Wednesday, September 14, 2011

हम अभिशापों में जीने के लिए अभिशप्त हें .



हम अभिशापों में जीने के लिए अभिशप्त हें .
कोई कंगाली का अभिशाप भोग रहा है तो कोई वैभव का .
सच मानिए ! न तो निर्धनता अभिशाप है और न ही धन और वैभव वरदान .
संस्कार वह उपकरण है जो कि हमारी तकदीर का नियंता है .
संस्कार हमारी आर्थिक स्थिति को वरदान या अभिशाप के रूप में ढालते हें , हमारी नियति तय करते हें .
इसलिए हमारा अधिक जोर संस्कारों के विकास पर होना चाहिए ,आर्थिक विकास का नंबर बहुत बाद में आता है .

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