Monday, September 5, 2011

आज वह उन हकीकतों को कुरेद-कुरेदकर पड़ने की कोशिश केर रहा था


--------प्रतिदिन तो वह दर्पण के सामने खड़ा होकर उभरती हुई उम्र की सच्चाइयों को नकारने का प्रयास करता था ,उन्हें छुपाने के प्रयासों में लगा रहता था परन्तु आज वह उन हकीकतों को कुरेद-कुरेदकर पड़ने की कोशिश केर रहा था ----------उसे स्वयं अपना अक्स अजनवी सा प्रतीत हो रहा था ,वह अपने ही उस प्रतिबिम्ब को पहिचान नहीं पा रहा था ,या यूं कहिये क़ि स्वीकार नहीं कर पा रहा था -----.

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल -a book writing in progress

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