हें पहिचान ही नहीं पाउँगा.
संभव है कि आज जो शत्रु हें, अत्यंत पराये हें, कल वे ही मेरे निकटतम और संबंधी बन जाएँ और आज जो अपने हें वे पराये हो जाएँ.
हो नहो, जो आज मेरे अपने हें, अत्यंत निकट हें, वे ही कल तक प्रतिद्वंद्वी व पराये रहे हों. 
अब कोई तो कहे कि किसे अपना मानकर प्रीति करूं और किसे पराया जानकर बेरुखी दिखलाऊं? सभीतो एक जैसे ही परद्रव्य हें जो न कभी "मैं "हुए हें और न ही "मेरे". 

जिन्हें मैं छोड़कर जारहा हूँ वे भी अपने नए संयोगों में व्यस्त हो जायेंगे. आखिर इस दुनियाँ में किसके लिए क्या रुक जाता है, ऐसी ही स्थितियों में मैं स्वयं ही कब किसी के लिए ठहरा? 
आखिर क्या नहीं होगा? 
क्या भूंख या प्यास नहीं लगेगी, क्या मलमूत्र क्षेपण नहीं होगा, या श्वासोच्छ्वास ही रुक जाएगा? 
क्या दिन-रात नहीं होंगे, निद्रा और जागरण नहीं होगा, क्या आवागमन ठहर जाएगा ?
जब यह सबकुछ चलेगा तो यह धन्धा-व्यापार ही कबतक बंद रह सकेगा? 
यह सबतो चलता ही रहेगा, मेरे चलेजाने से क्या रुक जाएगा? 
कुछ दिनों में तो लोग भूल ही जायेंगे कि इस नाम का भी कोई व्यक्ति था.
यूं भी मुझे इस बात से क्या फर्क पड़ता है कि कोई याद करे या भूल ही जाये. जब मैं ही वह नहीं रहा.
रही बात संयोगों की तो ऐसे ही संयोग मुझे वहां भी मिल ही जायेंगे जहां मैं जारहा हूँ, मैं उनमें गाफिल हो जाउंगा. मैं भी कब इन्हें याद करने वाला हूँ ?
यही उचित भी तो है ! आखिर हम जैसे लोगों के जीवन में ऐसा है ही क्या जिसे याद रखा जाए, आखिर हम किस मायने में अन्यों से भिन्न और विशिष्ट हें जो उल्लेखनीय हो?

आज जब यह शरीर आत्माराधना के अनुकूल ना रहा, मैं सबके लिए अनुपयोगी होगया और सब मेरे लिए असहाय, वेदना रहित निराकुलता न रही, यह जीवन संभव ही न रहा, सबसे अच्छी बात तो यह है कि मेरी यह अवस्था देख-समझकर सभी लोग मेरे बिना जीवन जीने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो ही गए हें, जब मेरे बस में कुछ है ही नहीं तब मैं ही क्यों विकल्पों में उलझा रहूँ. इस देह को इसके अनुरूप परिणामित होने दो, क्यों नहीं मैं अपना कार्य करूं. 
यूं तो आज इस अवस्था में मेरे लिए यह भी संभव नहीं होता कि जिनवाणी का अध्ययन व श्रवण कर सकूं, उसके मर्म को, अपने इस आत्मा के वैभव को समझ सकूं, स्वपरभेद्विज्ञान कर सकूं पर जीवनभर किया गया तत्वअभ्यास आज मेरी वह संचित निधि है जो मुझे इस संसार सागर से पार उस मुक्त अवस्था में पहुंचाएगी जहां से फिर कभी आवागमन नहीं होगा , मैं फिर कभी माँ की कोख में नहीं जाउंगा, फिर कभी आज जैसी इस अवस्था में नहीं आउंगा.

अब मैं स्वयं में स्थित होता हूँ.
अस्तु !




Wednesday, December 19, 2012

यदि जीवन के कुछ ही दिन शेष रहे हों तो -----------?: मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (१)

"अभी तो मैं जबान हूँ, अभी तो सारा जीवन पड़ा है, अभी तो बहुत जीना है, यह कपोल कल्पना है जो हमें इस तरह से छलती है कि कहीं का नहीं छोडती." 
पढ़िए! किस तरह?

