ज्ञान स्वभावी आत्मा , ज्ञाता द्रष्टा एक
निज पर को यह जानता,सब सामान्य विशेष
मात्र ज्ञान स्वभाव है , है ज्ञान ही इसका कर्म
करता धरता मानना , यह मिथ्यात्व अधर्म
अनादि से यह आत्मा , नहीं स्वयं को जानता
देह वा क्रोधादि को भी ,यह आत्मा ही मानता
जिस घड़ी ये मैट डाले,अनादि के इस भरम को
मिट जायेंगे बंधन सभी ,ये काट डाले करम को
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