स्वयं की नादानियों पर ,खुद आज मैं ही क्षुब्ध हूँ
ये आज तक छलते रहे,छलाता रहा मैं आज तक
करना कराना दूर था , ये सुनते नहीं थे बात तक
हमने सरलता से कहा , ये क़ानून यूं बनबाइए
दंड दोषी को मिले , जनता को न्याय दिलबाइए
तब कहा,किस जोर से , यह तो कभी संभव नहीं
फिर आज कैसे हो गया,असंभव तो हुआ संभव कहीं
सरकार तो सरकार ये , विपक्षी भी क्या करते रहे
ये आह तो भरते रहे पर , उनकी गोद मैं बैठे रहे
ये पाप ही थे आपके जो ,जो ये विपक्षी पद मिला
एक ये अवसर मिला था ,अब तो सुधर जाते भला
कहते सभी संभव नहीं , बातें समझ आती नहीं
संसद का अधिकार है ये , ये आप की थाती नहीं
रे ! भाई लोगों ये तो कहो , संसद ये किसने चुनी
हमारे ही मत से चुनी , पर ना आज तक मेरी बनी
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