मरणान्तक व्यक्ति को संबोधन (१)

यदि जीवन के कुछ ही दिन शेष रहे हों तो -----------?
- परमात्म प्रकाश भारिल्ल 

इसी आलेख से -

- "आज क्यों मैं इस मौत को कोसता हूँ कि यह बेवफा हो गयी है, इसका तो बादा था कि एक न एक दिन अवश्य ही आयेगी सो अपना बादा निभाने चली आयी, बेवफा यदि कोई हुआ है तो वह जिंदगी हुई है जो जीवनभर कभी मुझे एक पल के लिए भी अपनी बफादारी के बारे में आश्वस्त तो कर न सकी पर आज अचानक इस तरह मेरा साथ छोड़ने के लिए तत्पर हो गई."


- "---------जो करने में सारा जीवन झोंक दिया वह मेरे किसी काम आया नहीं. अब मेरे सारे जीवन की कमाई देकर भी जब मैं जीवन का एक भी अतिरिक्त क्षण नहीं खरीद सकता हूँ ------"


- "----------चक्रवर्ती भरत को तो पूरे छह खंड में कोई न मिला था जो उसके राजपाट को संभाल लेता-----------तो क्या भारत ठहर गए? अटक गए?"


- "परद्रव्य तो पर है, चक्रवर्ती की संपदा हो या एक तिनका, वह तो छूटा हुआ ही है, वह तो मेरा हुआ ही कब था, मैं ही उसके मोहवश उससे बंधा रहा, अब यह सब तो मेरे साथ जा ही नहीं सकता, तब भी क्या इसके मोह कोही ढोता रहूँ?" 


- "मैं अपने आपको कितना सौभाग्यशाली मानता था कि मुझे यह सब विभूति मिली है, पर आज समझा कि यह मेरा सौभाग्य न थी, यह तो दुर्भाग्य का फल थी, मानो यह सब मेरे लिए नहीं मैं ही इस सबके लिए हूँ. क्योंकि यह भोगने के काम तो आई नहीं और अब आत्म कल्याण में भी बाधक बन कर खडी हो गई है.

किसी और ने मुझे नहीं छला, मैं स्वयं अपनी भूल से ही दुखी हुआ हूँ."






यह तो कौन नहीं जानता है कि एक दिन मरना तो सभी को है, और फिर हमने इन्कार भी कब किया? 
सबने म्रत्यु को स्वीकार तो कर ही लिया है, अन्यथा ये श्मशान और कब्रिस्तान क्यों बनाते? 
जीवन बीमा क्यों करबाते? 
पर यह क्या? 
इस सबका मतलब यह तो नहीं कि मौत आकर इस तरह असमय ही हमें दबोच ले; यह तो अन्याय है, छल है मेरे साथ और मेरे परिजनों के साथ.
मैंने तो सोचा था, एक दिन बहादुरी के साथ मरूंगा, जिस तरह शान के साथ जीवन जिया है उसी तरह शान के साथ मौत का भी वरण करूंगा, पर यह निष्ठुर तो मौक़ा ही नहीं देती है. अब इस तरह अचानक, असमय मैं इसका स्वागत कैसे कर सकता हूँ?
भला यह भी कोई उम्र है मरने की? 
अभी तो मुझे बहुत कुछ करना शेष है, कितने-कितने महत्वपूर्ण, कितने सारे काम हें करने को; सभी तो अधूरे ही पड़े हें. और फिर सबसे महत्वपूर्ण काम, अपने आत्म कल्याण का, उसकी तो मैंने शुरुवात ही नहीं की है. 
सोचा था यह मंदिर पूरा हो जाए तब अपने ही बनाए इस भव्य मंदिर में ही अपने धर्मध्यान की शुरुवात करूंगा, पर यह अवसर तो हाथ ही न आयेगा.
समझ नहीं आता है कि अब क्या करूँ क्या ना करूँ? 
डाक्टर कहते हें कि मेरे हाथ में 15 दिन हें, इन 15 दिनों में क्या-क्या कर लूंगा? 
करनेको तो अब मात्र धर्म ही करना योग्य है, आत्मा की शरण में जाना ही योग्य है. 
योग्य तो है पर क्या मेरे लिए यह संभव है?





