जीवन भर कठोर मेहनत और नीति अनीति के विचार रहित आक्रामक नीति अपनाकर अपार दौलत , सोहरत और सता अर्जित करते - करते यह जीवन का सांध्यकाल तो आ पहुंचा पर यूं सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था क़ि अचानक इस समाचार ने सबको झकझोर कर रख दिया है क़ि वस अब कुछ ही दिन की बात है .
चित्रण एक संभावित मनस्थिति का -
तिनका तिनका जीवन भर जोड़ा,वह आज पराया हो गया
इससे तोड़ो , उसको जोड़ो , वह उत्साह हमारा किधर गया
करतूतों से संसार बढाया , वह तो ढलना था , बिखर गया
प्रतिदिन मैंने दुनिया भर के , कितने स्वप्न संजोये थे
सुरभित सुमनों की फसलें काटीं थी , जबकि कांटे बोये थे
क्या ऐसा भी हो सकता है , यह मैंने सोचा ही ना था
मुझे किसी को कुछ देना ना था , सबसे बस पाना पाना था
मैंने अपने छल के वल से , कितनों के तोड़े दिल कोमल से
जाने उनको छला या खुद को,विकृत विचार मेरे प्रतिपल थे
इक दिन कोई कमल खिलेगा , इसी आश में कीचड़ पाला
अरे कमल के लोभी भँवरे , तेरा अंतर काला बाहर काला
अब लगता है यहीं पडा यह , सब कुछ ऐसा ही रह जाएगा
क्या क्या बांधू , किसको खोलूँ , साथ न मेरे कुछ आयेगा
यह तो मुझको कितना प्रिय है,वह भी तो कितना है जरूरी
ये ले लूं साथ सभी या,मैं रुक जाऊं,पर जाना तो है मजबूरी
will continue ---
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