Monday, September 5, 2011

एक और एक मात्र दो ही नहीं ग्यारह भी होते हें

"गणितग्य एक और एक = दो " की बात पकड़कर बैठ जायेगा पर मनोवैज्ञानिक ही जानता है किस प्रकार एक और एक मात्र दो ही नहीं ग्यारह भी होते हें .एक और एक मिलकर उनमें निहित ग्यारह की शक्ति को जिसप्रकार गणितज्ञ नहीं पहिचान सकता उसी प्रकार अद्रश्य ,अत्यंत सूक्ष्म आत्मा की महान ,अनंत शक्ति को आज का यह भौतिकबादी विज्ञान नहीं पहिचान सकता, अत: आत्मा की खोज के लिए इस भौतिक विज्ञान की ओर ताकना व्यर्थ है .

-परमात्म प्रकाश भारिल्ल - "क्या विज्ञान धर्म की कसौटी हो सकता है " -पेज-53

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