जिस आत्मा को जाना नहीं, पहिचाना नहीं, अब 15 दिन में मैं क्या कर पाउँगा? और फिर करूंगा भी कैसे? जीवनभर जो कुछ उपलब्ध किया है वह सबकुछ इस तरह बिखरा पडा है, क्या सब कुछ ऐसे ही छोड़ दूं? किसी को सँभलबाऊँ नहीं? 
अरे! यह कैसे संभव है? जिसके लिए जिया, जिस पर मरा उसे ऐसे ही कैसे छोड़ सकता हूँ? 
पर यदि उसी के इन्तज़ाम में लगा रहता हूँ तो वह मेरे तो किस काम आयेगा? अब मैं तो चला. 
इसका इंतजाम न करूं तो यह सब इनके काम भी कैसे आयेगा जिनके लिए मैं मरमिटा.
जो करना था, जो करना चाहिए था, वह तो जीवनभर किया नहीं और जो करने में सारा जीवन झोंक दिया वह मेरे किसी काम आया नहीं. 
अब मेरे सारे जीवन की कमाई देकर भी जब मैं जीवन का एक भी अतिरिक्त क्षण नहीं खरीद सकता हूँ तब क्या उसी को संभालने और सम्भलबाने में ही जीवन के बाकी बचे 15 दिन भी गंबादूं?
न गंबाऊँ तो क्या यूंही लुट जाने दूं, बिखर जाने दूं? 
जिसके एक-एक पौधे को सींचा, एक-एक पत्ती का जतन किया, क्या उस सम्पूर्ण बाग़ को ही यूं ही छोड़ दूं उजड़ जाने के लिए?
क्या योग्य है और क्या अयोग्य, कौन बतलायेगा मुझे? कौन समझाएगा मुझे?






पर यदि किसी को सम्भलबाने बैठूं भी तोभी 15 दिन तो यूं ही बीत जायेंगे, कितना कुछ है बतलाने को, जीवन भर का कर्तृत्व और अनुभव!
फिर है कौन जिसे यह सब संभलादूं? 
यदि कोई मिला होता तो अब तक संभला न देता? 
पर यदि आजतक कोई नहीं मिला तो क्या गारंटी कि कभी कोई मिल ही जाएगा?
अरे! संभालने वाले हों भी तो क्या सभी को सम्भलबाने का समय मिल जाता है?
आज मैं क्रंदन कर रहा हूँ कि मेरे पास सिर्फ 15 दिन बचे हें, पर इस तरह 15 दिन किसकिसको मिलते हें?
यह मुई मौत तो कभीभी आ धमकती है, और जब आ जाती है तो 15 दिन तो क्या 15 लम्हे तक तो नहीं देती है ये बेमुरब्बत.
रही बात कोई संभालने बाला मिलनेकी, सो मैं तो क्या चक्रवर्ती भरत को तो पूरे छह खंड में कोई न मिला था जो उसके राजपाट को संभाल लेता, यदि कोई संभाल लेता तो छह खंड का साम्राज्य बिखर क्यों जाता? 
पर उनके बाद उनके 60 हजार पुत्रों में से और उनके आधीन हजारों मुकुटबद्ध राजाओं में से कोई भी तो ऐसा नहीं निकला जो छह खंड के साम्राज्य को संभाल सकता, तो क्या भारत ठहर गए? अटक गए?
भरत को इस विकल्प ने क्यों नहीं सताया कि अगर मैं यूं ही चल दिया तो इस छह खंड का क्या होगा?
इसी उहापोह में यदि भरत ठहर जाते तो क्या होता? वे आज कहाँ होते? 
कौन नहीं जानता कि आज उनके ही जैसे बे लोग (अन्य चक्रवर्ती )कहाँ हें जो मरते दम तक सिंहासन पर डटे रहे.






