Monday, September 5, 2011

पर आज के शिखर पुरुष , तुम बड़ों से भी बड़े हो

मेरे पूज्य पिता श्री डॉ. हुकमचंद भारिल्ल के प्रति -

हो यद्यपि गगनचारी
पर जमीं से जुड़े हो
हें नत अनगिनत मस्तक
पर पैरों पर खड़े हो
छोड़ गए जब साथ सब ही
कब अकेले पड़े हो
हिला न सका कोई चूलों को
सिद्धांत पर अड़े हो
सबने चाहा रंगों में रंगना
तुम तो पर चिकने घड़े हो
बड़प्पन के दर्प में चूर अनेकों हें
पर आज के शिखर पुरुष
तुम बड़ों से भी बड़े हो

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