मैंने अपने इन क्रियाकलापों को,अपनी इन करतूतों को पाप माना ही कब ?
मैं तो इन्हें जीवन जीने की कला मानता रहा और इस जगत में अपने अस्तित्व के लिए जरूरी मानता रहा .
मैं मानता रहा क़ि यदि यह सब न किया जाये तो जीवन सफलता पूर्वक जिया ही नहीं जा सकता ,पर आज मैं स्वयं ही यह नहीं समझ पारहा हूँ क़ि आखिर मेरी इस मान्यता का आधार ही क्या है ?
-परमात्म प्रकाश भारिल्ल-अंतर्द्वंद्व-पेज-21
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