फिर कौन कहता है कि भरत के जाने से छह खंड बिखर गया? कहाँ बिखर गया, क्या बिखर गया? सब कुछ जहां और जैसा था, वहीं और बैसा ही तो बना रहा.
सिर्फ एक बो (पागल) चला गया जो यह मानता था कि इस सारे साम्राज्य को मैंने बाँध रखा है और मैं ही इसका संचालन करता हूँ.
अरे! बो ऐसा कहाँ मानता था (वे तो क्षायिकसम्यग्द्रष्टि थे), यदि बो ऐसा मानते तो यूं ही छोड़ कैसे देते?
फिर एक बात और भी तो है, यदि आज बो इस तरह राजपाट न भी छोड़ देते तो क्या होता? 
आज नहीं तो कभी तो छोड़ना ही था.
जीतेजी न सही तो मरकर ही सही, छूटना तो था ही, छूट तो जाता ही.
तब क्या होता? 
जो तब होता बो आज हो जाने दे!
राजपाट की तो एक न एक दिन यही नियति तय थी पर यदि भरत समय पर न छोड़ देते तो मोक्ष की जगह नर्क में होते.
आज मैं भरत जैसा मजबूर तो नहीं हूँ न? 
भरत के छह खंड के सामने मेरे पास हैही क्या? 
क्या लुट जाएगा?
अरे! भरत के पास तो 96000 पत्नियां और 60000 पुत्र थे, उन्हें तो उनकी भी चिंता हो सकती थी कि "मेरे जाने के बाद उनका क्या होगा, क्या चक्रवर्ती सम्राट के परिजन जमीन पर न आ जायेंगे? 
लोग क्या कहेंगे?"
आज मेरे पास तो है ही क्या?
परद्रव्य तो पर है, चक्रवर्ती की संपदा हो या एक तिनका, वह तो छूटा हुआ ही है, वह तो मेरा हुआ ही कब था, मैं ही उसके मोहवश उससे बंधा रहा, अब यह सब तो मेरे साथ जा ही नहीं सकता, तब भी क्या इसके मोह कोही ढोता रहूँ?
अरे! मैं यदि अभी न मरता और 10-20 बर्ष और भी जीजाता तो भी क्या होता, एक न एक दिन तो मरना ही था, क्या तब भी यही उहापोह न होता? 
तब फिर क्यों मैं आज भी विचलित हो रहा हूँ? क्यों नहीं वस्तु के इस स्वरूप को मैं सरलता के साथ स्वीकार कर पाता हूँ?
आज क्यों मैं इस मौत को कोसता हूँ कि यह बेवफा हो गयी है, इसका तो बादा था कि एक न एक दिन अवश्य ही आयेगी सो अपना बादा निभाने चली आयी, बेवफा यदि कोई हुआ है तो वह जिंदगी हुई है जो जीवनभर कभी मुझे एक पल के लिए भी अपनी बफादारी के बारे में आश्वस्त तो कर न सकी पर आज अचानक इस तरह मेरा साथ छोड़ने के लिए तत्पर हो गई.






हे भगवान्! अब मैं क्या करूं? 
क्या अब मैं इसी उहापोह में ही उलझा रहूँगा? 
जीवन भर जो गल्ती नहीं की वह अब करूंगा?
जीवन में कभी भी मैं रुका नहीं, अटका नहीं, दुविधा में न रहा, तुरंत निर्णय किये और क्रियान्वित भी कर डाले, पर अब इस अन्तकाल में मुझे क्या हो गया है? 
कोई निर्णय क्यों नहीं हो पाता है?
अरे! पहिले भी मैं क्या करता था? 
यह भी करलूं-वह भी करलूं, सब करने का निर्णय कर लेता था, बिना यह सोचे कि यह सब कुछ होगा कब और कैसे? 
अब आज, जब यह सोचता हूँ कि सब कुछ कैसे होगा, तो निर्णय नहीं हो पाता है.
पर अब मैं क्या करूँ?
यदि यह सब न होता तो कम से कम आज तो मैं अपने लिए जीपाता, आत्मा का चिन्तन कर पाता? 
आज तक मैं अपने आपको कितना सौभाग्यशाली मानता था कि मुझे यह सब विभूति मिली है, पर आज समझा कि यह मेरा सौभाग्य न थी, यह तो दुर्भाग्य का फल थी, मानो यह सब मेरे लिए नहीं मैं ही इस सबके लिए हूँ. क्योंकि यह भोगने के काम तो आई नहीं और अब आत्म कल्याण में भी बाधक बन कर खडी हो गई है.
किसी और ने मुझे नहीं छला, मैं स्वयं अपनी भूल से ही दुखी हुआ हूँ.
हाय ! मैं कितना छला गया !