Monday, September 5, 2011

उसकी यह़ी साफगोई ही तो हमें पसंद नहीं

दर्पण में अपने आपको देखकर कौन आज तक संतुष्ट हुआ है ?
दिक्कत तो यह है क़ि वह हमारी हकीकत समझता है , हम जो समझाना कहते हें वह नहीं समझता, फिर मुआ झूंठ भी नहीं बोलता .
सच को कौन सामने लाना चाहता है ? सचाई को छुपाने के लिए ही तो हम अपने चेहरे पर लीपापोती करते रहते हें
उसकी यह़ी साफगोई तो हमें पसंद नहीं , वर्ना किसकी हिम्मत है क़ि हमारे सामने मुह खोले.

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